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1994 में वामपंथियों ने काट दिए थे पैर, अब राष्ट्रपति ने भेजा राज्यसभा, जानिए कौन हैं केरल के सदानंदन मास्टर

सदानंदन मास्टर केरल के कन्नूर जिले के निवासी और पेशे से शिक्षक हैं. वे पिछले लगभग 50 वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े हुए हैं. उनका जन्म एक कम्युनिस्ट परिवार में हुआ, लेकिन युवावस्था में उन्होंने राष्ट्रवादी विचारधारा को अपनाया. 1994 में वामपंथ छोड़ने के कारण CPI(M) के कार्यकर्ताओं ने उन पर जानलेवा हमला किया और उनके दोनों पैर काट दिए गए. बावजूद इसके, उन्होंने हार नहीं मानी और नकली पैरों के सहारे फिर से चलना सीखा. वे समाजसेवा और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय रहे और अब राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किए गए हैं.

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने रविवार को राज्यसभा के लिए चार प्रतिष्ठित हस्तियों को नामित किया है, जिनमें एक ऐसा नाम शामिल है जो भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन में संघर्ष और साहस की जीती-जागती मिसाल बन चुका है. केरल के शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता सदानंदन मास्टर उनके साथ राज्यसभा में जिन अन्य लोगों को नामित किया गया है, उनमें पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला, अजमल कसाब के खिलाफ मुकदमा लड़ने वाले प्रसिद्ध वकील उज्ज्वल निकम, और जानी-मानी इतिहासकार मीनाक्षी जैन हैं. लेकिन इन चारों में सबसे ज्यादा चर्चा में हैं सदानंदन मास्टर, जिनकी जीवनगाथा सुनकर कोई भी दंग रह जाए.

कौन हैं सदानंदन मास्टर?
61 वर्षीय सदानंदन मास्टर आज भले ही राज्यसभा के सदस्य बन चुके हों, लेकिन उनका सफर आसान नहीं रहा. केरल के कन्नूर जिले से आने वाले मास्टर पेशे से शिक्षक रहे हैं और वे दशकों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सक्रिय स्वयंसेवक हैं. विशेष बात यह है कि उनका पूरा परिवार कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़ा था. पिता और भाई वामपंथी आंदोलन के पुराने कार्यकर्ता थे, इसके बावजूद सदानंदन मास्टर ने युवावस्था में ही संघ का रास्ता चुना. उन्होंने खुद बताया था कि कॉलेज के दिनों में वे थोड़े समय के लिए मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित भी हुए, लेकिन जल्द ही उन्हें महसूस हुआ कि राष्ट्रवाद ही उनका सच्चा पथ है. मलयालम कविता "भारत दर्शानांगल" ने उन्हें दोबारा संघ की ओर खींचा और तब से वे कभी पीछे मुड़कर नहीं देखे.

1994 की वह रात जिसने मास्टर के जीवन में लाया मोड़ 
राजनीतिक असहिष्णुता की एक खौफनाक मिसाल 25 जनवरी 1994 की शाम को सामने आई, जब सदानंदन मास्टर अपनी बहन की शादी की तैयारियों के बाद घर लौट रहे थे. तभी कुछ CPI(M) कार्यकर्ताओं ने रास्ते में घेरकर उन पर हमला कर दिया. न केवल उन्हें बुरी तरह पीटा गया, बल्कि सड़क पर ही उनके दोनों पैर काट दिए गए. यह हमला सिर्फ इसलिए किया गया क्योंकि उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा को छोड़कर RSS का दामन थाम लिया था. इस क्रूर हमले के पीछे साफ संदेश था. वामपंथ छोड़ने की सजा यही होगी. इतना ही नहीं, हमलावरों ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बम धमाका भी किया ताकि कोई उन्हें बचाने ना आए। घंटों तक खून से लथपथ मास्टर वहीं पड़े रहे, बाद में किसी तरह उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया.

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हार नहीं मानी, फिर से खड़े हुए
इतनी भयानक दुर्घटना के बाद भी सदानंदन मास्टर न टूटे. उन्होंने नकली पैरों (प्रोस्थेटिक लेग्स) की मदद से चलना सीखा और मात्र छह महीनों में दोबारा संघ कार्य में लग गए. उन्होंने फिर से समाज सेवा शुरू की और भाजपा को केरल में मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई. साल 2016 में उन्हें कूथूपरम्बू विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ने का मौका मिला, हालांकि वे उस बार हार गए थे. उनका साहस देखकर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके समर्थन में प्रचार किया था और अब एक बार फिर प्रधानमंत्री ने उन्हें राज्यसभा में नामित किए जाने पर बधाई देते हुए सोशल मीडिया पर लिखा “श्री सदानंदन मास्टर का जीवन साहस और अन्याय के आगे न झुकने की प्रतिमूर्ति है. हिंसा और धमकी भी राष्ट्र विकास के प्रति उनके जज्बे को डिगा नहीं सकी.”

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न्याय की जीत और मास्टर का सम्मान
मास्टर पर हमले के दोषियों को साल 2007 में अदालत ने सजा और जुर्माना दिया था। यह न्याय 2025 में तब और पुख्ता हुआ जब केरल हाई कोर्ट ने इस सजा को बरकरार रखा. यह फैसला न केवल सदानंदन मास्टर के संघर्ष की जीत थी बल्कि उन सभी लोगों के लिए संदेश था जो विचारों के नाम पर हिंसा का समर्थन करते हैं. राज्यसभा में सदानंदन मास्टर की मौजूदगी एक नए युग की शुरुआत है. यह उस भारत की तस्वीर है, जो विचारों के मतभेद को हिंसा से नहीं, संवाद और सेवा से हल करना चाहता है. एक शिक्षक के रूप में सदानंदन मास्टर ने शिक्षा और सामाजिक सेवा को अपना हथियार बनाया. उनकी कहानी यह साबित करती है कि असली ताकत विचारधारा में नहीं, बल्कि उसके लिए किए गए त्याग और सेवा में होती है.

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बताते चलें कि राज्यसभा के लिए नामित चारों हस्तियाँ अपने-अपने क्षेत्र में अग्रणी हैं. लेकिन सदानंदन मास्टर की गाथा सिर्फ नामांकन की नहीं, बल्कि संघर्ष, साहस और सच्चे राष्ट्रवाद की गाथा है. ऐसे लोगों का संसद में पहुँचना भारतीय लोकतंत्र के लिए गर्व का विषय है. यह केवल एक नामांकन नहीं, बल्कि उन लाखों कार्यकर्ताओं और विचारशील नागरिकों के संघर्ष का सम्मान है, जो चुपचाप देश की सेवा में लगे हुए हैं.

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