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राहुल-अखिलेश में लड़ाई ! यूपी में फंस गया मामला
राहुल गांधी और अखिलेश के बीच भयंकर लड़ाई की ख़बर सामने आ रही है। दरअसल यूपी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले जो समीकरण बिगड़ रहे हैं वो इशारा कर रहे हैं कि यूपी में दोनों पार्टियों का खेल पलट सकता है। देखिये एक विश्लेषण।
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दो लड़कों की कहानी समझने के लिए आपको थोड़ा पीछे जाना होगा।
बात है साल 2017 की। उस समय फिर से मुख्यमंत्री बनने का सपना देखते हुए अखिलेश यादव ने राहुल गांधी से हाथ मिलाया था। यूपी में इन दोनों नेताओं की जोड़ी ने ‘यूपी के लड़के v/s बाहरी मोदी’ का नारा बुलंद किया था। इस नारे ने सपा को जितना नुक़सान पहुंचाया, उसका अंदाजा भी सपाइयों के लिए लगाना मुश्किल था। जहां एक तरफ 2012 में सपा को 224 सीटें मिली थीं और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हुए थे, वहीं बसपा को 80 सीटें मिली थीं और NDA सिर्फ 47 सीटों पर सिमटकर रह गया था।
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2017 में सपा-कांग्रेस का गठबंधन बीजेपी की लहर में इतना कमजोर पड़ा कि यह गठबंधन सिर्फ़ 47 सीटें ही जीत पाया।
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सोचिए, बसपा को 19 सीटें मिली थीं, जबकि NDA को 325 सीटों की प्रचंड जीत हासिल हुई। 2017 के चुनावों में, राहुल और अखिलेश की जोड़ी ने सीधे तौर पर NDA को फायदा पहुंचाया। 2012 के मुकाबले NDA को 278 सीटों का फायदा हुआ, जबकि विपक्षी गठबंधन को 177 सीटों का नुकसान हुआ। हार के बाद, दोनों के रास्ते अलग हो गए थे, लेकिन उससे पहले हार का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ा गया था।
इसके बाद, अखिलेश ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा से हाथ मिलाया। इस बार भी 'बुआ-बबुआ' की जोड़ी से उम्मीदें थीं, लेकिन सच कहें तो कमाल बसपा के साथ हुआ। सपा को इन चुनावों में फिर से हार का सामना करना पड़ा, जबकि बसपा ने 10 सीटें जीतीं, और सपा के खाते में सिर्फ़ 5 सीटें आईं। फिर क्या, 2022 के विधानसभा चुनावों में अखिलेश ने प्रण लिया कि किसी बड़े दल से गठबंधन नहीं करेंगे। लेकिन अकेले अपने दम पर वह कहां तक लड़ सकते थे? लगातार गिरते जनाधार के बीच, अखिलेश ने 2024 में फिर राहुल का हाथ पकड़ा। लेकिन इस बार क्या नतीजे रहे, वो जानिए - 37 सीटें अखिलेश के पास आईं और कांग्रेस को 6 सीटें मिलीं।
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अब जो हुआ सो हुआ, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए अखिलेश ने अभी से कमर कस ली है।
अब उनके सामने चुनौती है कांग्रेस को अपने साथ लाना। देखिए, लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को ज़रूरत थी, तो अखिलेश से बात की गई। लेकिन अब कांग्रेस के नेता दबी जुबान में कह रहे हैं कि 'हमें उनकी ज़रूरत नहीं, बल्कि उन्हें हमारी ज़रूरत है।' स्थिति उलझी हुई है, और इसका एक कारण यह भी है कि 4 जून के बाद से अखिलेश और राहुल एक साथ कोई मंच शेयर करते हुए नज़र नहीं आए हैं, सिवाय राजनीतिक कार्यक्रमों के।
तो, 2027 का लक्ष्य अभी दूर है, और रास्ता दोनों का एक ही है। हां, कांग्रेस जानती है कि मुख्यमंत्री उनका तो होना नहीं है, तो अब सवाल यह है कि वे एक साथ आगे बढ़ेंगे या फिर अलग-अलग? यह देखना दिलचस्प होगा।
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