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सदियों तक टिकाऊ, तूफान झेलने की क्षमता, शिल्पकला के लिए उत्कृष्ट... राजस्थान के खास लाल पत्थर से बनेगा मां जानकी मंदिर, अद्भुत है खासियत

सीतामढ़ी के पुनौराधाम में बन रहे भव्य जानकी मंदिर के निर्माण में उपयोग हो रहा है राजस्थान का प्रसिद्ध लाल सैंडस्टोन, जिसे उसकी मजबूती, सुंदरता और स्थापत्य परंपरा के लिए जाना जाता है. यह वही पत्थर है जो समय की रफ्तार को थामने की क्षमता रखता है. सदियों तक टिकाऊ, मौसम के प्रभाव से लगभग अछूता और स्थापत्य की दृष्टि से अद्वितीय. यही कारण है कि राम मंदिर से लेकर जानकी मंदिर तक, यह पत्थर देश की आस्था का मजबूत आधार बनता जा रहा है. इसकी विशिष्ट खूबियों में शामिल हैं इसकी लंबी उम्र, गहराई लिए रंग, और शिल्पकला के अनुरूप कटने की उत्कृष्ट क्षमता, जो इसे अन्य पत्थरों से अलग बनाती है. राजस्थान के इस लाल पत्थर के बिना किसी भी भव्य मंदिर की कल्पना अधूरी मानी जा रही है.

Image: Janaki Temple / Representational
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सदियों तक टिकाऊ, तूफान झेलने की क्षमता, शिल्पकला के लिए उत्कृष्ट...मां जानकी के मंदिर में उपयोग होने जा रहा राजस्थान का खास लाल पत्थर, खासियत अद्भुतजब भी देश में किसी भव्य मंदिर या ऐतिहासिक इमारत का निर्माण होता है, तो एक नाम ज़रूर सामने आता है, वह है राजस्थान का वंशी पहाड़पुर लाल पत्थर. अब यही खास लाल बलुआ पत्थर बिहार के सीतामढ़ी स्थित पुनौराधाम में बन रहे मां जानकी मंदिर की भव्यता को आकार देगा. मंदिर का निर्माण पूरी तरह इसी पत्थर से किया जा रहा है, ताकि उसकी एकरूपता, मजबूती, सुंदरता और चमक सालों साल कायम रहे.

क्या है इस लाल पत्थर की खासियत?
राजस्थान के करौली जिले के वंशी पहाड़पुर क्षेत्र से निकाला जाने वाला यह पत्थर “रेड सैंडस्टोन” यानी लाल बलुआ पत्थर के नाम से जाना जाता है. मगर बहुत कम लोगों को को इस पत्‍थर की खासियत की जानकारी होगी. तो आइए हम आज इस पत्‍थर की खासियत के बारे में जानते हैं. 

प्राकृतिक मजबूती और टिकाऊपन
इस पत्थर की पहली विशेषता ये है कि इसे प्रकृति ने लाखों वर्षों में तैयार किया है. यह इतनी ठोस होती है कि यह सदियों तक बिना टूटे या क्षतिग्रस्त हुए संरचना को मजबूती देता है. यही वजह है कि यह बड़े-बड़े धार्मिक और ऐतिहासिक इमारतों के निर्माण के लिए यह पहली पसंद होता है.

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महीन बनावट, सुंदर कलाकारी के लिए अनुकूल
प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले इस बलुआ पत्थर की बनावट इतनी महीन और समान है कि उस पर नक्काशी और कलात्मक डिज़ाइन उकेरना बेहद आसान होता है. कारीगर जो कलाकृति उकेरते हैं वह काफी तीखा और मजबूत होता है. यही कारण है जिसकी वजह से इस पत्‍थर का सबसे ज्‍यादा प्रयोग किया जाता है. पत्‍थर की समरूपता भी इसे खास बनाती है. जिससे कलाकृति स्‍पष्‍ट रूप से उकेरी हुई दिखाई देती है. मंदिरों की दीवार पर एक कथा उकेरी जाती है. ऐसे में ऐसे पत्‍थर की जरूरत होती है जो महीन से महीन नक्‍काशी को उकेरने के लिए साफ सुथरी और टिकाउ हो. यह पत्‍थर इन जरूरतों को पूरी करता है.

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प्राकृतिक रंग, जो समय के साथ निखरता है
राजस्‍थान के करौली जिले के इस बलुआ पत्थर का लाल रंग प्राकृतिक रूप से गहरा लाल होता है. जो सूर्य की चमकदार रोशनी और दिन के समय के और ज्‍यादा चमकदार हो जाता है. जिस कारण यह मंदिर या इमारत को एक राजसी और दिव्य रूप प्रदान करता है.

समय के प्रभाव से बेअसर है ये लाल बलुआ पत्‍थर
इस लाल बलुआ पत्‍थर की एक और खास बात ये है कि कि यह गरमी, सर्दी और वर्षा और आसानी से झेल सकता है. जो समय की रफ्तार को धीमा कर देता है. गर्मी और अचानक हुई बरसात में भी यह पत्‍थर टूटता या चटकता नहीं है. ऐसे में यह पत्‍थर हर मौसम में टिकाऊ बना रहता है. आसान भाषा में कहा जाए तो तापमान के प्रभाव से यह न तो सिकुड़ता या न ही फैलता है. जिससे संरचना पर कोई असर नहीं पड़ता है.

