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‘ब्रिटिश नहीं, भारतीय हमारे हीरो, उन्होंने दिलाई आजादी’ इजरायल ने ‘बैटल ऑफ हाइफा’ का जिक्र कर सुनाई शौर्यगाथा

हाइफा के मेयर योना यहाव ने कहा कि, हाइफा शहर के स्कूलों की इतिहास की किताबों में सुधार किया जा रहा है. ताकि यह दर्ज हो कि हाइफा को ब्रिटिश नहीं बल्कि भारतीय सैनिकों ने ओटोमन साम्राज्य से आजाद कराया था.

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23 सितंबर 1918 जब मशीन गन भारतीय रणबांकुरों के आगे बेदम हो गईं. घोड़े पर सवार भारतीय सेना ने इजरायल में तुर्की मोर्चाबंदी को ढहा दिया. इस ऐतिहासिक जंग को नाम दिया गया बैटल ऑफ हाइफा. जिसने भारत और इजरायल के बीच दोस्ती के ऐसे आयाम गढ़े जो हमेशा-हमेशा के लिए मिसाल बन गए. आज एक बार फिर इस जंग का जिक्र इसलिए हुआ है क्योंकि हाइफा के मेयर ने भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस को सराहते हुए बड़ी बात कही है. 

इजरायल में बैटल ऑफ हाइफा में शहादत देने वाले भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि दी गई. इस दौरान हाइफा के मेयर योना यहाव ने सैनिकों के पराक्रम को याद किया. हाइफा की जंग में घोड़े पर सवार जोधपुरी लांसरो ने कैसे दुश्मनों को हर मोर्चे पर मात दी थी इसके बारे में बताया गया. योना यहाव ने कहा कि, हाइफा शहर के स्कूलों की इतिहास की किताबों में सुधार किया जा रहा है. ताकि यह दर्ज हो कि हाइफा को ब्रिटिश नहीं बल्कि भारतीय सैनिकों ने ओटोमन साम्राज्य से आजाद कराया था. 

भारतीय सैनिकों ने दिलाई हाइफा को आजादी 

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मेयर योना यहाव ने कहा, ‘मैं इस शहर में पैदा हुआ और पढ़ाई की। हमें हमेशा बताया गया कि ब्रिटिशों ने हाइफा को आजाद कराया, लेकिन ऐतिहासिक सोसायटी ने शोध कर यह साफ किया कि असल में भारतीय सैनिकों ने हमें आजादी दिलाई. इस दौरान मेयर यहाव ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा, अब हर स्कूल में यह पढ़ाया जाएगा कि हाइफ़ा को ब्रिटिश नहीं बल्कि भारतीयों ने मुक्त कराया था. 

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इजरायल में हर साल भारतीय सैनिकों के बलिदान को याद किया जाता है. हाइफा शहर में खास तौर पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम रखा जाता है. इस लड़ाई में कैप्टन अमन सिंह जोधा और मेजर दलपत सिंह शेखावत ने निर्णायक भूमिका निभाई थी. भारतीय सैनिकों ने ये लड़ाई तलवारों और भालों के साथ लड़ी. जबकि, तुर्की वालों के पास मशीनगन और तोप थीं, लेकिन तुर्कियों पर भारत का घुड़सवार दस्ता भारी पड़ गया. भारत में आज भी यूथ सैनिकों के इस पराक्रम से अंजान है लेकिन इजरायल भारतीय सैनिकों के इस गौरवशाली इतिहास और बलिदान को याद करता रहा है. 

क्या है बैटल ऑफ हाइफा? 

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हाइफा की लड़ाई (Battle of Haifa) प्रथम विश्व युद्ध (World War) के अंतिम चरणों में लड़ी गई एक एतिहासिक लड़ाई थी. साल 1918 में जब ब्रिटिश सेना के तहत भारतीय घुड़सवार दस्तों ने ओटोमन साम्राज्य और उनके जर्मन सहयोगियों की सेनाओं को हराकर हाइफा शहर को मुक्त कराया. जहां घोड़ों पर सवार सैनिकों ने मशीनगनों और तोपों से लैस दुश्मन को तलवारों और भालों से हराया. भारतीय सैनिकों की बहादुरी के लिए आज भी भारत और इज़राइल में इसे याद किया जाता है. हर साल 23 सितंबर को 'हाइफा दिवस' के रूप में मनाया जाता है. 

इस युद्ध के हीरो मेजर दलपत सिंह रहे. जिन्होंने जोधपुर लांसर्स की कमान संभाली. जोधपुर रियासत की सेना में लगभग 500 सैनिक थे. इसके अलावा मैसूर और हैदराबाद रियासतों ने भी युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी. युद्ध में जब दलपत सिंह घायल हुए तब कैप्टन अमन सिंह जोधा ने सैनिकों को प्रेरित किया और चार्ज को जारी रखा. कुछ ही घंटों में उन्होंने हाइफा पर कब्जा कर लिया लेकिन अगले दिन दलपत सिंह शहीद हो गए.

भारतीय सैनिकों की याद में बने स्मारक

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भारतीय सैनिकों की याद में हाइफा के साथ-साथ यरुशलम और रमेल में उनके स्मारक बने हुए हैं. यहां लगभग 900 भारतीय सैनिक दफन हैं. साल 2018 में इजरायल पोस्ट ने भारतीय सैनिकों के नाम एक डाक टिकट भी जारी किया था. इससे पहले साल 2017 में PM नरेंद्र मोदी ने हाइफा में भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि दी थी. यहां उन्होंने मेजर दलपत सिंह की याद में पट्टिका का अनावरण भी किया था. इसके एक साल बाद 2018 में दिल्ली में तीन मूर्ति चौक का नाम बदलकर तीन मूर्ति हाइफा चौक कर दिया गया. 

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इसके अलावा जोधपुर और मैसूर में भी शहीदों की स्मारक हैं. अब जोधपुर और मैसूर लांसर्स 61वीं कैवलरी रेजिमेंट में विलय हो चुकी हैं, जो हर साल हाइफा दिवस मनाती है. ये युद्ध भारत और इजरायल के बीच संबंध मजबूत करने में अहम कदम था. हाइफ़ा का युद्ध इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है. जहां भारतीय सैनिकों ने शहर को आजाद कराने के लिए बेजोड़ साहस के साथ लड़ाई लड़ी. उनके साहस को हाइफा के मेयर ने किताबों में दर्ज करने का ऐलान कर दिया है. ताकि, आने वाली पीढ़ियां भी इस युद्ध की सच्चाई से वाकिफ हो सकें कि जंग के असली हीरो ब्रिटिश सैनिक नहीं बल्कि भारतीय हैं. 

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