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पाकिस्तान की पैंतरेबाजी बेनकाब... ज्वॉइंट डिक्लरेशन में अलापा कश्मीर राग, मुस्लिम देश ने भी नहीं दिया साथ

पाकिस्तान ने कजाकिस्तान के साथ जारी संयुक्त बयान में कश्मीर को लेकर UNSC प्रस्तावों का समर्थन जताने का दावा किया है. हालांकि कजाकिस्तान के आधिकारिक दस्तावेजों में कश्मीर का कोई उल्लेख नहीं है. जिससे पाकिस्तान के दावे और उसकी मंशा पर सवाल खड़े हो गए हैं.

Kassym Jomart Tokayev/ Shahbaz Sharif
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कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव की हालिया पाकिस्तान यात्रा के दौरान जारी संयुक्त घोषणापत्र ने नई कूटनीतिक बहस छेड़ दी है. पाकिस्तान ने दावा किया है कि इस साझा बयान में जम्मू और कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्तावों के आधार पर हल करने का समर्थन किया गया है. यह दावा भारत के लिए पैंतरेबाजी से कम नहीं है. 

दरअसल, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी संयुक्त घोषणा के पैरा 15 में कश्मीर का साफ उल्लेख किया गया है. जबकि इसके उलट, कजाकिस्तान की आधिकारिक सरकारी वेबसाइट और वहां की सरकारी समाचार एजेंसी की ओर से जारी किसी भी दस्तावेज में कश्मीर मुद्दे का कोई जिक्र नहीं किया है. यही विरोधाभास इस पूरे मामले को संदिग्ध बनाता है और कई की सवाल खड़े करता है. जो पाकिस्तान की नीच मानसिकता को दर्शाता है. 

कजाकिस्तान ने किन मुद्दों पर दिया जोर

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कजाकिस्तान की ओर से जारी आधिकारिक बयानों में आर्थिक सहयोग, व्यापार, कनेक्टिविटी और निवेश जैसे विषयों पर फोकस दिखाई देता है. इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच 37 से 60 के बीच समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए. इनमें खनिज उद्योग और भूवैज्ञानिक विज्ञान में सहयोग, संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में संयुक्त तैनाती, कराची और ग्वादर बंदरगाहों तक कजाकिस्तान की पहुंच और ट्रांस-कैस्पियन परिवहन गलियारे पर चर्चा शामिल है. इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल अर्थव्यवस्था में सहयोग पर भी सहमति बनी है.

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भारत-कजाकिस्तान संबंधों पर नजर

कजाकिस्तान अब तक कश्मीर मुद्दे पर तटस्थ रुख अपनाता रहा है और भारत के साथ उसके संबंध सामरिक और आर्थिक रूप से मजबूत रहे हैं. भारत लगातार यह स्पष्ट करता आया है कि जम्मू और कश्मीर उसका आंतरिक और द्विपक्षीय मुद्दा है, जिसमें किसी तीसरे पक्ष या पुराने UNSC प्रस्तावों की कोई भूमिका नहीं है. कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कजाकिस्तान ने वास्तव में इस बयान पर सहमति दी होती, तो इसकी आधिकारिक पुष्टि जरूर होती. ऐसे में कजाकिस्तान की चुप्पी इस ओर इशारा करती है कि यह पाकिस्तान की ओर से किया गया एक कूटनीतिक पैंतरा हो सकता है, जिसका मकसद अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत पर दबाव बनाना है. आने वाले दिनों में कजाकिस्तान की आधिकारिक प्रतिक्रिया इस पूरे विवाद की असली तस्वीर साफ कर सकती है.

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बहरहाल, इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि कजाकिस्तान की ओर से आधिकारिक रुख क्या रहता है. जब तक वहां से कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आता, तब तक पाकिस्तान के दावे संदेह के घेरे में रहेंगे. ऐसे में यह मामला आने वाले दिनों में भारत, पाकिस्तान और मध्य एशिया की कूटनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है.

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