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India-Pakistan Conflict: युद्ध में Drone बना गेम चेंजर, कैसे बदल रहा है लड़ाई का तरीका

भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव में ड्रोन एक निर्णायक हथियार के रूप में सामने आया है। आधुनिक युद्ध की परिभाषा बदलने वाली यह तकनीक अब सिर्फ निगरानी के लिए नहीं, बल्कि सटीक हमले और रणनीतिक बढ़त के लिए भी इस्तेमाल हो रही है। जानिए कैसे भारत अपने स्वदेशी और विदेशी ड्रोन के ज़रिए युद्ध क्षेत्र में तकनीकी बढ़त हासिल कर रहा है।

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8 मई 2025 की रात जब जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में बड़ा आतंकी हमला हुआ, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि इसकी प्रतिक्रिया में भारत अपने सबसे आधुनिक हथियार का प्रयोग करेगा. मगर भारत ने दिखा दिया कि अब उसका मुकाबला बंदूकों से नहीं, डेटा और ड्रोन से है. जवाबी कार्रवाई में भारत ने सीमावर्ती इलाकों में ऐसे ड्रोन भेजे जो न केवल दुश्मन की हरकतों पर निगाह रखते हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर स्वयं विस्फोट कर दुश्मन के ठिकानों को तबाह भी कर सकते हैं. इस हमले में भारत ने 'कामिकाज़े' या 'लोइटरिंग म्यूनिशन' ड्रोन का प्रयोग किया जो उड़ते समय लक्ष्य पर नजर रखते हैं और मौके पर पहुँचकर विस्फोट कर देते हैं. यह घटना यह स्पष्ट करती है कि आधुनिक युद्ध अब तकनीकी मोर्चे पर लड़े जा रहे हैं और भारत इस युद्ध में पीछे नहीं है.

भारत की ड्रोन नीति और तेजी से बढ़ता तकनीकी इकोसिस्टम

भारत सरकार ने 2021 में 'ड्रोन नियम' लागू किए जिनका उद्देश्य इस क्षेत्र में निवेश, नवाचार और सुरक्षा को बढ़ावा देना था. इसके बाद 2022 में 'ड्रोन शक्ति मिशन' लॉन्च किया गया, जिसने देश की स्टार्टअप कंपनियों और रक्षा क्षेत्र में कार्यरत निजी संस्थानों को ड्रोन तकनीक विकसित करने के लिए प्रेरित किया. सरकार की मदद से भारत ने अब तक लगभग 2,500 सैन्य उपयोग वाले ड्रोन अपने बेड़े में शामिल कर लिए हैं. इनमें टोही ड्रोन, सुसाइड ड्रोन, स्वार्म ड्रोन और हाई-एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस ड्रोन शामिल हैं.

भारत के प्रमुख इजरायली ड्रोन में IAI सर्चर और हेरोन शामिल हैं जो सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी में सक्षम हैं. साथ ही, भारत हार्पी और हारोप जैसे लोइटरिंग म्यूनिशन ड्रोन भी इस्तेमाल करता है. भारत ने अमेरिका से 31 MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन का 4 अरब डॉलर का सौदा भी किया है. ये ड्रोन 40 घंटे तक हवा में रह सकते हैं और मिसाइल से लैस होते हैं. इसके अलावा भारत ने नागस्त्र-1, रुस्तम-2 और आर्चर-NG जैसे स्वदेशी ड्रोन भी तैयार किए हैं जो आने वाले वर्षों में बड़ी भूमिका निभाएंगे.

ड्रोन का इतिहास और तकनीकी विकास

ड्रोन, जिन्हें तकनीकी रूप से UAV यानी अनमैन्ड एरियल व्हीकल कहा जाता है, आज के युद्ध की नई परिभाषा बन चुके ड्रोन कोई नए नहीं हैं. दरअसल 1800 के दशक के मध्य से ही ड्रोन का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए होता आ रहा है. 1915 में निकोला टेस्ला ने मानवरहित हवाई युद्ध उपकरण की कल्पना की थी. विश्व युद्धों के दौरान ड्रोन का प्रयोग विशेष रूप से ट्रेनिंग और टोही अभियानों में हुआ. 1970 के दशक में इजरायल ने इन्हें यॉम किप्पुर युद्ध में छलावे के रूप में इस्तेमाल किया. अमेरिका ने वियतनाम युद्ध के दौरान इनका व्यापक प्रयोग किया और 1980-90 के दशकों में इस तकनीक में भारी निवेश कर इसे युद्ध के केंद्र में ला खड़ा किया. 1995 में अमेरिका ने एमक्यू-1 प्रीडेटर और फिर 2007 में एमक्यू-9 रीपर ड्रोन के जरिए युद्ध की परिभाषा बदल दी.

