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अविमुक्तेश्वरानंद को सत्येंद्र जी महाराज ने घेरा, कहा- सनातन धर्म में अनुशासन सर्वोपरि, लेकिन शंकराचार्य…..

Avimukteshwaranand Controversy: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा विवाद मामला तूल पकड़ता जा रहा है. अब पटना स्थित मातृ उद्बोधन आश्रम के डायरेक्टर सत्येंद्र जी महाराज ने अविमुक्तेश्वरानंद की आलोचना की है.

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पटना स्थित मातृ उद्बोधन आश्रम के डायरेक्टर सत्येंद्र जी महाराज ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को गलत ठहराते हुए कहा है कि धर्मगुरु का सबसे पहला पाठ अनुशासन है. शंकराचार्य की अलग मर्यादा है. जो व्यवस्था बनाई गई है, उसमें सहयोग करना और धर्म के अनुसार व्यवस्था को आगे बढ़ाना ही शंकराचार्य का काम होना चाहिए. लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद स्वयं इसके अनुरूप नहीं हैं.

‘शंकराचार्य के पद की गरिमा उनके व्यवहार से मेल नहीं खाती’ 

सत्येंद्र जी महाराज ने आगे कहा, "शंकराचार्य का महत्व और पद की गरिमा, उनके व्यवहार से मेल नहीं खाती. आदि गुरु शंकराचार्य ने धर्म की स्थापना और उसके प्रचार-प्रसार के लिए चारों मठों में शंकराचार्यों को नियुक्त किया था. तीन अन्य शंकराचार्य कभी विवादों में नहीं पड़ते. वे खुद को झगड़ों में नहीं फंसाते. लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद लगातार विवादों में पड़ते हैं.”

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‘सपा और कांग्रेस के एजेंट बनकर काम कर रहे शंकराचार्य’

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उन्होंने आगे आरोप लगाया कि अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के एजेंट बनकर काम कर रहे हैं. अविमुक्तेश्वरानंद ने खुद ही सारा मामला खड़ा किया. अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार और प्रशासनिक सिस्टम को चुनौती दी और फिर दावा किया कि प्रशासन ने उनके साथ ऐसा किया.

‘पालकी से जाने की जिद अनुशासनहीनता’

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सत्येंद्र जी महाराज ने कहा, "कोई अन्य शंकराचार्य माघ मेले में नहीं गया, सिर्फ अविमुक्तेश्वरानंद ही क्यों वहां पहुंचे? वहां जाकर उन्होंने पालकी से जाने की जिद की. यह कोई अनुशासन नहीं है. यह अनुशासनहीनता है. वे कैसे संत कहलाने के अधिकारी हैं?"

‘शंकराचार्य खुद विवाद को जन्म दे रहे हैं’

अविमुक्तेश्वरानंद को स्वयंभू शंकराचार्य बताते हुए सत्येंद्र जी महाराज ने कहा कि सरकार यह मुद्दा नहीं उठा रही है, वह खुद ही विवाद को जन्म दे रहे हैं. अगर ऐसे खुद को शंकराचार्य कहने वाले लोग इस तरह की गड़बड़ी करते हैं और व्यवस्थाओं का साथ नहीं देते हैं, तो यह स्वाभाविक है कि सरकार कार्रवाई करेगी.

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क्या है पूरा मामला?

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गौरतलब है कि 17 जनवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती प्रयागराज माघ मेला में संगम घाट पर स्नान करने पहुंचे थे. पूरे लाव-लश्कर के साथ वह अपनी पालकी पर आए थे, लेकिन पुलिस प्रशासन ने उन्हें बिना रथ के आगे बढ़ने को कहा. इसी बात पर अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला व्यवस्था में जुटे कर्मचारियों के बीच विवाद हुआ था. बाद में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन पर आरोप लगाया कि उनके साथ यह व्यवहार जानबूझकर किया गया है. विवाद उस समय और बढ़ा, जब अविमुक्तेश्वरानंद माघ मेले में ही धरने पर बैठ गए.

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