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'भारत एक स्वाभिमानी देश, झुकेगा नहीं...', अमेरिका के पूर्व व्यापार प्रतिनिधि ने ट्रंप को चेताया, कहा- अब US पर कभी भरोसा नहीं करेगा हिंदुस्तान

अमेरिका के पूर्व व्यापार प्रतिनिधि और फिलहाल काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अध्यक्ष माइकल फ्रॉमन ने ट्रंप को चेतावनी देते हुए कहा कि व्यापर को हथियार की तरह इस्तेमाल करना खतरे से खाली नहीं है. उन्होंने भारत पर लगाए ट्रंप के 50% टैरिफ पर कहा कि उनकी ये रणनीति कामयाब नहीं होगी, मोदी साफ कह रहे हैं कि वो झुकेंगे नहीं. फ्रॉमन ने इस दौरान ये भी कहा कि भारत एक स्वाभिमानी देश है, दबाव में नहीं आएगा और न ही भविष्य में कभी अमेरिका पर भरोसा करेगा.

Image: Michael Froman / Barack Obama (File Photo)
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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय बातचीत और SCO समिट पर अमेरिका की भी नजर थी. इसे करीब से देखा जा रहा था. यह मुलाकात इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो गई थी है क्योंकि सम्मेलन से ठीक 4 दिन पहले ही अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया था. अब इस पर अमेरिका के अंदर से ही तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही है. नेता, डिप्लोमेट, पत्रकार और कारोबारी, हर कोई ट्रंप को लताड़ रहा है और भारत से संबंधों को गर्त में धकेलने को लेकर चेतावनी दे रहा है.

इसी बीच अमेरिका के पूर्व व्यापार प्रतिनिधि और फिलहाल काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अध्यक्ष माइकल फ्रॉमन ने भी भारत को एक प्राउड कंट्री करार देते हुए अपने ही देश को तीखी चेतावनी दी है. उन्होंने कहा कि बीते कई दशकों से अमेरिकी नीति का बड़ा हिस्सा भारत को चीन के अत्यधिक करीब जाने से रोकने पर केंद्रित रहा है. लेकिन मौजूदा टैरिफ विवाद ने दोनों एशियाई देशों को नज़दीक लाने का माहौल बना दिया है. फ्रॉमन ने याद दिलाया कि क्लिंटन प्रशासन के बाद से वॉशिंगटन और नई दिल्ली के रिश्ते लगातार मज़बूत हुए थे, मगर अचानक लगाए गए भारी-भरकम टैरिफ ने भारत को झटका दिया है और वह अब खुद को दुनिया के सबसे ज्यादा शुल्क-प्रभावित देशों में खड़ा पा रहा है.

'भारत ने मान लिया कि अमेरिका पर भरोसा संभव नहीं है'

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उन्होंने आगे कहा कि मोदी की यह यात्रा खास है. यह कदम सीधे-सीधे अमेरिकी टैरिफ के जवाब के रूप में देखा जा रहा है. भारत को लग रहा है कि केवल अमेरिका पर भरोसा करना अब संभव नहीं और उसे चीन सहित एससीओ देशों के साथ अन्य विकल्प तलाशने होंगे. 

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'भारत प्राउड कंट्री है...झुकेगा नहीं'

फ्रॉमन ने कहा कि भारत स्वाभिमानी राष्ट्र है और यह साफ़ बता देना चाहता है कि वह दबाव में नहीं झुकेगा. नई दिल्ली यह भी पूछ रहा है कि जब रूस से तेल आयात करने पर भारत पर 25 प्रतिशत शुल्क लगाया गया तो चीन, जो रूस से कहीं ज्यादा तेल खरीद रहा है, उस पर यह भार क्यों नहीं डाला गया. यह संदेश केवल वॉशिंगटन को ही नहीं बल्कि भारत की घरेलू राजनीति में भी अहम संकेत है कि मोदी सरकार अमेरिकी दबाव को हल्के में नहीं लेगी.

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हालांकि, भारत-चीन के बीच असंख्य विवाद हैं जिनका तुरंत समाधान मुश्किल है. लेकिन यह कदम बताता है कि भारत अब अमेरिका से बेहतर व्यवहार की उम्मीद कर रहा है और अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह विकल्प तलाशने से पीछे नहीं हटेगा.

ऊर्जा परिप्रेक्ष्य में फ्रॉमन ने कहा कि भारत को बड़े पैमाने पर तेल और गैस की ज़रूरत है और वह रूस से आयात कर इसका बड़ा लाभ उठा रहा है. कच्चे तेल को प्रोसेस करके भारत अन्य देशों, यहाँ तक कि यूरोप को भी बेच रहा है. यह स्थिति पश्चिमी देशों के लिए असहज है, लेकिन भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से लाभकारी है. इसलिए संभव है कि रूस से जुड़ी ये व्यापारिक राहें लंबे समय तक बनी रहें.

भारत लंबे समय से बैलेंसिंग एक्ट की रणनीति अपनाता आया है. वह रूस और ईरान के साथ भी संबंध बनाए रखता है, अमेरिका से भी जुड़ा हुआ है और चीन के साथ उसका रिश्ता हमेशा संवेदनशील और उतार-चढ़ाव भरा रहा है. फ्रॉमन ने कहा कि भारत को यह चिंता भी सता रही है कि अगर अमेरिकी और यूरोपीय बाज़ार चीन के लिए बंद हो गए तो वहां के सामानों से भारतीय बाज़ार पट जाएंगे यानी कि हिंदुस्तान डंपिंग ग्राउंड बन सकता है. 

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दूसरी ओर, अमेरिकी तकनीक और चीनी कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा पर भी चर्चा हुई. फ्रॉमन ने आगे कहा कि अमेरिका को चाहिए कि वह केवल चीन पर ध्यान न देकर अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों में भी सस्ते दामों पर चिप्स उपलब्ध कराए ताकि हुआवेई जैसी कंपनियों की पकड़ कमजोर हो. अगर अमेरिकी कंपनियों ने इन बाज़ारों में सस्ते और प्रभावी विकल्प दिए तो उन्हें तकनीकी मुकाबले में बढ़त मिलेगी.

व्यापार का हथियार की तरह इस्तेमाल खतरनाक

उन्होंने चेताया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील उत्पादों को महज़ व्यापारिक सौदे की तरह इस्तेमाल करना बेहद खतरनाक मिसाल बनेगा. अमेरिका को सहयोगी देशों से भी यह अपेक्षा होती है कि वे सुरक्षा कारणों से निर्यात नियंत्रण लागू करें. लेकिन अगर वॉशिंगटन खुद इन मानकों पर समझौता करने लगेगा तो यह नीति खोखली हो जाएगी.

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फ्रॉमन ने यह भी कहा कि चीन पहले ही यह तय कर चुका है कि वह Semiconductor Technology में अपनी क्षमता विकसित करेगा. वह अमेरिका से धीमा जरूर हो सकता है लेकिन उसे आत्मनिर्भर बनने से रोकना लगभग असंभव है. इसलिए अमेरिका को अपनी प्राथमिकता इस बात पर रखनी होगी कि वह वैश्विक बाज़ार में हुआवेई और चीनी तकनीक से प्रतिस्पर्धा करे, न कि अपनी ही सबसे उन्नत तकनीक प्रतिद्वंद्वियों तक पहुँचाकर सुरक्षा से समझौता करे.

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