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मुसलमानों को जिहाद के अलावा कुछ नहीं आता, भरी विधानसभा में उमर अब्दुल्ला ने क्यों कही इतनी बड़ी बात?

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा के विधायी जिहाद वाले बयान की कड़ी आलोचना की है. उन्होंने कहा कि हर बात में जिहाद नजर आता है, जब कोई अन्य सदस्य उनके धर्म के बारे में बात करता है तो उन्हें गुस्सा आ जाता है.

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साल 2024 में 10 साल बाद जम्मू-कश्मीर में चुनाव हुए थे, राजनीतिक पार्टियों ने जोर शोर से चुनाव में भाग लिया लेकिन जीत फारुख अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस ने हासिल की, उमर अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया गया। पहली बार जम्मू-कश्मीर में किसी मुख्यमंत्री ने संविधान की शपथ ली थी और उस शपथ के बाद उमर अब्दुल्ला की सरकार ने पहला बजट पेश किया, जिसमें जमकर फ्री की रेवड़ियां बांटी गईं। लेकिन इस बजट सत्र के दौरान सदन में एक बयान को लेकर गहमा-गहकी हो गई। दरअसल बयान था लीडर ऑफ अपोजिशन सुनील शर्मा का, जिसमें उन्होंने "जिहाद" शब्द का इस्तेमाल किया था। 

सुनील शर्मा के बयान का जिक्र करते हुए सदन में उमर अब्दुल्ला ने जवाब दिया। जवाब में सीएम ने कहा कि वह हर चीज में 'जिहाद' शब्द का इस्तेमाल करते हैं। जब कोई अन्य सदस्य उनके धर्म के बारे में बात करता है, तो उन्हें गुस्सा आ जाता है। क्या वह यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि मुसलमानों को 'जिहाद' के अलावा कुछ नहीं आता? यह गलत है। दूसरों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली किसी भी बात पर बात करने से बचना बेहतर है। हरियाणा के लोगों का जम्मू-कश्मीर में स्वागत है। अगर वह उन्हें किश्तवाड़ में अपने घर में बसाते हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

सुनील शर्मा ने सीएम पर आरोप लगाया कि वह दो-राष्ट्र सिद्धांत को बढ़ावा दे रहे हैं और बाहरी लोगों के घाटी में जमीन खरीदने का विरोध कर रहे हैं। इसी बात पर उमर अब्दुल्ला उखड़े हुए नजर आए और जवाब दिया। अब उमर अब्दुल्ला का विरोध भी समझ लीजिए... जब से धारा 370 खत्म की गई है, तब से देश का कोई भी नागरिक घाटी में जमीन खरीद सकता है, बस खेती की जमीन नहीं खरीदी जा सकती। इसका नोटिफिकेशन भी केंद्र सरकार ने 2020 में ही जारी कर दिया था, और इसे तत्काल प्रभाव से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में लागू भी कर दिया गया था। अब कश्मीर में जमीन खरीदने के लिए वहां का नागरिक होना जरूरी नहीं है। और जब सरकार ने यह नोटिफिकेशन जारी किया था, तब उमर अब्दुल्ला इस फैसले का विरोध किया था। उस वक्त उमर ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर के भूमि कानूनों में जो बदलाव किया गया है, वह स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अब कश्मीर की सेल चालू होगी और छोटे जमीन मालिकों को तकलीफ होगी।

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तो उमर अब्दुल्ला कितना भी विरोध क्यों न कर लें, जिसे जम्मू-कश्मीर में जमीन खरीदनी है, वह खरीद सकता है। तो क्या वाकई में यही समस्या है या कोई और मामला है, क्योंकि सुनील शर्मा ने यह भी आरोप लगाया है कि आप यहां अपने धर्म के आधार पर अलग दर्जा चाहते हैं? क्या भारत का पूरा संविधान यहां सिर्फ इसलिए लागू नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यहां मुस्लिम बहुलता है? हम ऐसा नहीं होने देंगे। और ये आरोप भी सुनील शर्मा ने तब लगाए हैं, जब उमर अब्दुल्ला की तरफ से कहा गया था कि जिस तरह से जनसंख्या कश्मीर में बढ़ रही है, उससे यहां भूमि संकट पैदा हो सकता है।

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तो यह साफ हो जाता है कि उमर अब्दुल्ला नए भूमि कानून के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते। जिसे जमीन खरीदनी है, वह वह खरीद सकता है, लेकिन आम आदमी या फिर कोई व्यापारी अगर जमीन खरीदता है तो वह यह भी सोचेगा कि जहां वह धंधा करने वाला है, वहां कोई विवाद न हो। लेकिन अगर केंद्र और राज्य का ऐसा टकराव देखने को मिलेगा तो राज्य की अर्थव्यवस्था पर फर्क जरूर पड़ेगा।

एक बात जो गौर करने वाली है, वह यह है कि जब से उमर अब्दुल्ला सीएम बने हैं, तब से वह कई बार केंद्र सरकार की तारीफ कर चुके हैं, कदमताल करते हुए चल भी रहे हैं, क्योंकि उन्हें कश्मीर के लिए बजट चाहिए और कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा भी चाहिए। और पूर्ण राज्य का दर्जा केंद्र से टकराकर तो मिलने से रहा। हां, यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि केंद्र ने कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने से इंकार नहीं किया है, बस शर्त यह है कि जब कश्मीर में हालात सामान्य हो जाएंगे, तब कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया जाएगा। तो फिलहाल तो हालात सामान्य ही चल रहे हैं, सदन में गर्मा-गर्मी जरूर चल रही है, जो कि आम बात भी है।

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