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केजरीवाल ने फिर दोहराई 'नोबेल प्राइज' की चाहत, कहा- 'रुकावटों के बीच भी दिल्ली में रचा विकास का इतिहास'

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक बार फिर नोबेल पुरस्कार पाने की इच्छा जताई है. मोहाली में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि एलजी की रुकावटों के बावजूद उनकी सरकार ने दिल्ली में कई महत्वपूर्ण कार्य किए, जिनमें मोहल्ला क्लीनिक जैसी योजनाएं शामिल हैं

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दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल एक बार फिर चर्चा में हैं, और इस बार वजह है उनका नोबेल पुरस्कार पाने की इच्छा दोहराना. पंजाब के मोहाली में हुए एक बुक लॉन्च इवेंट में उन्होंने कहा कि उन्हें शासन और प्रशासन में किए गए अद्भुत कार्यों के लिए नोबेल प्राइज मिलना चाहिए. इस कार्यक्रम में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और आम आदमी पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता भी मौजूद थे. केजरीवाल का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नोबेल पुरस्कार को लेकर चर्चाएं तेज हैं. खासतौर पर अमेरिका केराष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेकर पाकिस्तान और इजरायल के प्रस्तावों ने इस बहस को और धार दी है.

एलजी के रहते भी किया काम
केजरीवाल का दावा है कि उन्होंने दिल्ली में उपराज्यपाल (एलजी) की लगातार रुकावटों और केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बावजूद विकास के कई कामों को अंजाम दिया. उनका कहना है कि एक ओर जहां दिल्ली सरकार के हर काम में अड़ंगे लगाए गए, वहीं दूसरी ओर उन्होंने जनता के हित में बिना रुके काम किया. मोहल्ला क्लीनिक जैसे मॉडल स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में क्रांतिकारी साबित हुए, जिन्हें कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी सराह चुकी हैं. उन्होंने बताया कि पांच मोहल्ला क्लीनिक तो नगर निगम ने बुलडोजर भेजकर तुड़वा दिए, फिर भी दिल्ली सरकार रुकी नहीं. 

केजरीवाल ने गिनाए काम
केजरीवाल ने मोहाली के मंच से अपनी उपलब्धियों की एक लंबी सूची दोहराई. उन्होंने कहा कि दिल्ली में गर्मियों के दिनों में, जब पारा 50 डिग्री तक पहुंचा, तब भी बिजली आपूर्ति बाधित नहीं हुई. उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी स्कूलों के कायाकल्प और स्वच्छ जल वितरण को अपनी सरकार की बड़ी उपलब्धि बताया. उनका यह भी आरोप था कि मौजूदा नगर निगम और केंद्र सरकार दिल्ली को जानबूझकर बर्बाद कर रहे हैं. उनका दावा है कि “हमने बिना भ्रष्टाचार के दिल्ली को एक नई दिशा दी है, इसलिए मुझे प्रशासनिक कामों के लिए नोबेल मिलना चाहिए.”

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क्या वास्तव में मिलता है शासन-प्रशासन के लिए नोबेल?
नोबेल पुरस्कार की शुरुआत 1901 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार हुई थी. यह पुरस्कार आज तक कुल छह श्रेणियों में दिया जाता है: भौतिकी, रसायन विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य, शांति और अर्थशास्त्र. अब तक 976 व्यक्तियों और 28 संगठनों को यह सम्मान प्राप्त हो चुका है. प्रशासन या सुशासन के लिए आज तक कोई अलग श्रेणी नहीं बनी है. हालांकि कुछ शांति पुरस्कार ऐसे नेताओं को जरूर मिले हैं जिन्होंने मानव अधिकारों, लोकतंत्र और सामाजिक बदलाव के लिए काम किया हो. लेकिन केजरीवाल जिस तरह से खुद को शासन के क्षेत्र में नोबेल के योग्य बता रहे हैं, उसकी कोई मिसाल अब तक इतिहास में दर्ज नहीं है.

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पहले भी कर चुके हैं नोबेल की बात
यह पहली बार नहीं है जब अरविंद केजरीवाल ने नोबेल पुरस्कार को लेकर अपनी उम्मीद जाहिर की हो. 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान भी उन्होंने ऐसे ही शब्दों में कहा था कि अगर एलजी के तमाम अड़ंगों के बावजूद उनकी सरकार ने दिल्ली में इतने सारे कार्य किए हैं, तो वह नोबेल के हकदार हैं. यह बात उन्होंने व्यंग्य के लहजे में कही थी या गंभीरता से, यह तो वह ही बेहतर समझ सकते हैं, लेकिन जनता और मीडिया ने इस बयान को हल्के में नहीं लिया.

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बताते चलें कि अरविंद केजरीवाल की यह इच्छा कि उन्हें शासन और प्रशासन के लिए नोबेल पुरस्कार मिले, निश्चित रूप से एक बड़ा और असामान्य दावा है. उन्होंने दिल्ली में जनहित के कई कार्य किए हैं, इसमें दो राय नहीं. मगर नोबेल पुरस्कार के लिए जिस वैश्विक मान्यता और वर्गीकरण की जरूरत होती है, वह अभी तक शासन व्यवस्था के अंतर्गत नहीं आती. फिर भी, यदि भविष्य में इस क्षेत्र के लिए कोई नई श्रेणी बनती है, और अगर उनके कार्यों को वैश्विक समुदाय मान्यता देता है, तो हो सकता है उनकी यह इच्छा कभी साकार हो. फिलहाल, यह बयान राजनीति और मीडिया में नई चर्चा का विषय बन गया है. 

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