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कोलकाता एयरपोर्ट के रनवे से महज 300 मीटर की दूरी पर कैसे बन गई मस्जिद? सेफ्टी पर सवाल, सरकार के जवाब से हड़कंप

कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के अंदर, सेकेंडरी रनवे से महज़ 300 मीटर की दूरी पर मौजूद बांकारा मस्जिद ने पूरे देश के कान खड़े कर दिए हैं. इसने एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि सुरक्षा के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील एयरपोर्ट के रनवे के पास मस्जिद को रहने देने की इजाज़त आखिर दी कैसे गई. इतना ही नहीं, कहा जा रहा है कि बार-बार मस्जिद को हटाने का प्रयास किया गया, लेकिन मुस्लिमों के विरोध की वजह से हर बार मामला अटक गया. अब देखने वाली बात होगी कि इस मामले के फिर से राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आने के बाद क्या कार्रवाई होती है.

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पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट के रनवे के पास बनी मस्जिद की खबर एक बार फिर सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है. इसके मीडिया में प्रमुखता से छपने के बाद शासन-प्रशासन के साथ-साथ आम लोगों के भी कान खड़े हो गए हैं. इस मस्जिद का नाम बांकारा मस्जिद है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वो करीब 130 साल पुरानी है. यह सेकेंडरी रनवे से 300 मीटर से भी कम दूरी पर स्थित है. यह मामला उस वक्त प्रकाश में आया है जब पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य द्वारा पूछे गए सवाल पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय (MoCA) द्वारा दिया गया जवाब सार्वजनिक हो गया.

इतना ही नहीं, MoCA ने स्वीकार किया है कि उन्हें मस्जिद के रनवे के बेहद करीब होने की जानकारी है. इसके अलावा बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने भी एक अलग दावा किया है कि यह मस्जिद सुरक्षित विमान परिचालन में बाधा डाल सकती है. उन्होंने मंत्रालय के जवाब का हवाला देते हुए आगे कहा कि यह बांकारा मस्जिद आपात स्थिति में रनवे के काम में बाधा डालती है क्योंकि रनवे की थ्रेशहोल्ड 88 मीटर खिसकानी पड़ती है. मालवीय ने इसे वोटबैंक की राजनीति करार देते हुए कहा कि यात्रियों की सुरक्षा तुष्टीकरण की राजनीति की भेंट नहीं चढ़ सकती.

क्या एयरपोर्ट से पहले से है मस्जिद?

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बांकारा मस्जिद को लेकर स्थानीय लोगों ने कहा कि यह 1890 के दशक में बनी थी. इस हिसाब से देखें तो कोलकाता हवाईअड्डे के निर्माण से कई दशक पहले यह बनी थी. उस समय यह इलाका एक गांव था. कहा जाता है कि 1924 में ब्रिटिश शासन ने दमदम में एयरोड्रोम बनाया, हालांकि मस्जिद उससे भी पहले से मौजूद थी.

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उसके बाद 1950-60 के दशक में जब एयरपोर्ट का विस्तार किया गया और सेकेंडरी रनवे जोड़ा गया, तब आसपास के गांव को तो हटा दिया गया लेकिन मस्जिद जस की तस बनी रही. यानी मस्जिद को शिफ्ट नहीं किया गया. जानकारी के मुताबिक तब आसपास के गांवों को वहां खाली कराकर, दूर जेसोर रोड के पार मध्यमग्राम में बसाया गया. इसके बाद 1962 में पश्चिम बंगाल सरकार ने जमीन का अधिग्रहण कर इसे एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) को सौंप दिया. कहा जाता है कि उस समय मस्जिद को संरक्षित करने का समझौता हुआ था, जिस कारण इसे हाथ भी नहीं लगाया गया. हो सकता है कि इसी समझौते और बाद में बदले राजनीतिक हालात की वजह से यह मस्जिद एयरपोर्ट के ऑपरेशनल एरिया के अंदर ही बनी हुई है.

मुस्लिमों के विरोध के कारण नहीं शिफ्ट हो पाई मस्जिद!

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मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस मस्जिद को रनवे से दूर किसी दूसरी जगह शिफ्ट करने की कई कोशिशें हुईं, लेकिन हर बार मुस्लिमों के विरोध के कारण बात अटक गई. जानकारी के अनुसार, पिछले कई दशकों में केंद्र और राज्य सरकारों ने मस्जिद को पास के किसी नए स्थान पर शिफ्ट करने का प्रस्ताव रखा, पर मुस्लिम समुदाय ने इसे बार-बार ठुकरा दिया. अधिकारियों ने भी मस्जिद को गिराने की बजाय सुरक्षित रूप से कहीं और स्थानांतरित करने का ही प्रस्ताव दिया था.

सरकार ने क्या निकाला था बीच का रास्ता?

2003 में एक बैठक के बाद रनवे को मोड़कर समस्या का समाधान करने का निर्णय लिया गया. 2019 में, AAI ने जेसोर रोड से मस्जिद तक एक सुरंग (टनल) बनाकर ऊपर की जमीन को टैक्सी ट्रैक के लिए उपयोग करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन सुरक्षा वजहों से मंजूरी नहीं मिली. 2023 में, एयरपोर्ट अथॉरिटी ने एक आवागमन बस सेवा शुरू की, ताकि नमाजियों को एयरपोर्ट के संचालन क्षेत्र से सुरक्षित होकर मस्जिद तक पहुंचाया जा सके. रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में नमाजियों के लिए 225 मीटर लंबी बस सर्विस और पैदल रास्ता शुरू किया गया, जो टैक्सीवे के ऊपर से गुजरता है यानी विमानों के आने-जाने के रास्ते पर ही लोग चलते हैं.

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विमान और यात्रियों की सुरक्षा पर सवाल

मस्जिद की वजह से सेकेंडरी रनवे का लगभग 88 मीटर हिस्सा इस्तेमाल नहीं हो पाता. ऐसे में यदि प्राइमरी रनवे किसी वजह से बंद हो जाए, तो आपात स्थिति में विमान की लैंडिंग में गंभीर दिक्कत पैदा हो सकती है. रोजाना 50-60 लोग नमाज पढ़ने आते हैं, जुमे के दिन यह संख्या 200-250 तक पहुंच जाती है और रमजान में इससे भी ज्यादा लोग आते हैं. ऐसे में इतने संवेदनशील क्षेत्र में आम लोगों का आना-जाना सुरक्षा के लिहाज़ से बड़ा जोखिम है.

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इस पर निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने भी 2018 में लिखा था कि मस्जिद की इस लोकेशन की वजह से कोई भी बाहरी व्यक्ति एयरपोर्ट के सुरक्षित क्षेत्र में प्रवेश कर सकता है. उनके मुताबिक, मस्जिद की मौजूदगी सुरक्षा के लिहाज़ से खतरा पैदा करती है और मुस्लिम समुदाय को आगे आकर समाधान निकालना चाहिए ताकि एक सकारात्मक संदेश जा सके.

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