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PM मोदी ने अपने हाथों में ली ISRO की कमान! NSA डोभाल से मिला इनपुट, गठित कर दी PSLV मिशन को लेकर जांच समिति
PM मोदी ने ISRO के बीते कई मिशन के फेल होने के मामले को गंभीरता से लिया है. उन्होनें PSLV C-61, PSLV C-62 को लेकर जांच के आदेश दे दिए हैं. इससे पहले NSA डोभाल का VSSC का सीक्रेट दौरा भी हुआ था.
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बीते कई महीनों में ISRO के दो मिशन फेल होने की घटना को मोदी सरकार ने गंभीरता से लिया है. सूत्रों के मुताबिक सरकार ने इसरो के पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) की लगातार विफलताओं के पीछे मौजूद 'सिस्टेमेटिक समस्याओं' की जांच पूर्व प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के. विजय राघवन और इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ सहित अन्य सदस्यों की एक समिति करेगी.
आपको बता दें कि आमतौर पर किसी भी रॉकेट या मिशन के फेल होने के बाद तकनीकी समितियां जांच कर ‘फेल्योर एनालिसिस रिपोर्ट’ प्रस्तुत करती हैं, लेकिन विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार यह नई समिति इस बात की भी पड़ताल करेगी कि क्या इन विफलताओं के पीछे कोई “संगठनात्मक” समस्याएं भी जिम्मेदार रही हैं या नहीं
बीते महीने 12 जनवरी 2026 को PSLV-C62 मिशन 16 उपग्रहों को ऑर्बिट में स्थापित करने में विफल रहा था. रॉकेट का तीसरा चरण इग्नाइट, चालू या प्रज्वलित नहीं हो पाया और मिशन समुद्र में गिरकर नष्ट हो गया. इससे पहले 18 मई 2025 को भी PSLV-C61 मिशन इसी तरह फेल हो गया था, जब तीसरा चरण सक्रिय नहीं हो सका और सरकार की रणनीतिक जरूरतों के लिहाज से लिए तैयार EOS-09 उपग्रह नष्ट हो गया.
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कब सामने आएगी जांच रिपोर्ट?
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द हिन्दू की खबर के मुताबिक सरकार द्वारा गठित इस समिति में इसरो से बाहर के विशेषज्ञ शामिल हैं और उम्मीद है कि वे अपनी रिपोर्ट अप्रैल से पहले इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन को सौंपेंगे. इससे पहेल 3 फरवरी 2026 को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल PSLV-C62 मिशन की विफलता के बाद, संभवत: एक सीक्रेट मीटिंग्स के सिलसिले में विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र पहुंचे थे. मालूम हो कि डोभाल NSA के साथ-साथ भारत के अंतरिक्ष आयोग के सदस्य भी हैं
द हिंदू ने अपनी रिपोर्ट में इसरो के हवाले से आगे कहा, “राष्ट्रीय स्तर की एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई है, जो PSLV वाहन में आई गड़बड़ी के कारणों की समीक्षा कर रही है.” समिति के सामने सरकार ने मेंडेट स्पष्ट कर दिया है कि किन एंगल से जांच होगी. कहा जा रहा कि जांच का दायरा कलपुर्जे से लेकर इंटरनल सबोटाज भी रहेगा. कुल मिलाकर रिपोर्ट का मुख्य फोकस PSLV की विफलताएं होंगी. समिति रॉकेट के विभिन्न पुर्जों के निर्माण, खरीद और असेंबली की प्रक्रियाओं की भी जांच करेगी. सूत्रों के मुताबिक इसका असर अन्य रॉकेटों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि उनमें कई तकनीकी समानताएं हैं.
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ISRO को लेकर क्यों गंभीर है मोदी सरकार?
ISRO की लगातार सफलताओं की वजह से भारत में स्पेस सेक्टर के ग्रोथ की अपार संभावनाएं हैं. इसरो ने बीते 10 सालों में विदेशी कंपनियों के सैटेलाइट लॉन्चिंग में अरबों डॉलर कमाएं हैं. दुनियाभर में स्पेस रेस और भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए सरकार ने इस सेक्टर को निजी निवेश के लिए भी खोल दिया है.
