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ओडिशा: HOD की हैवानियत से टूटी छात्रा, आत्मदाह के बाद AIIMS में तोड़ा दम... सिस्टम पर उठे सवाल

ओडिशा के बालासोर जिले के फकीर मोहन ऑटोनॉमस कॉलेज की 20 वर्षीय छात्रा की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया है. छात्रा ने कॉलेज के एचओडी पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही से निराश होकर उसने कॉलेज परिसर में खुद को आग लगा ली. गंभीर हालत में उसे एम्स भुवनेश्वर ले जाया गया, जहां 14 जुलाई को उसकी मौत हो गई.

File Photo / google
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ओडिशा के बालासोर जिले में फकीर मोहन ऑटोनॉमस कॉलेज की एक छात्रा की मौत ने न सिर्फ राज्य बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. 20 वर्षीय यह छात्रा पिछले कई महीनों से अपने ही कॉलेज के एचओडी पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाकर न्याय की गुहार लगा रही थी. लेकिन जब कॉलेज प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो उसने अंत में आत्महत्या जैसा खौफनाक कदम उठा लिया. छात्रा ने कॉलेज कैंपस में ही खुद को आग के हवाले कर दिया, जिसमें वह 90 प्रतिशत तक जल चुकी थी. इलाज के लिए पहले उसे बालासोर के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया और फिर हालत बिगड़ने पर 12 जुलाई को एम्स भुवनेश्वर रेफर किया गया. लेकिन छात्रा जिंदगी की जंग हार गई. 

हरसंभव कोशिश की गई, लेकिन बचा नहीं सके: एम्स
एम्स भुवनेश्वर ने इस दुखद घटना को लेकर एक आधिकारिक बयान में कहा कि छात्रा को बर्न्स सेंटर आईसीयू में भर्ती किया गया था, जहां उसे आईवी फ्लूइड्स, एंटीबायोटिक्स और अन्य सभी जरूरी उपचार दिए गए. उसकी हालत को देखते हुए उसे वेंटिलेटर पर रखा गया, और किडनी रिप्लेसमेंट थेरेपी तक दी गई. लेकिन शरीर के लगभग 90 फीसदी हिस्से के जलने की वजह से वो जीवन की जंग हार गई. डॉक्टरों की टीम ने हर संभव प्रयास किया, लेकिन छात्रा की हालत लगातार बिगड़ती गई और 14 जुलाई की रात 11:46 बजे मौत हो गई.

प्रशासन पर गंभीर लापरवाही का आरोप
इस घटना के सामने आने के बाद ओडिशा सरकार पर सवाल उठने लगे हैं. लोगों में आक्रोश है कि आखिर क्यों एक छात्रा की बार-बार की गई शिकायतों को कॉलेज प्रशासन ने गंभीरता से नहीं लिया. उसने अपने विभागाध्यक्ष समीर साहू के खिलाफ शिकायत की थी, लेकिन न तो एचओडी को निलंबित किया गया और न ही कोई जांच शुरू हुई. पीड़िता ने प्रिंसिपल दिलीप घोष से भी मदद मांगी थी, लेकिन उसे सिर्फ निराशा हाथ लगी. इसी उपेक्षा और असंवेदनशीलता से आहत होकर उसने आत्मदाह जैसा कदम उठाया.

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अब हुई गिरफ्तारी
घटना के बाद अब जाकर ओडिशा पुलिस ने आरोपी एचओडी समीर साहू और कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल दिलीप घोष को गिरफ्तार किया है. दोनों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है. लेकिन यह सवाल अब भी ज़िंदा है कि अगर यह कार्रवाई पहले की जाती, तो क्या छात्रा आज जिंदा होती? क्या हमारे सिस्टम में पीड़िता की सुनवाई के लिए कोई संवेदनशील और त्वरित तंत्र है? जब एक युवती कॉलेज परिसर में जलकर मरने का रास्ता चुनती है, तो यह हमारी सामाजिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर विफलता को उजागर करता है.

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मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ने जताया दुख
ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने इस घटना पर गहरा दुख जताते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि, 'सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद छात्रा की जान नहीं बचाई जा सकी. उन्होंने भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना करते हुए परिवार को इस दुख को सहने की शक्ति देने की कामना की.' सीएम ने आगे कहा कि 'दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा.' उन्होंने अधिकारियों को कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं. राज्य की उपमुख्यमंत्री प्रवति परिदा ने भी छात्रा की मौत पर अफसोस जताया और कहा कि सरकार इस मामले में पूरी तरह गंभीर है. दोषियों के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई की जाएगी और जांच पूरी पारदर्शिता के साथ होगी.

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सिस्टम पर उठ रहे सवाल 
बताते चलें कि यह घटना सिर्फ एक छात्रा की मौत नहीं है, बल्कि एक पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता की तस्वीर है. एक युवा लड़की जो अपने भविष्य के सपने लेकर कॉलेज जाती है, वो अंत में वहीं से निराश होकर जिंदा जलने का फैसला लेती है. यह समय है जब सभी शैक्षणिक संस्थानों को आत्ममंथन करना चाहिए. महिलाओं की शिकायतों को प्राथमिकता के साथ सुनने और कार्रवाई करने के लिए संस्थागत ढांचा मज़बूत करना होगा. साथ ही, दोषियों को जल्द से जल्द सज़ा मिलनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई और छात्रा अपने साथ ऐसा अन्याय महसूस न करे. क्योंकि अगर न्याय में देरी होती है, तो वो भी अन्याय बन जाता है.

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