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उपराष्ट्रपति पद के लिए राधाकृष्णन का नाम लाकर मोदी ने चला दिया 'मास्टरस्ट्रोक'... राजनाथ सिंह ने कर ली खरगे से बात, असमंजस में पड़े उद्धव और स्टालिन!

एनडीए ने उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाया है. 9 सितंबर को होने वाले चुनाव में राजनाथ सिंह कमान संभालेंगे और किरेन रिजिजू चुनावी एजेंट होंगे. दक्षिण भारत से आने वाले राधाकृष्णन का नाम बीजेपी का रणनीतिक दांव माना जा रहा है, जिससे विपक्षी खेमे खासकर डीएमके, एआईएडीएमके और उद्धव ठाकरे की शिवसेना पर दबाव बढ़ सकता है.

Rahul Gandhi, MK Stalin (File Photo)
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केंद्र की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ी चर्चा उपराष्ट्रपति चुनाव की है. रविवार की देर शाम बीजेपी ने एनडीए गठबंधन की ओर से महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को उम्मीदवार घोषित कर दिया है. जैसे ही नाम का ऐलान हुआ, राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई. हालाँकि विपक्ष ने अभी तक अपना पत्ता नहीं खोला है लेकिन भाजपा के इस दांव को मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है. वही खबर यह भी निकलकर सामने आ रही है कि भाजपा ने समर्थन जुटाने की रणनीति पर तेजी से काम शुरू कर दिया है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष खरगे, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन, नवीन पटनायक समेत विपक्ष के कई नेताओं से फोन पर बात की और उपराष्ट्रपति पद के लिए एनडीए के उम्मीदवार राधाकृष्णन के लिए समर्थन मांगा. 

क्यों खास है सीपी राधाकृष्णन का नाम?

दरअसल, सीपी राधाकृष्णन दक्षिण भारत के तमिलनाडु से आते हैं और वर्तमान में महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं. भाजपा ने उन्हें उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर एक साथ कई राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश की है. पहला, दक्षिण भारत में बीजेपी की पकड़ अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाती है. ऐसे में तमिलनाडु के बड़े नेता को आगे लाकर पार्टी ने क्षेत्रीय राजनीति में सेंधमारी का इशारा दिया है. दूसरा, राधाकृष्णन महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं. ऐसे में विपक्ष की इंडिया गठबंधन में शामिल उद्धव ठाकरे की शिवसेना के लिए उनका विरोध करना आसान नहीं होगा. अगर वे समर्थन नहीं देते हैं तो संदेश जाएगा कि उन्होंने अपने ही राज्यपाल के खिलाफ वोट किया. तीसरा, राहुल गांधी के क़रीबी केंद्र की राजनीति में एनडीए का विरोध करने वाले डीएमके और एआईएडीएमके दोनों के लिए राधाकृष्णन के नाम का विरोध करना राजनीतिक रूप से कठिन होगा क्योंकि वे तमिलनाडु की पहचान रखते हैं.

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विपक्ष की कशमकश

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एनडीए उम्मीदवार की घोषणा के बाद विपक्षी खेमे में असमंजस की स्थिति है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने समर्थन की अपील की है. इस बीच उद्धव ठाकरे की शिवसेना और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन भी दबाव में हैं. संजय राउत ने राधाकृष्णन को “अच्छा इंसान और अनुभवी नेता” बताकर शुभकामनाएं दीं. उनका यह बयान साफ संकेत देता है कि शिवसेना (यूबीटी) खुलकर विरोध की राह नहीं चुन पाएगी. वहीं, डीएमके के लिए भी अपने राज्य के नेता के खिलाफ खड़ा होना आसान नहीं होगा.

सत्ता की पुरानी रणनीति

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राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में अक्सर देखा गया है कि सत्तापक्ष विपक्षी खेमे में सेंधमारी करता रहा है. साल 2007 में यूपीए ने प्रतिभा पाटिल को उम्मीदवार बनाया था. शिवसेना, जो उस समय एनडीए का हिस्सा थी, महाराष्ट्र की बेटी होने के कारण यूपीए के साथ चली गई थी. इसके बाद जब  2012 में प्रणब मुखर्जी मैदान में थे तो जेडीयू और शिवसेना ने भी यूपीए को वोट दिया था. इसी तरह 2017 में जब एनडीए ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया तो जेडीयू विपक्ष में रहते हुए भी उनके समर्थन में उतर आया था. और फिर जब 2022 के उपराष्ट्रपति चुनाव में जगदीप धनखड़ को उतारकर भाजपा ने ममता बनर्जी की पार्टी को असहज कर दिया था, और आखिरकार टीएमसी मतदान से दूर रही. इतिहास गवाह है कि ऐसे चुनावों में दल बदलते रुख आम बात होती है और इस बार भी तस्वीर और परिस्थिति कुछ ऐसी ही दिख रही है.

भाजपा की रणनीति और चुनावी गणित

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने साफ कहा है कि वे विपक्ष से भी बात करेंगे और कोशिश करेंगे कि चुनाव निर्विरोध हो. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इस चुनाव में समर्थन जुटाने की कमान संभालेंगे जबकि किरेन रिजिजू चुनाव एजेंट की भूमिका निभाएंगे. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि भाजपा का यह कदम न सिर्फ विपक्षी दलों को उलझाने वाला है बल्कि दक्षिण भारत में अपनी राजनीतिक जड़ें मजबूत करने का भी बड़ा प्रयास है.

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बता दें कि 9 सितंबर को होने वाले इस चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है. विपक्ष किसे उतारता है, यह अभी साफ नहीं है लेकिन भाजपा का दांव इतना मजबूत माना जा रहा है कि विरोधी खेमे के लिए राह आसान नहीं होगी. सीपी राधाकृष्णन का नाम विपक्षी दलों के लिए मुश्किलों का पहाड़ खड़ा कर चुका है. ऐसे में अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कांग्रेस, डीएमके और शिवसेना जैसे दल आखिर किस रुख के साथ मैदान में उतरेंगे.

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