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मुंह ताकते रह गए चीन और रूस... दोनों को पछाड़ भारत बन गया 'बाघों का गढ़', ये हैं 5 मुख्य वजहें

International Tiger Day: 29 July को International Tiger Day मनाया जा ता है. बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है, और बीते 15-16 सालों में देश में बाघों की संख्या में वृद्धि आई है. अब बारत मेंइनकी संख्या 3,100 से अधिक हो गई है. आईये इस खास दिन पर जानते हैं की कैसे भारन ने इस उपलब्धि हासिल करने के सथ रूस और चीन दोनों को पीछे छोड़ दिया.

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भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ, जो अपनी शान, खूबसूरती और ताकत के लिए मशहूर है. पिछले कुछ दशकों में इनकी संख्या में भारी गिरावट देखी गई थी, कहा जाने लगा था कि ये अब अपनी विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई है. भारत, रूस और चीन जैसे देशों में बाघ पाए जाते हैं, लेकिन हाल के वर्षों में भारत ने बाघों के संरक्षण और संख्या के मामले में बाकी देशों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. दरअसल, आज की स्थिति में रूस और चीन की तुलना भारत से की भी नहीं जा सकती.  बाघों की संख्या के लिहाज़ से भारत निर्विवाद रूप से सबसे आगे है.
भारत सरकार द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, देश में बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है — और यह वृद्धि लगभग हर राज्य में देखने को मिल रही है. इसके विपरीत, रूस और चीन में बाघों की आबादी में यह बढ़ोतरी उतनी उल्लेखनीय नहीं रही है. इंटरनेशनल टाइगर डे के अवसर पर आइए जानें कि भारत ने यह उपलब्धि आखिर कैसे हासिल की? इसके पीछे कौन-सी पांच प्रमुख वजहें हैं, जिन्होंने भारत को बाघ संरक्षण के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी बना दिया है?

रूस, चीन और भारत में बाघों की संख्या 
भारत- वर्ल्ड पॉपुलेशन की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बाघों की संख्या 3,100 से अधिक हो चुकी है, जो वैश्विक बाघ आबादी का लगभग 75% हिस्सा है. वर्ष 2006 में यह संख्या मात्र 1,411 थी, यानी पिछले 15-16 वर्षों में देश में बाघों की आबादी दोगुनी से भी अधिक हो गई है. यह वृद्धि न केवल संरक्षण प्रयासों की सफलता को दर्शाती है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को भी रेखांकित करती है.

रूस- रूस में मुख्य रूप से साइबेरियन बाघ (अमूर टाइगर) पाए जाते हैं. ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, रूस में इनकी संख्या लगभग 750 है. हालांकि रूस ने भी संरक्षण के लिए कई प्रयास किए हैं, लेकिन वहां का कठोर जलवायु, विशाल और जटिल भौगोलिक क्षेत्र, और शिकार की चुनौतीपूर्ण स्थिति भारत की तुलना में काफी अलग और कठिन है.

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चीन- चीन की स्थिति और भी चिंताजनक है. वहां अब केवल लगभग 20 वन्य बाघ बचे हैं, जिनमें मुख्यतः दक्षिण चीन टाइगर और कुछ अमूर टाइगर शामिल हैं. चीन में बाघों की घटती संख्या के पीछे प्रमुख कारण हैं. अवैध शिकार, प्राकृतिक आवास की भारी कमी, और बाघों के संरक्षण में अपेक्षित नीति और प्रयासों की सीमित सफलता.

ग्राफिक्स के जरिए जानिए किस देश में कितने बाघ हैं-

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वो पांच कारण जिससे भारत में सबसे ज्यादा बाघों की संख्या हैं
1- प्रोजेक्ट टाइगर और उसके पीछे की रणनीति
वर्ष 1973 में भारत सरकार ने ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की शुरुआत की थी, जिसका मुख्य उद्देश्य बाघों की गिरती संख्या को थामना और उनके प्राकृतिक आवासों का संरक्षण करना था. इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत अब तक देशभर में 54 टाइगर रिज़र्व स्थापित किए जा चुके हैं, जो लगभग 75,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले हुए हैं. सरकार ने बाघों की निगरानी, संरक्षण और आवास विस्तार के लिए विशेष बजट आवंटित किया है, जिसमें समय के साथ निरंतर वृद्धि की गई है. बाघों की सटीक गणना और प्रभावी संरक्षण रणनीतियां तैयार करने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों जैसे कैमरा ट्रैप और डीएनए विश्लेषण का व्यापक रूप से उपयोग किया गया है. इन प्रयासों ने न केवल बाघों की वास्तविक संख्या को जानना संभव बनाया, बल्कि संरक्षण के काम को भी अधिक वैज्ञानिक और सटीक दिशा दी है.

