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सैनिटरी पैड की फोटो भेजो… तीन महिला सफाई कर्मचारियों से मांगे मासिक धर्म के सबूत, SC में पहुंचा मामला

हरियाणा के राज्यपाल के दौरे के कारण तीन महिला सफाई कर्मचारियों को रविवार को ड्यूटी पर बुलाया गया था. SCBA ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार के पास कर्मचारियों द्वारा दर्ज कराई गई लिखित शिकायत का हवाला दिया है, जिसमें कहा गया है कि उनके सुपरफाइजर्स ने उन्हें मासिक धर्म से गुज़रने और अस्वस्थ महसूस करने के बावजूद तेज़ी से काम करने का निर्देश दिया था.

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सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने हरियाणा के महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में महिला कर्मचारियों की कथित तौर पर अपमानजनक जाँच की खबरों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर महिलओं और लड़कियों के लिए दिशा निर्देश बनाने का आग्रह किया है.  

SCBA ने क्या अनुरोध किया?

SCBA ने यह भी अनुरोध किया है कि कार्यस्थल और एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य, सम्मान, और निजता के अधिकार का उल्लंघन न हो, साथ ही ये सुनिश्चित करने के लिए दिशा निर्देश बनाए जाएँ. बार एंड बेंच की रिपोर्ट की मानें तो एससीबीए ने अपील की है कि केंद्र और हरियाणा सरकार पूरे मामले की जाँच करें.

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जानें क्या है मामला

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याचिका के अनुसार, 26 अक्टूबर को हरियाणा के राज्यपाल के दौरे के कारण तीन महिला सफाई कर्मचारियों को रविवार को ड्यूटी पर बुलाया गया था. SCBA ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार के पास कर्मचारियों द्वारा दर्ज कराई गई लिखित शिकायत का हवाला दिया है, जिसमें कहा गया है कि उनके सुपरफाइजर्स ने उन्हें मासिक धर्म से गुज़रने और अस्वस्थ महसूस करने के बावजूद तेज़ी से काम करने का निर्देश दिया था. उनसे यह प्रमाण भी माँगा गया था कि ये महिलाएँ मासिक धर्म से गुज़र रही थीं. 

‘यह बेहद परेशान करने वाली बात है’

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SCBA ने अपनी याचिका में बताया, “यह बेहद परेशान करने वाली बात है कि सुपरवाइजर्स ने कर्मचारियों से उनके सैनिटरी पैड की तस्वीरें भेजने के लिए कहकर फोटोग्राफिक सबूत मांगे. कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया, उन्हें अपमानित किया गया और उन पर तब तक दबाव डाला गया जब तक कि उन्हें शौचालय में तस्वीरें लेने के लिए मजबूर नहीं किया गया.”

पहले भी सामने आ चुकें हैं ऐसे मामले

एससीबीए का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है, महिलाओं और लड़कियों के सम्मान और निजत को ठेस पहुँचाने वाली ऐसी घटनाएँ कई संस्थानों में हुई हैं. SCBA ने द हिंदू की एक ख़बर का हवाला देते हुए कहा कि  महाराष्ट्र के एक निजी स्कूल में कक्षा 5 से 10 तक पढ़ने वाली लड़कियों को स्कूल के कन्वेंशन हॉल में बुलाया गया और उन्हें प्रोजेक्टर के ज़रिए शौचालयों और फर्श पर खून के धब्बों की तस्वीरें दिखाई गईं. फिर छात्राओं को यह जाँचने के लिए शौचालय में बुलाया गया कि क्या उन्हें मासिक धर्म हो रहा है. 

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याचिका में क्या कहा गया?

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याचिका में कहा गया है, "याचिकाकर्ता विनम्रतापूर्वक यह कहना चाहती है कि महिलाओं और लड़कियों को विभिन्न संस्थागत व्यवस्थाओं में यह जाँचने के लिए आक्रामक और अपमानजनक जाँचों का सामना करना पड़ रहा है कि वे मासिक धर्म से गुज़र रही हैं या नहीं, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जीवन, सम्मान, निजता और शारीरिक अखंडता के अधिकार का घोर उल्लंघन है. महिला श्रमिकों, विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र की श्रमिकों को सभ्य कार्य परिस्थितियों का अधिकार है जो उनकी जैविक भिन्नताओं का सम्मान करती हैं और उन्हें पर्याप्त छूट प्रदान करती हैं ताकि मासिक धर्म से संबंधित दर्द और परेशानी से पीड़ित होने पर उन्हें अपमानजनक जाँचों का सामना न करना पड़े.”

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