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शारदा सिन्हा नहीं रहीं, बिहार की लोक गायिका ने दिल्ली के एम्स में ली आखिरी सांस

पद्म विभूषण से सम्मानित बिहार की सुप्रसिद्ध लोक गायिका शारदा सिन्हा का दिल्ली एम्स में निधन हो गया। छठ महापर्व के समय उनके गाए गीतों से गूँजती हर गली अब उनकी याद में खामोश हो गई है। उनकी आवाज़ ने न केवल बिहार की लोक संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई बल्कि उनके गीत छठ और तीज जैसे त्योहारों का पर्याय बन गए। उनकी मृत्यु से लोक संगीत जगत में एक गहरी खाली जगह पैदा हो गई है, लेकिन उनकी आवाज़ सदैव संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित रहेगी।

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भारत की लोक संस्कृति की सजीव धरोहर और बिहार की सुप्रसिद्ध लोक गायिका, शारदा सिन्हा का निधन मंगलवार देर शाम दिल्ली के एम्स अस्पताल में हुआ। 72 वर्षीय शारदा सिन्हा पिछले एक महीने से बीमार थीं और उनका इलाज एम्स में चल रहा था। उनके निधन की खबर ने पूरे देश और विशेष रूप से बिहार में उनके चाहने वालों को शोक में डाल दिया है। छठ महापर्व के समय में, जब उनके गाए गीत हर गली-गांव में गूंज रहे हैं, उनकी मृत्यु की खबर से उनके प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई है।

बिहार के समस्तीपुर जिले में जन्मीं शारदा सिन्हा ने भारतीय लोक संगीत को एक नई ऊँचाई दी। उनकी आवाज़ ने न केवल बिहार के लोगों को, बल्कि पूरे देश को प्रभावित किया। बिहार की परंपरागत छठ महापर्व और अन्य लोक पर्वों के लिए गाए गए उनके गीत उनकी पहचान बने। 
पिछले महीने से बिगड़ रही थी तबीयत
सितंबर 2024 में उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें दिल्ली एम्स में भर्ती कराया गया था। शुरुआती दिनों में स्थिति स्थिर थी, लेकिन धीरे-धीरे उनकी सेहत में गिरावट आने लगी। कई बार स्थिति में सुधार होने पर उन्हें आईसीयू से प्राइवेट वार्ड में भी शिफ्ट किया गया। उनके बेटे अंशुमन और परिवार के अन्य लोग लगातार उनकी सेहत का ध्यान रख रहे थे और हेल्थ अपडेट सोशल मीडिया पर साझा कर रहे थे।
सोमवार को वेंटिलेटर पर किया गया शिफ्ट
सोमवार की शाम, अचानक उनकी तबीयत फिर से बिगड़ गई, और उन्हें वेंटिलेटर पर शिफ्ट करना पड़ा। अंशुमन ने इस खबर को साझा करते हुए बताया कि उनकी माँ को इन्फेक्शन के कारण अचेत अवस्था में रखा गया था। डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की, लेकिन मंगलवार देर शाम शारदा सिन्हा ने अंतिम सांस ली।

शारदा सिन्हा का नाम सुनते ही हर किसी को उनकी मीठी और मनमोहक आवाज याद आ जाती है। छठ महापर्व, तीज, और अन्य लोकगीतों में उनके गीतों ने हर उम्र के लोगों को बांध रखा था। खासकर छठ महापर्व के दौरान उनका यह जाना उनके प्रशंसकों के लिए किसी झटके से कम नहीं है। सोशल मीडिया पर लोग उनके गीतों को साझा करके उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। छठ का त्योहार उनके गाए गीतों के बिना अधूरा सा लगता है और यही कारण है कि लोग इस समय उनकी कमी को और भी ज्यादा महसूस कर रहे हैं।

वैसे आपको बता दें कि इस वर्ष उनके पति का भी निधन हो गया था। ब्रेन हैमरेज के कारण उनके पति का देहांत हो गया। दोनों ने इस वर्ष अपनी शादी की 54वीं सालगिरह मनाई थी। पति के निधन के कुछ ही समय बाद शारदा सिन्हा की तबीयत बिगड़ी और वह भी अपनी अंतिम यात्रा पर चली गईं। यह उनके परिवार के लिए एक बेहद कठिन समय है और उनके चाहने वालों के लिए भी एक बड़ा झटका है।

शारदा सिन्हा को बिहार की लोक संस्कृति का प्रतीक माना जाता था। उनके गीत न केवल बिहार में बल्कि भारत के हर कोने में लोकप्रिय थे। छठ महापर्व पर गाए उनके गीत जैसे "केलवा के पात पर उगेलन सूरज देव" और "हमरे गाँव के सखी बहिनिया" उनकी आवाज़ को बिहार और भारतीय लोक संगीत का पर्याय बना देते हैं।  उनकी आवाज में एक ऐसा जादू था जो हर व्यक्ति के दिल में घर कर जाता था। इस अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म श्री और पद्म विभूषण जैसे सम्मानों से नवाजा गया। उनके गीतों में जो भाव था, उसे सुनकर लोग अपने गाँव, अपने परिवार और अपने त्योहारों के रंगों में खो जाते थे।

शारदा सिन्हा की मृत्यु भारतीय संगीत जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनकी आवाज़ ने न केवल बिहार के पर्वों को जीवन दिया, बल्कि उनके गीतों ने पूरे देश को यह बताया कि भारतीय लोक संगीत में कितनी विविधता और गहराई है। उनके गीत और आवाज हमेशा संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा रहेंगे। उनकी आवाज़ एक प्रेरणा थी और रहेगी, जो आने वाले पीढ़ियों को बिहार की संस्कृति और लोक संगीत की अहमियत से परिचित कराती रहेगी।
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