प्रधानमंत्री मोदी के सीधे अंदर आने वाला स्पेस डिपॉर्टमेंट सरकार की टॉप प्रायोरिटी में से एक है. भारत के अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र में अब कई निजी कंपनियां भी शामिल हैं. ऐसे में जांच केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं होगी कि कौन-सा पुर्जा या हिस्सा फेल हुआ और जिम्मेदार कौन था, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि जवाबदेही तय करने की क्या प्रक्रिया है और उसे कैसे बेहतर बनाया जा सकता है. विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार इसरो की एक तकनीकी समिति PSLV-C62 घटना पर अपनी रिपोर्ट इसी सप्ताह पेश करेगी.
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इससे पहले कैसे होती थी इसरो के मिशन फेल होने की जांच?
ज्ञात हो कि इतिहास में इसरो की परंपरा रही है कि किसी रॉकेट विफलता के बाद फेल्योर एनालिसिस कमेटी कारणों की जांच कर अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करती है. हालांकि PSLV-C61 और PSLV-C62 दोनों मामलों में अब तक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है. 18 मई की घटना पर बनी फेल्योर एनालिसिस कमेटी की रिपोर्ट PSLV-C62 लॉन्च से पहले प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज दी गई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई.
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क्या है इसरो की इंटरनल फेल्योर एनालिसिस कमेटी?
फेल्योर एनालिसिस कमेटी, जिसे इसरो अध्यक्ष द्वारा गठित किया जाता है, इसरो के भीतर विशेषज्ञों का एक समूह होता है, जो किसी बड़ी घटना की स्थिति में जांच का नेतृत्व करता है. इसका उद्देश्य विफलता तक पहुंचने वाली घटनाओं की श्रृंखला को पुनर्निर्मित करना और रॉकेट को दोबारा उड़ान की अनुमति देने से पहले सुधारात्मक कदम सुझाना होता है. इस समिति में इसरो के विशेषज्ञों के साथ-साथ अकादमिक क्षेत्र के विशेषज्ञ भी शामिल होते हैं.
यह भी पढ़ें: ISRO के बैक टू बैक मिशन फेल, क्या हुई विदेशी साजिश...NSA डोभाल का स्पेस सेंटर का गुप्त दौरा, 2 दिन तक सीक्रेट मीटिंग!
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90% है इसरो की सक्सेस रेट!
PSLV इसरो का सबसे सफल प्रक्षेपण यान माना जाता है. 1993 से अब तक इसरो ने 90 प्रतिशत से अधिक की सफलता दर बनाए रखी है और लगभग 350 उपग्रहों को उनकी निर्धारित कक्षाओं में स्थापित किया है.
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री ने क्या कहा?
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वहीं इसी महीने 2 फरवरी को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि एक “थर्ड पार्टी एप्रेज़ल” यानी स्वतंत्र मूल्यांकन जारी है. उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं है कि हम (इसरो) इतने अनजान हैं कि विफलता का कारण नहीं समझ सकते. इस बार हम भरोसा बढ़ाने के लिए थर्ड पार्टी मूल्यांकन यानी कि बाहर से भी फ्लेयोर एनालिसिस करा रहे हैं, जबकि हमारे पास इसरो के भीतर भी पर्याप्त विशेषज्ञता है..."
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उन्होंने आगे कहा था कि "अगली संभावित लॉन्च तिथि जून है, जिसे हम लक्ष्य बना रहे हैं, बशर्ते हम संतुष्ट हो जाएं कि समस्या पूरी तरह दूर कर दी गई है. इस वर्ष 18 लॉन्च निर्धारित हैं, जिनमें छह निजी क्षेत्र के उपग्रहों से जुड़े हैं. किसी ने भी अपना लॉन्च अनुरोध वापस नहीं लिया है, इसका मतलब भरोसा कायम है. अगले वर्ष जापान, अमेरिका और फ्रांस के तीन बड़े विदेशी लॉन्च निर्धारित हैं और किसी ने भी चिंता नहीं जताई है. इससे स्पष्ट है कि हमारी विश्वसनीयता बरकरार है.”