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'सैलरी में जबरदस्त इज़ाफ़ा, सपोर्ट स्टाफ को डिनर...', इसी दिन हो गया था उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के पद छोड़ने का आभास, कर ली थी अपने फेयरवेल की तैयारी!

अगस्त, 2022 में देश के उपराष्ट्रपति बने जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद उनके तीन साल के कार्यकाल का अंत हो गया है. उनके पद छोड़ने के बाद तमाम तरह की अटकलें लग रहे हैं. कहा जा रहा है कि उन पर न्यायालय से टकराव के कारण दबाव पड़ रहा था तो कोई स्वास्थ्य का हवाला दे रहा है. लेकिन उनकी इस पद से रुख़्सती से कई दिन पहले इस बात का एहसास हो गया था कि वो अब ज्यादा दिन इस पद पर नहीं रहेंगे और ये स्वयं धनखड़ को भी लग गया था इसलिए उन्होंने जाने से पहले कुछ काम ऐसा किया जिस फेयरवेल डिनर के तौर पर देखा गया.

Image: Jagdeep Dhankhar / Sansad TV
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अनुभवी वकील और राजनीतिक हस्ती जगदीप धनखड़ ने 2022 से 21 जुलाई 2025 को अपने इस्तीफे तक भारत के 14वें उपराष्ट्रपति के रूप में कार्य किया. उन्होंने सोमवार को स्वास्थ्य आधार पर उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया. उनका कार्यकाल छोटा था. उन्हें संसदीय प्रक्रियाओं पर दृढ़ पकड़ और तीक्ष्ण कानूनी कुशाग्रता के लिए जाना जाता था. वे अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में राष्ट्रीय मुद्दों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे.

21 जुलाई से शुरू हुए संसद के मॉनसून सत्र के पहले दिन तक उन्होंने राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में सदन संचालन किया, नोटिस लिए, बैठकें कीं और तमाम निर्देश दिए. उनके अचानक पद छोड़ने को लेकर तमाम तरह के अटकलें लग रहे हैं लेकिन बड़ा सवाल ये उठता है कि ऐसा कब लगा कि वो इस्तीफा दे सकते हैं? हालांकि एक दावा और एक सोशल मीडिया पोस्ट पर नज़र डालें तो लगता है कि उपराष्ट्रपति धनखड़ को पहले ही लग गया था कि वो अब ज्यादा दिन पद पर नहीं रहेंगे. ऐसा लगने के पीछे वजह जो भी रही हों लेकिन उन्होंने अपने फेयरवेल की तैयारी पहले ही कर ली थी.

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे का कब लगा था आभास
मीडिया में उपराष्ट्रपति धनखड़ के इस्तीफे की अटकलों से इतर संसद टीवी में बतौर एंकर, प्रोड्यूसर, रिपोर्टर काम कर चुके सिद्धार्थ झा ने अपने फेसबुक पेज पर एक पोस्ट किया है. उन्होंने लिखा कि इस्तीफे से कुछ दिन पहले उपराष्ट्रपति ने संसद टीवी जो पहले राज्यसभा टीवी और लोकसभा टीवी अलग-अलग होता था, उसे मर्ज कर संसद टीवी बना दिया गया, उसमें से सबको और संसद के स्टाफ सहित अपने साथ काम कर रहे कर्मचारियों को डिनर पर बुलाया था. इसके अलावा ये भी बीते दिनों खब़र आई कि संसद टीवी के कर्मचारियों की सैलरी कई सालों से नहीं बढ़ी थी, उसे बढ़ा दिया गया. 

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संसद टीवी के कर्मचारियों की सैलरी में अप्रत्याशित वृद्धि
सिद्धार्थ झा के फेसबुक पोस्ट पर अन्य जगहों से विरीफाइ करने और अन्य जानकारी इकट्ठा करने के बाद एक बात पता चली कि संसद TV के कर्मचारियों की सैलरी जो करीब 3 साल से नहीं बढ़ी थी, इसकी मांग भी की जा रही थी. इसको लेकर उहापोह की स्थिति थी लेकिन बीते दिनों इसमें जबरदस्त इजाफा कर दिया गया. जानकारी तो ये भी मिली कि ये वृद्धि एक या दो हजार की नहीं बल्कि 20 से 32 हजार रूपए तक की हुई. एक दो रिटेनर या जूनियर जिनकी सिर्फ 9 हजार रूपए बढ़े बाकी सबको बंपर तोहफा दिया गया. इस फैसले के बाद हर को खुश भी था और भौंचक्का भी था. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि संसद टीवी गवर्निंग कांउसिल के चेयरमैन देश का उपराष्ट्रपति यानी कि राज्यसभा का पदेन सभापति होता है. वहीं लोकसभा के अध्यक्ष डिप्टी चेयरमैन होते हैं.

