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'लक्ष्मण रेखा पार नहीं करने देगा भारत...', अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर विदेश मंत्री जयशंकर ने रख दी शर्त

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि व्यापार पर समझ या सहमति बननी जरूरी है क्योंकि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी मार्केट है, लेकिन दोनों देशों के बीच मतभेदों को आनुपातिक रूप से देखा जाना चाहिए क्योंकि द्विपक्षीय संबंध सामान्य रूप से जारी हैं. हालांकि उन्होंने साफ कर दिया कि भारत के लिए कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर बातचीत संभव नहीं है, बात नहीं हो सकती है. उन्होंने आगे कहा कि भारत भी चाहता है कि ट्रेड डील हो लेकिन उसकी भी अपनी सीमा है, लक्ष्मण रेखा है, जिससे कोई समझौता नहीं हो सकता है.

S Jaishankar (File Photo)
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विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर जारी तनाव के बीच बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि फिलहाल भारत-अमेरिका संबंध इसलिए प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि दोनों देशों के बीच व्यापार पर समहति नहीं बन पा रही है या बातचीत जारी है. हालांकि विदेश मंत्री ने साफ कर दिया कि कोई भी सौदा भारत के लक्ष्मण रेखा के अंदर होगा. उन्होंने आगे कहा कि किसी भी डील को अंतिम रूप देने के लिए नई दिल्ली यानी कि हिंदुस्तान की Red Lines का सम्मान करना होगा. 

नई दिल्ली में आयोजित कौटिल्य इकोनॉमिक एन्क्लेव कार्यक्रम में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि व्यापार पर समझ या सहमति बननी जरूरी है क्योंकि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी मार्केट है, लेकिन दोनों देशों के बीच मतभेदों को आनुपातिक रूप से देखा जाना चाहिए क्योंकि द्विपक्षीय संबंध सामान्य रूप से जारी हैं.

भारत-अमेरिका संबंधों पर जयशंकर की सीधी बात

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भारत-अमेरिका संबंधों में लगभग दो दशकों बाद पैदा हुए तनाव जो इससे पहले कभी न देखी गई के बारे में जयशंकर ने कहा कि दोनों देशों के संबंधों में अधिकांश समस्याएं व्यापार समझौते नहीं हो पाने के कारण आ रही हैं. जयशंकर ने ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए 25% शुल्क का हवाला देते हुए कहा, "आज हमारे पास संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ कुछ मुद्दे हैं. इसका एक बड़ा कारण यह है कि हम अपनी व्यापार वार्ता के लिए किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए हैं, और अब तक उस तक पहुंचने में असमर्थता के कारण भारत पर एक निश्चित शुल्क लगाया जा रहा है."

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वहीं अमेरिकी प्रशासन द्वारा रूसी तेल खरीदने को लेकर लगाए गए 25% दंडात्मक शुल्क या पेनाल्टी के संदर्भ में उन्होंने कहा कि, 'हमने सार्वजनिक रूप से कहा है कि हम इसे बहुत अनुचित मानते हैं, जो कि रूस से तेल और एनर्जी खरीदने या पूर्ति करने के लिए हमें टार्गेट किया गया है.'

ट्रंप ने इन देशों पर क्यों नहीं लगाया टैरिफ?

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विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आगे कहा कि "रूस के साथ कहीं अधिक प्रतिकूल संबंध रखने वाले देश भी रूस से ऊर्जा की खरीद रहे हैं, इन्हें अमेरिका के इस तरह के दंडात्मक शुल्क का सामना नहीं करना पड़ा है. उन्होंने कहा, आखिरकार जो भी हो, अमेरिका के साथ एक व्यापारिक समझौता तो होना ही चाहिए... क्योंकि यह दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार है, लेकिन इसलिए भी क्योंकि दुनिया के ज़्यादातर देश इन समझौतों पर पहुंच चुके हैं.

'कुछ चीजें ऐसी जिस पर बात भी नहीं हो सकती'

उन्होंने अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत का ज़िक्र करते हुए कहा, "लेकिन यह एक ऐसी समझ होनी चाहिए जिसमें हमारी बुनियादी सीमाओं, हमारी लक्ष्मण रेखाओं ( कृषि, डेयरी, छोटे-मझोले सेक्टर को अमेरिका के लिए नहीं खोलना) का सम्मान हो. जयशंकर ने इस दौरान साफ कर दिया कि भारत के लिए कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर बातचीत संभव नहीं है. उन्ह किसी भी समझौते में, कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन पर आप बातचीत कर सकते हैं और कुछ ऐसी भी होती हैं जिन पर आप बातचीत नहीं कर सकते. मुझे लगता है कि हम इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट हैं. हमें वह ज़मीन तलाशनी होगी और मार्च से इसी पर बातचीत चल रही है."

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आपको बता दें कि जयशंकर का संबोधन मुख्यतः वैश्विक स्तर पर बदलावों के रणनीतिक परिणामों पर केंद्रित था, जिसमें उत्पादन, आपूर्ति श्रृंखलाओं, व्यापार, डेटा और कनेक्टिविटी का लाभ उठाना, और विनिर्माण एवं राष्ट्रीय शक्ति के विकास के माध्यम से इन बदलावों से निपटने के लिए भारत का दृष्टिकोण शामिल था.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित 'कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन 2025' का रविवार को अंतिम दिन रहा. इस अवसर पर विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने विदेश नीति और आर्थिक दृष्टिकोण पर अपने विचार साझा किए.  उन्होंने बताया कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा को राष्ट्रीय क्षमताओं के साथ-साथ विभिन्न स्रोतों से सहयोग लेकर पूरा कर सकता है. इससे जोखिम भी कम होगा और देश की मजबूती बढ़ेगी.

क्या है भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' नीति?

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उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति का मुख्य आधार है ज्यादा से ज्यादा उपयोगी रिश्ते बनाना, लेकिन यह सुनिश्चित करना कि ये रिश्ते किसी एक देश के साथ विशेष न हों, जिससे दूसरे देशों के साथ अवसरों का नुकसान हो. इसे मल्टी-अलाइनमेंट नीति कहा जाता है, जिसका मतलब है कि भारत अलग-अलग देशों और क्षेत्रों के साथ समान रूप से अच्छे संबंध बनाए रखे.

जयशंकर ने यह भी बताया कि इस नीति को अपनाना चुनौतीपूर्ण है क्योंकि कई देशों के अलग-अलग हित होते हैं. इसी कारण भारत को हर स्थिति में समझदारी से काम लेना होता है ताकि सभी के साथ संतुलित और लाभकारी रिश्ते बन सकें. देश के अंदर की चुनौती यह है कि हमें अपनी राष्ट्रीय शक्ति के हर पहलू को मजबूत करना होगा. पिछले दस सालों में भारत ने इस दिशा में ठोस आधार बनाया है.

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आने वाले पांच साल वैश्विक स्तर पर भारत के लिए चुनौतीपूर्ण होंगे क्योंकि दुनिया तेजी से बदल रही है. लेकिन, भारत आत्मविश्वास और मजबूती के साथ इन चुनौतियों का सामना करेगा. उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत की यह बहुमुखी विदेश नीति और राष्ट्रीय ताकत देश के लिए अच्छे नतीजे लेकर आएगी.

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