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ब्लैक होल का जन्म कैसे हुआ? वैज्ञानिकों ने 11,000 साल पुराने रहस्य से उठाया पर्दा

ब्लैक होल, जिसे आज तक केवल रहस्य और रोमांच के प्रतीक के रूप में देखा गया, अब वैज्ञानिकों ने इसके जन्म की असली कहानी खोज निकाली है। एक विशेष बाइनरी सिस्टम GRO J1655-40 की जांच के बाद, वैज्ञानिकों को पहली बार यह समझ आया कि ब्लैक होल कैसे और किन हालातों में बनते हैं।

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क्या आपने कभी सोचा है कि वो रहस्यमयी जगहें जिन्हें हम "ब्लैक होल" कहते हैं, वो आखिर कैसे बनीं? क्या ये अचानक ब्रह्मांड में उभर आईं, या फिर इसके पीछे भी कोई लंबी और जटिल प्रक्रिया रही है? आज हम आपको ब्रह्मांड के सबसे रहस्यमयी पिंड ब्लैक होल के जन्म की वो सच्चाई बताएंगे जिसे वैज्ञानिकों ने हाल ही में ब्रह्मांड की गहराइयों से खोज निकाला है।

ये कहानी है एक ऐसे तारकीय हादसे की, जिसने एक विशाल तारे को निगल लिया और पीछे छोड़ गया एक ऐसा पिंड जो समय, प्रकाश और गुरुत्वाकर्षण तीनों को अपनी मुट्ठी में बंद कर लेता है। और यह कहानी हमारे सामने आई है एक विशेष बाइनरी सिस्टम से, जिसका नाम है GRO J1655-40।

GRO J1655-40, ब्रह्मांड की प्रयोगशाला

वैज्ञानिकों ने जिस बाइनरी सिस्टम को केंद्र में रखकर यह खोज की, उसका नाम है GRO J1655-40। यह कोई आम जगह नहीं, बल्कि दो खगोलीय पिंडों का समूह है  एक ब्लैक होल और उसका साथी तारा। यह सिस्टम हमारी पृथ्वी से करीब 11,000 प्रकाशवर्ष दूर है।

यहां मौजूद ब्लैक होल का द्रव्यमान हमारे सूरज से 7 गुना ज़्यादा है, जबकि उसका साथी तारा 3 सूर्यों के बराबर है। यह जोड़ी पहले दो जीवित तारों के रूप में अस्तित्व में थी। लेकिन फिर, कुछ ऐसा हुआ जिसने इनमें से एक तारे को तबाह कर दिया एक सुपरनोवा विस्फोट। और इसी विस्फोट से जन्म हुआ ब्लैक होल का।

जब एक तारा अपनी उम्र के अंत में पहुंचता है, तो उसमें फ्यूल खत्म होने लगता है। उसके भीतर का दबाव और गुरुत्वाकर्षण असंतुलित हो जाता है, और तब होता है एक ज़ोरदार धमाका, जिसे सुपरनोवा कहा जाता है। GRO J1655-40 में भी यही हुआ। एक विशाल तारे ने, जो कि सूरज से 25 गुना बड़ा था, एक महा विस्फोट किया। विस्फोट इतना जबरदस्त था कि तारे के अधिकांश हिस्से अंतरिक्ष में बिखर गए। लेकिन उसका कोर इतना भारी था कि वह खुद पर ही ढह गया और एक ब्लैक होल में बदल गया।

चंद्रा एक्स-रे वेधशाला से मिली असली कहानी

इस पूरे रहस्य से पर्दा हटाने में मदद की अमेरिका की प्रतिष्ठित चंद्रा एक्स-रे ऑब्जर्वेटरी ने। 2005 में प्राप्त हुए डेटा का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने ब्लैक होल के पास मौजूद 18 अलग-अलग रासायनिक तत्वों की पहचान की जैसे आयरन (लोहा), सिलिकॉन, सल्फर आदि। इन तत्वों के अनुपात को देखकर वैज्ञानिक यह निष्कर्ष निकाल पाए कि ब्लैक होल से पहले जो तारा मौजूद था, वह कितनी बड़ी संरचना रखता था और कैसे उसका अंत हुआ। रिसर्च से यह भी सामने आया कि उस तारे ने सुपरनोवा विस्फोट के पहले ही बहुत सारा द्रव्यमान तारकीय हवाओं (stellar winds) के ज़रिए खो दिया था।

अब सवाल ये उठता है कि ये खोज क्यों इतनी खास है? जवाब है समझना कि ब्लैक होल कैसे बनते हैं, इसका मतलब है कि हम ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली ताकतों को समझ पा रहे हैं। यह जानकारी ना केवल तारकीय विकास को समझने में मदद करेगी, बल्कि इससे यह भी समझ आएगा कि ब्रह्मांड में भारी तत्व कैसे बने और फैले। आज हम जिस ऑक्सीजन, कार्बन या लोहे को धरती पर देखते हैं, वो कभी किसी तारकीय विस्फोट का हिस्सा थे। इस तरह की स्टडीज़ यह स्पष्ट करती हैं कि कैसे हमारी पृथ्वी और जीवन की बुनियाद रखने वाले तत्वों ने जन्म लिया।

ब्लैक होल सिर्फ विज्ञान का विषय नहीं, अब यह फिल्मों, कहानियों, और कल्पनाओं का भी हिस्सा बन चुका है। लेकिन अब जब वैज्ञानिकों ने इसके जन्म की असल प्रक्रिया खोज ली है, तो वो दिन दूर नहीं जब ब्लैक होल को सिर्फ एक काल्पनिक चीज़ नहीं, बल्कि एक ज्ञात खगोलीय घटना के रूप में पढ़ाया जाएगा। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में, हम ब्लैक होल की सतह (इवेंट होराइजन) के और पास जाकर उसकी ग्रेविटी को और गहराई से समझ पाएंगे। इससे समय, गुरुत्व, और ब्रह्मांड के सबसे बड़े सवालों के जवाब मिलने की उम्मीद है।

ब्लैक होल हमेशा से ही डर और रहस्य का पर्याय रहे हैं। लेकिन अब, जब विज्ञान ने इसके जन्म की कहानी दुनिया के सामने रखी है, तो यह सिर्फ एक अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है ब्रह्मांड को समझने की, जीवन को गहराई से देखने की, और यह जानने की कि हम इस विशाल ब्रह्मांड में कहां खड़े हैं। 
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