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2000 साल पुरानी तकनीक से बना, ना बिजली, ना नेविगेशन...फिर भी INS ‘कौंडिन्य’ ने रचा इतिहास, 17 दिन में पहुंचा भारत से ओमान

भारतीय नौसेना का पोत INSV कौंडिन्या, पोरबंदर से अपनी पहली यात्रा सफलतापूर्वक पूरी करने के बाद मस्कट पहुंच गया. इस जहाज को करीब 2000 साल पुरानी तकनीक से बनाया गया है, जिसमें ना बिजली, ना लेटेस्ट नेविगेशन सिस्टम और ना ही कोई आधुनिक सुविधा थी, क्रू के लोगों ने 17 दिन केवल खिचड़ी खाकर अपना समय व्यतीत किया.

ओमान के मस्कट पहुंची INS कौंडिन्य
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भारतीय नौसेना के नौकायन पोत आईएनएसवी कौंडिन्य ने गुजरात के पोरबंदर से ओमान के मस्कट तक अपनी पहली यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की है. यह भारत की समुद्री कूटनीति और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने में एक महत्वपूर्ण कदम है. इस जहाज की प्रेरणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी थी और इसका डिजाइन अजंता की गुफाओं में दिखाए गए पांचवीं शताब्दी के जहाज से लिया गया है. यह यात्रा अरब सागर में 17 दिनों तक चली. पोर्ट सुल्तान काबूस में केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी एवं जलमार्ग मंत्री (एमओपीएसडब्ल्यू) सर्बानंद सोनोवाल ने पोत और उसके चालक दल का स्वागत किया.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर आईएनएसवी कौंडिन्य के मस्कट पहुंचने की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि आईएनएसवी कौंडिन्य ने पोरबंदर से अपनी पहली यात्रा पूरी कर मस्कट में प्रवेश किया.

कैसे बना है INS कौंडिन्य?

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आईएनएसवी कौंडिन्य परंपरागत तरीके से बनाई गई एक स्टिचेड सेल वाली नौका है. इसमें कील या धातु का इस्तेमाल नहीं हुआ है. इसके लकड़ी के तख्तों को नारियल के रेशे और प्राकृतिक रेजिन से जोड़ा गया है. यह तकनीक कभी हिंद महासागर में नौकायन के लिए आम थी और यह भारत की कारीगरी और टिकाऊ निर्माण पद्धति को दर्शाती है.

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जहाज के पालों पर गंडभेरुंड और सूर्य की आकृतियां हैं और आगे की तरफ सिंह यालि का नक्काशीदार स्वरूप है. डेक पर हरप्पन शैली के पत्थर का एंकर रखा गया है. यह जहाज भारतीय नाविक कौंडिन्य के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने सदियों पहले भारतीय महासागर पार कर दक्षिण-पूर्व एशिया तक समुद्री यात्रा की थी. यह यात्रा केवल नौसेना अभ्यास नहीं थी, बल्कि एक सांस्कृतिक मिशन भी थी.

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केरल के कारीगरों ने किया जहाज का निर्माण

यह परियोजना 2023 में संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और होड़ी इनोवेशन के बीच त्रिपक्षीय समझौते से शुरू हुई. केरल के कारीगरों ने जहाज का निर्माण किया. प्रधानमंत्री मोदी ने इस परियोजना का उद्देश्य भारत को उसकी समुद्री परंपरा से जोड़ना और ओमान के साथ संबंध मजबूत करना बताया, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से भारत और ओमान के बीच मसाले, कपड़े और बहुमूल्य पत्थरों के व्यापार के माध्यम से संबंध रहे हैं.

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किसके नाम पर बना है INS कौंडिन्य?

महान भारतीय नाविक कौंडिन्य के नाम पर नामित यह पोत भारत के स्वदेशी समुद्री ज्ञान, शिल्प कौशल और टिकाऊ पोत निर्माण पद्धतियों का प्रदर्शन करता है. इस परियोजना की परिकल्पना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी और इसे नौसेना वास्तुकारों, पुरातत्वविदों, पारंपरिक पोत निर्माण डिजाइनरों और कुशल जहाज निर्माताओं के सहयोग से भारतीय नौसेना द्वारा कार्यान्वित किया गया. अजंता गुफा चित्रों में चित्रित पांचवीं शताब्दी ईस्वी के एक पोत से प्रेरित होकर, आईएनएसवी कौंडिन्य का निर्माण प्राचीन भारतीय पोत निर्माण तकनीकों का उपयोग करके किया गया था, जिसमें आधुनिक कीलों या धातु के बंधनों के बिना सिले हुए तख्तों का निर्माण शामिल है.

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प्राचीन इतिहास को पुनर्जीवित और जीने की कोशिश!

पोरबंदर से मस्कट की 17-दिन की यात्रा प्राचीन व्यापार मार्गों पर हुई थी, जिन्हें पहले भारतीय व्यापारी और नाविक इस्तेमाल करते थे. इस यात्रा में आधुनिक इंजन का इस्तेमाल नहीं हुआ और जहाज केवल पालों और पारंपरिक रस्सी तकनीक पर निर्भर रहा. यह क्रू और जहाज की मजबूती की परीक्षा भी थी. भारतीय नौसेना ने यात्रा के दौरान सुरक्षा सुनिश्चित की और जहाज की पारंपरिक विशेषताओं को संरक्षित रखा. आईआईटी मद्रास में पहले हाइड्रोडायनामिक मॉडल टेस्ट से साबित हुआ था कि प्राचीन तकनीक आधुनिक समुद्री परिस्थितियों को सहन कर सकती है.

भारत और ओमान के बीच सदियों पुराने समुद्री संबंध हैं. पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि ब्रॉन्ज एज से ही भारत और ओमान का व्यापार होता रहा है. हरप्पन काल के अवशेष ओमान में पाए गए हैं. जहाज का मस्कट में गर्मजोशी से स्वागत यह दिखाता है कि सांस्कृतिक कूटनीति द्विपक्षीय संबंधों में कितनी महत्वपूर्ण है.

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भारत और ओमान के बीच 5000 साल पुराने गहरे समुद्री संबंध

पारंपरिक तरीके से निर्मित सिले हुए पाल वाले इस पोत की यात्रा दोनों देशों के बीच 5,000 वर्षों से अधिक पुराने गहरे समुद्री, सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को उजागर करती है. यह सदियों से भारत और ओमान के बीच निरंतर संपर्क बनाए रखने में महासागरों की भूमिका को भी रेखांकित करती है. यह अभियान इसलिए भी विशेष महत्व रखता है क्योंकि दोनों देश राजनयिक संबंधों की 70वीं वर्षगांठ मना रहे हैं.

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यह यात्रा भारत और ओमान के ऊर्जा, रक्षा और व्यापार सहयोग के समय पर हुई. भविष्य में और नौकायन यात्राओं से भारतीय महासागर में प्राचीन व्यापार मार्गों को फिर से जोड़ा जाएगा, जो भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका से जोड़ेंगे.

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