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भारतीय स्‍थापत्‍य कला से सहज रूप से जुड़ जाता है ये पत्‍थर
इसका लाल गेरुआ रंग भी इसे खास बनाता है. जिससे भारतीय संस्‍कृति का जुड़ाव सहज हो जाता है. इस लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग भारत की प्राचीन विरासत में भी किया गया है. भारतीय स्‍थापत्‍य कला से जुड़ी इमारतों जैसे लाल किला, आगरा का किला, अयोध्या में बने श्रीराम मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल किया गया है. बताते चलें कि बुद्ध सम्‍यक संग्रहालय के निर्माण में भी इसी पत्‍थर का प्रयोग किया जा रहा है. 

पुनौराधाम मंदिर के लिए क्यों चुना गया यही पत्थर?
बिहार सरकार की ओर से बनवाए जा रहे 151 फीट ऊंचे मां जानकी मंदिर में एकरूपता, भव्यता और परंपरा का अद्भुत संगम नजर आए, इसलिए राजस्थान के इसी खास लाल पत्थर को चुना गया. परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि “हम चाहते थे कि मंदिर की हर दीवार एक जैसी दिखे, उसकी आभा दूर से ही श्रद्धा भाव जगाए और वह सौ साल बाद भी वैसी ही चमकती रहे. इस वजह से वंशी पहाड़पुर का लाल पत्थर का चयन किया गया. जो भारत में सबसे उपयुक्त है.”

सिर्फ पत्थर नहीं, आस्था और शिल्प की पहचान
बताते चलें कि यह पत्थर सिर्फ एक निर्माण सामग्री नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और शिल्प कला की भी पहचान है. इसके माध्यम से न केवल एक मंदिर बनता है, बल्कि उसमें परंपरा, शिल्प और श्रद्धा की आत्मा समाहित होती है. राजस्थान का यह लाल बलुआ पत्थर अब बिहार के धार्मिक पर्यटन को नई ऊंचाई देने वाला है. पुनौराधाम में बन रहा मां जानकी मंदिर आने वाले समय में सिर्फ एक आस्था केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय स्थापत्य कला की भव्य मिसाल बनकर उभरेगा.

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पुनौरा धाम में बनेगा मां जानकी मंदिर, युद्ध स्तर पर कार्य कर रही बिहार सरकार 

बिहार के पुनौराधाम के विकास के लिए नीतीश कुमार सरकार तेज गति से कार्य कर रही है. पिछले साल नवंबर में बिहार कैबिनेट की बैठक में सीतामढ़ी के पुनौराधाम मंदिर के आसपास पर्यटकीय विकास के लिए आधारभूत संरचनाओं के निर्माण के लिए 50.50 एकड़ भूमि अधिग्रहण के लिए 120 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि की प्रशासनिक स्वीकृति दी गई थी. मां जानकी मंदिर के निर्माण को लेकर लंबे समय से की जा रही मांग के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जून में सोशल मीडिया के जरिए मां जानकी की जन्मस्थली पुनौराधाम को समग्र रूप से विकसित किए जाने से जुड़े भव्य मंदिर सहित अन्य संरचनाओं के डिजाइन के तैयार होने की जानकारी दी थी. डिजाईन और फंड सहित अन्य जरूरी नीतिगत फैसलों को कैबिनेट पहले ही मंजूरी दे चुकी है.

बिहारियों के लिए आस्था का केंद्र है पुनौरा धाम

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बिहार के सीतामढ़ी जिले के पुनौरा गांव में मां जानकी जन्मभूमि मंदिर है जिसे पुनौरा धाम के नाम से भी जाना जाता है. ऐसा माना जाता है कि माता सीता का जन्म इसी स्थान पर हुआ था. इससे जुड़ी कथा है कि मिथिला में एक बार भीषण अकाल पड़ी और वहां के  पुरोहित ने राजा जनक को खेत में हल चलाने की सलाह दी. जब राजा जनक हल चला रहे थे तब जमीन से मिट्टी का एक पात्र निकला, जिसमें माता सीता शिशु अवस्था में थी. उन्होंने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया तथा उनका नाम ‘सीता’ रखा, जिसका संस्कृत में अर्थ "खाड़ी" होता है. उन्होंने उन्हें जानकी नाम भी दिया, जिसका अर्थ "जनक की पुत्री" होता है.

‘जानकी कुंड में नहाने से होती है संतान प्राप्ति’

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बिहार सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक पुनौरा धाम में मंदिर के पीछे जानकी कुंड के नाम से एक सरोवर है. इस सरोवर को लेकर मान्यता है कि इसमें स्नान करने से संतान प्राप्ति होती है. यहां पंथ पाकार नाम की प्रसिद्ध जगह है. यह जगह माता सीता के विवाह से जुड़ी हुई है. इस जगह पर प्राचीन पीपल का पेड़ अभी भी है, जिसके नीचे पालकी बनी हुई है.

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