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ममता बनर्जी को राष्ट्रपति मुर्मू ने दिया जोरदार झटका, बंगाल के विश्वविद्यालयों पर कंट्रोल का TMC सरकार का प्लान फेल!

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले सीएम ममता बनर्जी को बड़ा झटका लगा है. बतौर सीएम, राज्य के सभी विश्वविद्यालयों का चांसलर बनने का ख़्वाब पूरा नहीं हो रहा है.

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पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी को बड़ा झटका लगा है. उन्हें राज्य के सभी विश्वविद्यालयों का चांसलर बनने वाला ख्वाब फिलहाल ठंडे बस्ते में चल गया है. यानी वो गवर्नर की जगह पदेन कुलाधिपति नहीं बन पाएंगी.

ममता बनर्जी को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिया झटका!

दअरसल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय कानून (संशोधन) विधेयक, 2022 को मंजूरी देने से इनकार कर दिया है. इस बिल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सभी राज्य विश्वविद्यालयों का चांसलर बनाने का प्रस्ताव था.

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नहीं होगा अब चांसलर पद में कोई बदलाव!

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यानी कि राष्ट्रपति की तरफ से बिल को मंजूरी न मिलने के कारण पश्चिम बंगाल में राज्य द्वारा संचालित यूनिवर्सिटीज में चांसलर के पद में कोई बदलाव नहीं होगा.

बना रहेगा यूनिवर्सिटी में गवर्नर का प्रभाव!

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मौजूदा सिस्टम के अनुसार, बंगाल के गवर्नर सीवी. आनंद बोस सभी राज्य यूनिवर्सिटीज के चांसलर हैं. लोक भवन (गवर्नर का निवास) ने भी पुष्टि की है कि गवर्नर आनंद बोस पहले की तरह ही राज्य यूनिवर्सिटीज के चांसलर के तौर पर अपना काम करते रहेंगे.

क्या है पूरा मामला?

2024 में, गवर्नर आनंद बोस ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में पास हुए बिल को राष्ट्रपति मुर्मू के पास विचार के लिए भेजा था. पश्चिम बंगाल कैबिनेट ने 2022 में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को राज्य यूनिवर्सिटीज का चांसलर नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी.

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जगदीप धनखड़ के गवर्नर बंगाल कार्यकाल का है मामला!

तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने दावा किया था कि अगर मुख्यमंत्री बनर्जी को चांसलर बनाया जाता है तो इन यूनिवर्सिटीज में शैक्षणिक और प्रशासनिक गतिविधियों में तेजी आएगी.

गवर्नर को बायपास करने का प्लान फेल!

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पूर्व गवर्नर जगदीप धनखड़, जिनके कार्यकाल में यह बिल पास हुआ था, उन्होंने आरोप लगाया था कि तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार उनसे सलाह किए बिना ही अलग-अलग यूनिवर्सिटीज में वाइस-चांसलर नियुक्त कर रही है.

इस बीच, राजनीतिक और शैक्षणिक समुदाय के कुछ वर्गों का मानना है कि इस फैसले से पश्चिम बंगाल सरकार और लोक भवन के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव और बढ़ गया है.

क्या है संवैधानिक प्रावधान?

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भारतीय संविधान के अनुसार, गवर्नर अपने पद के कारण यूनिवर्सिटीज के चांसलर के रूप में काम करते हैं. इस सिस्टम में किसी भी बदलाव के लिए संवैधानिक नजरिए से अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है.

राष्ट्रपति की मंजूरी न मिलना साफ तौर पर दिखाता है कि प्रस्तावित संशोधनों को लेकर कानूनी और संवैधानिक सवाल अभी भी बने हुए हैं.

बीजेपी-TMC में वार-पलटवार!

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पश्चिम बंगाल सरकार ने पहले कहा था कि ये संशोधन यूनिवर्सिटीज में वाइस चांसलर की नियुक्ति में लंबे समय से चली आ रही रुकावट को खत्म करने के लिए लाए गए थे. दूसरी ओर, विपक्षी दल शुरू से ही इस बिल का विरोध कर रहे थे.

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पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने दावा किया है कि इससे यूनिवर्सिटीज की स्वायत्तता कम होगी और पूरे राज्य में शिक्षा प्रणाली में राजनीतिक दखलअंदाजी बढ़ेगी.

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