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जस्टिस वर्मा विवाद, दो मंत्रियों का फोन और धनखड़ का इस्तीफा... क्या यही है पूरी कहानी का सच?

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक असली वजह जस्टिस यशवंत वर्मा को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव है. धनखड़ ने विपक्ष के प्रस्ताव को मंज़री दी, जबकि सरकार के प्रस्ताव पर चुप्पी साधी. इस्तीफे से पहले केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और किरेन रिजिजू ने फोन कर उनसे बात की, लेकिन धनखड़ ने साफ कहा कि वह नियमों के दायरे में काम कर रहे हैं.

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भारत के संवैधानिक ढांचे में उपराष्ट्रपति का पद बेहद गरिमापूर्ण और निर्णायक होता है. यही कारण है कि जब मौजूदा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने संसद के मानसूत्र सत्र की शुरुआत के दिन अचानक इस्तीफा दिया, तो देशभर में राजनीतिक हलचल तेज हो गई. स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर दिया गया यह इस्तीफा सिर्फ एक औपचारिक कारण लगता है. लेकिन इसके पीछे की कहानी कहीं ज्यादा जटिल और राजनीतिक प्रतीत हो रही है. हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार इस्तीफे से ठीक पहले दो वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों ने धनखड़ से संपर्क किया था, और यह बातचीत किसी सामान्य राजनीतिक औपचारिकता से कहीं आगे की लगती है.

जस्टिस यशवंत वर्मा को लेकर फंसा मामला 

इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें एक नाम से जुड़ी हैं जस्टिस यशवंत वर्मा. खबरों के मुताबिक जस्टिस वर्मा के खिलाफ एक प्रस्ताव लाने की तैयारी चल रही थी, जिसमें विपक्ष ने पहले कदम बढ़ाया और उपराष्ट्रपति धनखड़ ने विपक्ष के प्रस्ताव को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया. यही वो कारण था जिसने केंद्र सरकार और उपराष्ट्रपति के बीच एक स्पष्ट असहमति को जन्म दिया. रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार की ओर से भी एक प्रस्ताव लाने की मंशा थी, लेकिन धनखड़ ने उसपर किसी तरह की प्रतिक्रिया या समर्थन नहीं जताया. 

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केंद्रीय मंत्रियों ने किया कॉल 

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जिस वक्त धनखड़ ने विपक्ष के प्रस्ताव को स्वीकार किया, उसके ठीक बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने उन्हें फोन किया. यह कॉल केवल औपचारिक चर्चा नहीं थी, बल्कि प्रधानमंत्री की नाराज़गी का संदेश लेकर आई थी. बताया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद उपराष्ट्रपति के इस निर्णय से अप्रसन्न थे. लेकिन धनखड़ ने बेहद संयमित और संविधान सम्मत जवाब दिया "मैं नियमों के दायरे में रहकर काम कर रहा हूं."

प्रोटोकॉल तोड़कर राष्ट्रपति भवन पहुंचे उपराष्ट्रपति

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धनखड़ का इस्तीफा जितना अप्रत्याशित था, उससे कहीं अधिक चौंकाने वाला था उनका तरीका. आमतौर पर राष्ट्रपति से मुलाकात पहले से तय होती है, जिसका पूरा प्रोटोकॉल होता है. लेकिन धनखड़ सीधे राष्ट्रपति भवन पहुंच गए और राष्ट्रपति से मिलकर अपना इस्तीफा सौंप दिया. यह कदम न सिर्फ राजनीतिक हलकों में बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं के दायरे में भी चर्चाओं का विषय बन गया. यह साफ संकेत था कि उपराष्ट्रपति अब किसी तरह का विवाद या असमंजस अपने साथ लेकर नहीं चलना चाहते थे.

धनखड़ का राजनीतिक सफर और इस्तीफे के मायने

जगदीप धनखड़ का राजनीतिक जीवन राजस्थान की सियासत से शुरू होकर राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचा. एक वक्त उन्होंने कांग्रेस का भी हिस्सा बनने की कोशिश की, लेकिन भाजपा के नेतृत्व में उन्होंने उपराष्ट्रपति का पद हासिल किया. उनके कार्यकाल में कई बार उन्होंने अपने निर्णयों से यह दिखाया कि वे केवल एक औपचारिक पद पर नहीं, बल्कि स्वतंत्र और सशक्त सोच रखने वाले व्यक्ति हैं. ऐसे में उनका यह इस्तीफा केवल स्वास्थ्य कारणों की कहानी नहीं हो सकती. यह एक संकेत है कि वे किसी दबाव या समझौते की राजनीति का हिस्सा बनने को तैयार नहीं थे.

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बताते चलें कि धनखड़ के इस्तीफे के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगला उपराष्ट्रपति कौन होगा? क्या सरकार किसी ऐसे नाम को सामने लाएगी जो पूरी तरह उनके निर्णयों के साथ खड़ा हो? या विपक्ष भी अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश करेगा? यह तय है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे को लेकर राज्यसभा और राजनीतिक गलियारों में काफी हलचल देखने को मिलेगी. 

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