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योगी को न कोई हरा पाया, न कोई हटा पाएगा! जानिए कैसे

साजिश रचने वालों को चेतावनी, मोदी ने बता दिया योगी बनेंगे प्रधानमंत्री

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 Yogi Adityanath : लखनऊ से दिल्ली। दिल्ली में एक बड़के साहब के घर से दूसरे बड़के साहब के घर तक, मीटिंग पर मीटिंग, फिर दिल्ली से लखनऊ, ऑफिस-ऑफिस मीटिंग-मीटिंग का दौर, फिर लखनऊ से बनारस चित्रकुट, प्रयागराज, कौशांबी, न जाने कहां कहां तक। ये दौड़ का अंत नहीं हैं साहब, क्योंकि कुर्सी पर जो बैठा है उनका नाम  Yogi Adityanath  है, जिन्हें न कोई हरा पाया, न हटा पाया, बाकि एक प्रयास और देखा जाएगा कि आख़िरी कील कहां और किसकों ठोकी जाती है ।



18 मार्च 2018 को जब लखनऊ से ये आवाज़ गूंजी थी कि, मैं आदित्यनाथ योगी। ईश्वर की शपथ लेता हूं कि। तो इसका मतलब यही था कि, अब यूपी में राज होगा एक मठ के महंथ का, जिसे राजनीति की हर एक रणनीति और परिभाषा पता ही नहीं, बल्कि हर उस रणनीति और राजनीति को कब कहां किससे कितना खेलना है ये भी बख़ूबी पता है ।

याद कीजिए वो वक़्त जब सीएम योगी के ख़िलाफ़ कुछ बीजेपी विधायकों की लॉबी तैयार कर विधानसभा में ही धरना दिलाने की बात सामने आई थी, जितनी रफ़्तार से ये ख़बर लखनऊ से दिल्ली तक पहुंची थी, उतनी ही रफ़्तार से ख़बर ग़ायब भी हुई थी और विधायक उससे दोगुना तेज़ी से अपने काम पर लौट चुके थे, कहा जाता है कि योगी के खिलाफ ये पहली साजिश थी, जिसे उन्होंने ऐसा तोड़ा कि 2017 में सीएम बनने वाले कई चेहरे स्टूल पर ही बैठे रह गए थे।

फिर न तो योगी के ख़िलाफ़ कोई सुर उठे, न ही साज़िश रची गई, बाकि 2019 में यूपी की 62 सीटों पर जीत दिलाकर योगी ने नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनने में कोई दिक़्क़त नहीं आने दी थी, इसके बाद 2021 की वो तस्वीर कौन भूल सकता है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ में योगी आदित्यनाथ के कंधे पर हाथ रखकर, 80-80 की लोकसभा, 402 विधानसभा के साथ साथ दिल्ली से लेकर यूएन तक को ये संदेश दे दिया था कि, भारत का भविष्य ये भगवा चोला वाला संन्यासी है, लेकिन फूलपुर, प्रयागराज, कौशांबी वालों को तब भी ये बात समझ नहीं आई थी शायद कि योगी को हटाने उनके बस की बात नहीं, बाकि जनता ने 2022 में फिर से प्रचंड बहुमत देकर योगी को बीजेपी का सबसे बड़े नेताओं की लाइन में लाकर खड़ा कर दिया ।

2022 में प्रचंड जीत मिली, कुछ लोग अपनी सीट हार गए, योगी पहली बार विधायकी लड़े जीत गए, तो कुर्सी हिलाने वाले शांत बैठ गए, लेकिन फिर आया 2024, लोकसभा चुनाव में सीटें इतनी कम हुई कि योगी के नेतृत्व पर ही सवाल उठने लगे, 2017 वालों के मंसूबे जाग गए, लगा सत्ता हासिल कर ली जाएगी, हर एक साज़िश रची गई, इतनी मीटिंग हुई जितना चुनाव प्रचार नहीं किया गया, लेकिन फिर हाथ क्या आया, कुछ नहीं और लौट जाना पड़ा उसी स्टूल पर जिसे छोड़कर कुर्सी की चाहत पाली थी  

लेकिन योगी के लिए इस दौर में पूरे दम के साथ खड़े रहना इतना आसान नहीं था, उसके पीछे पुराना संघर्ष था, ठीक वैसे ही जैसे सबसे बड़े राज्य के सबसे ताकतवर शख्सियत बनने के लिए योगी आदित्यनाथ ने कड़ा संघर्ष किया, तप किया, तपस्या की। तब जाकर अपना भौकाल बुलंद किया।

योगी आदित्यनाथ का सियासी सफर ?

1998 में पहली बार चुनाव लड़े सपा के जमुना प्रसाद निषाद को 26,206 वोट से हराया ।

1999 के चुनाव में योगी ने सपा के जमुना प्रसाद निषाद को 7,339 मत से हराया।

2004 में योगी ने फिर सपा के जमुना प्रसाद को 1,42,039 वोट से हराया।

2009 के चुनाव में योगी ने बीएसपी के विनय शंकर तिवारी को 2,20,271 वोटों से मात दी।

2014 में सांसदी का आख़िरी चुनाव लड़ा, सपा की राजमती निषाद को 3,12,783 वोटों से हराया।

2022 के विधानसभा चुनाव में पहली बार विधायकी का चुनाव लड़ा, सपा की संभावती शुक्ला को 1,03,390 वोटों से हराया।


मतलब साफ़ है जिसने एक मठ में रहते हुए राजनीति में ऐसी महारत हासिल कि है उसके खिलाफ स्टूल पर बैठकर साज़िश रचना नामुमकिन है, इसीलिए बेहतर होगा कि संगठन और सरकार में सामांज्स बैठाकर काम किया जाए, क्योंकि योगी को न कोई हरा पाया है, न कोई हटा पाएगा ।
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