यूक्रेन-रूस युद्ध से मिली प्रेरणा 

भारत ने ड्रोन युद्ध की प्रेरणा यूक्रेन-रूस युद्ध से ली है. इस संघर्ष में खासतौर पर FPV (फर्स्ट पर्सन व्यू) ड्रोन का उपयोग बड़े स्तर पर हुआ. ये छोटे आकार के, सस्ते और विस्फोटक से लदे ड्रोन होते हैं जिन्हें ऑपरेटर वीडियो फीड के ज़रिए नियंत्रित करता है. यूक्रेन ने इन्हें मात्र $500 की लागत में तैयार किया और यह साबित कर दिया कि तकनीक सिर्फ बड़े बजट से नहीं, स्मार्ट सोच से भी विकसित हो सकती है. भारत ने भी इस मॉडल को अपनाया और अब सीमावर्ती इलाकों में छोटे आकार के, कम लागत वाले लेकिन अत्यधिक प्रभावशाली ड्रोन तैयार किए जा रहे हैं.

भारत का एयर डिफेंस सिस्टम और काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी

भारत ने न केवल हमलावर ड्रोन बनाए हैं, बल्कि रक्षा के लिए भी पूरी तैयारी की है. भारतीय सेना के पास L-70 एंटी-एयरक्राफ्ट गन, ZU-23mm तोप, शिल्का एयर डिफेंस सिस्टम और काउंटर-यूएवी सिस्टम हैं जो दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही मार गिराने में सक्षम हैं. 8 और 9 मई को जब पाकिस्तान से भारी ड्रोन मूवमेंट हुआ, तब भारत ने S-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम को सक्रिय किया. यह वही सिस्टम है जो रूस ने बनाया है और जिसे दुनिया के सबसे उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणालियों में गिना जाता है.

इसके अतिरिक्त भारत DRDO द्वारा विकसित D4 काउंटर ड्रोन सिस्टम का भी परीक्षण कर चुका है जो दुश्मन के ड्रोन को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से निष्क्रिय कर सकता है. यह तकनीक युद्ध के भविष्य को देखते हुए भारत की रणनीतिक बढ़त को दर्शाती है.

क्यों खतरनाक है स्वार्म ड्रोन तकनीक?
स्वार्म ड्रोन टेक्नोलॉजी आने वाले युद्धों का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभर रही है. इसमें एक साथ दर्जनों या सैकड़ों छोटे ड्रोन एक ही मिशन को अंजाम देते हैं. ये एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं, आपस में डेटा साझा करते हैं और सामूहिक निर्णय लेकर लक्ष्य को भेदते हैं. दुश्मन के लिए इन्हें ट्रैक करना, निशाना बनाना और रोकना अत्यंत कठिन होता है. भारत इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है और जल्द ही ऐसे ड्रोन स्क्वाड भारतीय सेना में शामिल किए जा सकते हैं. यह तकनीक केवल सीमित हमले नहीं, बड़े पैमाने पर दुश्मन की क्षमताओं को कुंद करने में सक्षम है.

अब युद्ध सिर्फ बंदूक, टैंक और फाइटर जेट का नहीं रह गया है. अब यह डेटा, तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का संगम बन चुका है. ड्रोन इसमें सबसे आगे हैं. भारत ने न केवल इसका एहसास समय रहते कर लिया, बल्कि ठोस कदम भी उठाए. ड्रोन की दुनिया में भारत अब आयात पर ही नहीं, अपने उत्पादन पर भी भरोसा कर रहा है. आने वाले वर्षों में यह तकनीक देश की रक्षा रणनीति का अभिन्न हिस्सा होगी.
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