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मार्च में खराब स्वास्थ्य के कारण AIIMS में हुए थे भर्ती 

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को बीते 9 मार्च को तड़के सुबह सीने में दर्द और बेचैनी के बाद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली के हृदय विभाग में भर्ती कराया गया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं एम्स जाकर उपराष्ट्रपति के की तबीयत की जानकारी ली थी, उनसे मुलाकात भी की थी. वैसे तो आशंका थी कि उनकी सेहत उनका साथ नहीं दे रही है लेकिन जब वो 21 जुलाई को मॉनसून सत्र के पहले दिन सदन से बिना किसी हो-हल्ले, बिना प्रोटोकॉल के निकल गए तो इसके बाद अटकलों का बाजार गर्म हो गया था. जो आशंका संसद टीवी के स्टाफ और अपने सेक्रेटेरिएट, सपोर्ट स्टाफ को डिनर देने के वक्त लगी थी वो बीती शाम पूरी भी हो गई.
 
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अब तक के सफर पर एख नज़र

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राजस्थान के ग्रामीण इलाके से भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक तक जगदीप धनखड़ का सफर, दृढ़ता, बहुमुखी प्रतिभा और जनसेवा की कहानी है. वे चार दशकों से भी ज्यादा समय से सार्वजनिक जीवन में हैं. 18 मई, 1951 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के एक छोटे से गांव किठाना में जन्मे जगदीप धनखड़ एक साधारण किसान परिवार से हैं. उन्हें अक्सर 'किसान पुत्र' कहा जाता है और यही पृष्ठभूमि भाजपा ने बाद में उनके उपराष्ट्रपति पद के नामांकन के दौरान अपने राजनीतिक संदेश में भी उजागर की.

'किसान पुत्र' से लेकर देश के दूसरे सबसे बड़े पद तक का सफर
उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा चित्तौड़गढ़ के सैनिक स्कूल से पूरी की, जो कई उल्लेखनीय सैन्य और सार्वजनिक सेवा हस्तियों को तैयार करने के लिए जाना जाता है. बाद में उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से विज्ञान स्नातक की उपाधि प्राप्त की और उसी विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की.

पहले वकालत फिर सियासत में गाड़ा झंडा
धनखड़ ने 1979 में राजस्थान बार काउंसिल में पंजीकरण के बाद अपनी वकालत शुरू की. एक कुशल कानूनी विशेषज्ञ के रूप में उनकी प्रतिष्ठा तेजी से बढ़ी. 1990 में उन्हें राजस्थान हाई कोर्ट द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता नियुक्त किया गया और वे राज्य के सबसे प्रतिष्ठित कानूनी पेशेवरों में से एक बन गए.

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उन्होंने कई उच्च न्यायालयों और भारत के सर्वोच्च न्यायालय में वकालत की, जहां उन्होंने विभिन्न प्रकार के मामलों की पैरवी की. धनखड़ को राजस्थान उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. इस भूमिका ने विधिक समुदाय में उनकी प्रतिष्ठा को और मजबूत किया.

झुंझुनू से जीतकर पहली बार संसद पहुंचे धनखड़
उन्होंने 1989 में झुंझुनू से जनता दल के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतकर राजनीति में प्रवेश किया. संसद में उनकी स्पष्ट वकालत ने उन्हें जल्द ही मंत्री पद दिला दिया. 1990 में प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कार्यकाल में उन्हें संसदीय कार्य राज्य मंत्री नियुक्त किया गया. उन्होंने सरकार और विधानमंडल के बीच महत्वपूर्ण समन्वय का कार्यभार संभाला. बाद में उन्होंने 1993 से 1998 तक राजस्थान विधानसभा के सदस्य के रूप में किशनगढ़ निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया.

बीजेपी के अलावा कांग्रेस में भी रहे धनखड़
धनखड़ राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे और जनता दल, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) और अंततः भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सहित कई दलों से जुड़े रहे.

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बंगाल के राज्यपाल के तौर पर रहे सुर्खियों में
जुलाई 2019 में धनखड़ को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया था. इस पद पर रहते हुए वे राज्य में राजनीतिक उथल-पुथल के केंद्र में रहे. उनके कार्यकाल के दौरान ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार के साथ संघवाद, विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर उनका लगातार टकराव हुआ. उनके आलोचकों ने उन पर संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करने का आरोप लगाया. हालांकि, धनखड़ ने जोर देकर कहा कि वह लोकतांत्रिक सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए काम कर रहे थे.

बंगाल के राज्यपाल के बाद बने देश के उपराष्ट्रपति

16 जुलाई, 2022 को भाजपा ने उपराष्ट्रपति पद के लिए धनखड़ को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का उम्मीदवार घोषित किया. 6 अगस्त, 2022 को हुए उपराष्ट्रपति चुनाव में धनखड़ ने विपक्षी उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा को 710 वैध मतों में से 528 मतों से हराया, और 74.37 प्रतिशत मत हासिल किए, जो 1992 के बाद से जीत का सबसे बड़ा अंतर है. उनके चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया और उसके केवल दो सदस्यों ने ही मतदान किया.

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उपराष्ट्रपति के रूप में धनखड़ ने राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में भी कार्य किया, जहां उन्होंने कई महत्वपूर्ण विधायी सत्रों की अध्यक्षता की. संसदीय नियमों के प्रति अपने कठोर पालन और स्पष्ट दृष्टिकोण के लिए प्रसिद्ध धनखड़ को सभी दलों में समान रूप से सम्मान और चुनौती मिली. 

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