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2- शिकारियों के विरुद्ध सख्त कदम और कानूनी प्रावधान
भारत में वर्ष 1972 में लागू किए गए वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत बाघों के शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है. इस कानून के तहत शिकारियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाती है, जिससे शिकार पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हुआ है. इसके अलावा, नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) जैसी संस्थाओं ने निगरानी प्रणाली को सुदृढ़ किया है और संरक्षण से जुड़े नियमों के पालन को और अधिक प्रभावशाली बनाया है.
 
3- बाघ संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका
भारत में बाघ संरक्षण को केवल सरकारी नीति तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया गया है. कई टाइगर रिज़र्व क्षेत्रों में ग्रामीणों को बाघ पर्यटन से रोजगार के अवसर प्राप्त हुए हैं, जिससे वे न सिर्फ आर्थिक रूप से सशक्त हुए हैं, बल्कि बाघों के संरक्षण में स्वाभाविक साझेदार भी बन गए हैं. मानव-बाघ संघर्ष की समस्या से निपटने के लिए सरकार ने मुआवजा योजनाएं लागू की हैं, ताकि फसल या मवेशियों के नुकसान की भरपाई तुरंत की जा सके. साथ ही, जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को यह समझाया गया है कि बाघों का अस्तित्व प्रकृति और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए कितना आवश्यक है.

4- वन संरक्षण के लिए कटाई और खनन पर सख्त नियंत्रण
भारत ने बाघों के प्राकृतिक आवासों को संरक्षित करने और उनका विस्तार करने के लिए कई ठोस पहल की हैं. जंगलों की अंधाधुंध कटाई पर नियंत्रण, अवैध खनन पर रोकथाम, और बाघों के लिए सुरक्षित वन्य कॉरिडोर (Wildlife Corridors) का निर्माण — ये सभी प्रयास बाघों को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक निर्बाध रूप से और सुरक्षित रूप से जाने में मदद करते हैं. इससे उनकी प्रजनन क्षमता, अनुवांशिक विविधता और जीवित रहने की संभावना में उल्लेखनीय सुधार हुआ है. 

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5- अवैध शिकार और तस्करी पर सख्त नियंत्रण
भारत में बाघों के शिकार और उनके अंगों के अवैध व्यापार पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया गया है. वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो (WCCB) जैसी विशेष एजेंसियां लगातार निगरानी करती हैं और अंतरराज्यीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस प्रकार के अपराधों के विरुद्ध कार्रवाई करती हैं. भारत ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से भी बाघों से जुड़े अंगों के अवैध व्यापार पर लगाम लगाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है.

इंटरनेशनल टाइगर्स डे मनान की वजह क्या है?
बाघों के संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता फैलाने और घटती बाघ आबादी को बचाने के उद्देश्य से वर्ष 2010 में इंटरनेशनल टाइगर्स डे मनाने की शुरुआत हुई. यह निर्णय रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में लिया गया था, जहां दुनिया भर के 13 बाघ रेंज देशों ने भाग लिया. इस सम्मेलन में सभी देशों ने यह संकल्प लिया कि वर्ष 2022 तक वैश्विक बाघ आबादी को दोगुना किया जाएगा, जिसे 'TX2 लक्ष्य' के रूप में जाना गया. 
भारत ने इस लक्ष्य को समय से पहले पूरा कर न केवल वैश्विक मंच पर एक मिसाल कायम की, बल्कि यह भी साबित किया कि ठोस नीतियों, राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनभागीदारी से बाघों जैसे संकटग्रस्त प्रजातियों को भी संरक्षित किया जा सकता है. 

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