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पनामा के हिंदू मंदिर में पहुंचे JMM के सांसद सरफराज अहमद, पूजा में हुए शामिल, हर तरफ हो रही तारीफ

झारखंड मुक्ति मोर्चा के राज्यसभा सांसद सरफराज अहमद इन दिनों अंतरराष्ट्रीय दौरे पर हैं, जहाँ उन्होंने पनामा के एक मंदिर में पूजा-अर्चना कर सबको चौंका दिया. शशि थरूर के नेतृत्व में गए इस प्रतिनिधिमंडल में सभी धर्मों के सांसद थे, लेकिन एक मुस्लिम सांसद द्वारा मंदिर में पूजा करना सांप्रदायिक एकता की मिसाल बन गया.

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भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण कम ही देखने को मिलते हैं, जब कोई नेता अपने धार्मिक दायरे से बाहर निकलकर देश की संस्कृति और एकता का प्रतीक बन जाए. ऐसा ही एक भावुक दृश्य तब सामने आया जब झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के राज्यसभा सांसद सरफराज अहमद ने पनामा सिटी के भारतीय सांस्कृतिक केंद्र में स्थित मंदिर में पूजा-अर्चना की और उस दौरान जो उन्होंने कहा उसने सबका दिल जीत लिया है, “जब बुलाने वालों को ऐतराज नहीं, तो जाने वालों को ऐतराज क्यों होगा?

यह दौरा उस समय हुआ जब भारतीय सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल अमेरिका, ब्राजील, कोलंबिया, पनामा और गुयाना के दौरे पर था. इस दल का नेतृत्व कांग्रेस सांसद शशि थरूर कर रहे हैं. उन्होंने मंदिर में सभी सांसदों की तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि यह दृश्य बेहद भावुक था जब मुस्लिम सांसद सरफराज अपने हिंदू और सिख साथियों के साथ मंदिर में पूजा करते नजर आए. 

कौन हैं सरफराज अहमद?

सरफराज अहमद का नाम झारखंड और बिहार की राजनीति में एक जाना-पहचाना नाम है. वर्तमान में वो झारखंड मुक्ति मोर्चा के राज्यसभा सांसद हैं. उन्होंने 1980 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर गांडेय विधानसभा सीट से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया और जीत हासिल की. 1984 में वे गिरिडीह लोकसभा सीट से सांसद बने. इसके बाद उन्होंने बिहार विधान परिषद में भी प्रतिनिधित्व किया. 2009 में उन्होंने जेएमएम का दामन थामा और दोबारा गांडेय से विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने। 2019 में भी वे चुनाव जीतकर विधायक बने और 2023 में उन्हें राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुना गया। वे बिहार और झारखंड के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं जिन्होंने विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा, सभी सदनों का प्रतिनिधित्व किया है.

जब सरफराज अहमद पहुंचे मंदिर

पनामा के मंदिर में जब मुस्लिम सांसद सरफराज अहमद अपने हिन्दू और सिख साथियों के साथ पूजा-अर्चना में शामिल हुए, तो यह दृश्य हर किसी के दिल को छू गया. यह महज़ एक धार्मिक क्रिया नहीं थी, बल्कि यह उस भारत की तस्वीर थी, जो मज़हब से ऊपर उठकर इंसानियत को प्राथमिकता देता है. शशि थरूर ने भी इस क्षण की सराहना करते हुए सोशल मीडिया पर तस्वीर साझा की और लिखा कि यह दृश्य भावुक कर देने वाला था. उन्होंने सरफराज अहमद के उस वक्तव्य का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था, “जब बुलाने वालों को ऐतराज नहीं, तो जाने वालों को ऐतराज क्यों होगा?”

इस अंतरराष्ट्रीय दौरे के दौरान सरफराज अहमद का मंदिर में पूजा करना केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि यह भारत की सामाजिक संरचना और बहुलता की ताकत को दर्शाता है. जहां दुनिया में धार्मिक असहिष्णुता के उदाहरण बढ़ रहे हैं, वहीं यह घटना भारत की सहिष्णुता और साझा संस्कृति की ताकत को उजागर करती है. यह पहल न केवल भारत की वैश्विक छवि को मजबूत करती है, बल्कि आने वाले समय में ऐसी और घटनाओं के लिए प्रेरणा भी बन सकती है. सरफराज अहमद का यह कदम भारतीय राजनीति में धार्मिक समावेशिता और आपसी सम्मान की एक नई मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है.
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