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‘शक्सगाम घाटी हमारी है…’, पाकिस्तान के साथ मिलकर ख्वाब देख रहे चीन को भारत का दो टूक जवाब

CPEC विस्तार में पीओके और शक्सगाम घाटी को शामिल किए जाने पर भारत ने कड़ा विरोध जताया है. विदेश मंत्रालय ने इसे भारत की संप्रभुता का उल्लंघन बताया और कहा कि शक्सगाम घाटी भारत का अभिन्न हिस्सा है.

Xi Jinping/ Narendra Modi (File Photo)
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चीन और पाकिस्तान की ओर से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के विस्तार की घोषणा के बाद भारत ने कड़ा एतराज जताया है. इस प्रस्तावित विस्तार में पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर और शक्सगाम घाटी को शामिल किए जाने को भारत ने अपनी संप्रभुता का सीधा उल्लंघन बताया है. विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा है कि भारत इस तरह के किसी भी प्रोजेक्ट को स्वीकार नहीं करेगा, जो उसके क्षेत्रीय हितों के खिलाफ हो.

विदेश मंत्रालय ने दी प्रतिक्रिया 

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साप्ताहिक प्रेस वार्ता में स्पष्ट किया कि शक्सगाम घाटी भारत का अभिन्न हिस्सा है. उन्होंने दो टूक कहा कि भारत ने कभी भी चीन और पाकिस्तान के बीच हुए 1963 के तथाकथित बाउंड्री एग्रीमेंट को मान्यता नहीं दी है. भारत का रुख शुरू से स्पष्ट रहा है कि यह समझौता अवैध है और इसके आधार पर किसी भी तरह की गतिविधि स्वीकार्य नहीं हो सकती. रणधीर जायसवाल ने बताया कि पाकिस्तान ने 1963 में अवैध रूप से शक्सगाम घाटी स्थित करीब 5,180 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र चीन को सौंप दिया था. यह वही इलाका है, जिस पर पाकिस्तान ने जबरन और गैरकानूनी तरीके से कब्जा कर रखा है. भारत का कहना है कि कोई भी देश ऐसे क्षेत्र पर समझौता नहीं कर सकता, जो उसका अपना नहीं है.

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भारत ने कभी नहीं दी CPEC मान्यता 

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भारत सरकार ने यह भी साफ किया कि तथाकथित चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को वह मान्यता नहीं देती. वजह यह है कि CPEC भारतीय क्षेत्र से होकर गुजरता है, जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है. रणधीर जायसवाल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दोनों भारत के केंद्रशासित प्रदेश हैं और भारत के अभिन्न व अविच्छिन्न अंग हैं. यह संदेश पाकिस्तान और चीन दोनों को कई बार दिया जा चुका है.

भारत ने दर्ज कराई आपत्ति 

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शक्सगाम घाटी में यथास्थिति बदलने की किसी भी कोशिश पर भारत ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है.विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत ने इस मुद्दे पर चीनी पक्ष के समक्ष औपचारिक आपत्ति जताई है. रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत अपने हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखता है. यह बयान साफ तौर पर दिखाता है कि भारत इस मामले में किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है. इसी बीच ताइवान के पास चीन की ओर से किए जा रहे सैन्य अभ्यासों पर भी भारत ने प्रतिक्रिया दी है. जायसवाल ने सभी संबंधित पक्षों से संयम बरतने की अपील की. उन्होंने कहा कि भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में हो रहे घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर रखे हुए है. व्यापार, अर्थव्यवस्था, लोगों के आपसी संबंध और समुद्री हितों को देखते हुए इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता भारत के लिए बेहद जरूरी है.

CPEC 2.0 की कब हुई घोषणा? 

4 जनवरी को चीन और पाकिस्तान ने CPEC 2.0 की घोषणा की थी. इसके तहत दोनों देशों के बीच मौजूदा आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को और गहरा करने की बात कही गई है. प्रस्तावित मार्ग का शक्सगाम की ओर बढ़ना भारत की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा रहा है. इससे भारत की उत्तरी सीमाओं पर चीन और पाकिस्तान की रणनीतिक पकड़ मजबूत हो सकती है. सियाचिन, लद्दाख और PoK को लेकर सैन्य और कूटनीतिक तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.

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भारत की संप्रभुता को चुनौती देने की कोशिश 

भारतीय रक्षा और सुरक्षा विभाग इस पूरे घटनाक्रम को भारत की संप्रभुता के लिए नई चुनौती के रूप में देख रहे हैं. सरकार का मानना है कि शक्सगाम से होकर गुजरने वाला CPEC का हिस्सा भारत की क्षेत्रीय अखंडता का ताजा उल्लंघन है. इसी कारण इस परियोजना पर भारत का विरोध और तेज होता जा रहा है. सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, भारतीय सेना चीन की ओर से बनाई जा रही यारकंद-आघिल-शक्सगाम सड़क पर भी करीबी नजर रखे हुए है. बताया जा रहा है कि यह सड़क सियाचिन ग्लेशियर के उत्तरी पहुंच मार्ग और साल्टोरो रिज से महज 30 से 50 किलोमीटर की दूरी पर है. यह स्थिति भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जाती है. भारतीय सैटेलाइट इमेजरी विशेषज्ञों के ओपन-सोर्स विश्लेषण में यह भी सामने आया है कि चीन के G219 हाईवे से शक्सगाम के निचले हिस्से की ओर एक नई सड़क निकाली गई है.यह सड़क सियाचिन ग्लेशियर के उत्तरी छोर पर स्थित इंदिरा कॉल से करीब 50 किलोमीटर उत्तर में जाकर खत्म होती है. गौर करने वाली बात यह है कि इंदिरा कॉल अप्रैल 1984 से भारत के नियंत्रण में है.

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बताते चलें कि भारत का संदेश बिल्कुल साफ है. वह शक्सगाम घाटी समेत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से जुड़े किसी भी क्षेत्र में यथास्थिति बदलने की कोशिश को स्वीकार नहीं करेगा. रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में इस मुद्दे पर भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान संबंधों में और तल्खी देखने को मिल सकती है. भारत की कड़ी प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि वह अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े मामलों पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा.

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