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क्या Congress भूल गई बहरुल इस्लाम को कैसे बनाया गया Supreme Court का जज ?

Nishikant Dubey ने जैसे ही देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठाया तो देश में जैसे भूचाल आ गया, कांग्रेस भी निशिकांत दुबे के बयान के बहाने मोदी सरकार पर ही हल्ला बोल दिया लेकिन जब निशिकांत दुबे ने बहरुल इस्लाम का जिक्र छेड़ कर नेहरू और इंदिरा दौर की कांग्रेस की जड़ें खोद दी !

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कानून अगर सुप्रीम कोर्ट ही बनाएगा तो संसद भवन बंद कर देना चाहिए.ये बयान है बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे का. जब सुप्रीम कोर्ट ने संसद से पास हुए कानून पर ही सवाल उठाया तो गुस्से से भरे बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने ये तीखा बयान दिया.झारखंड के गोड्डा से सांसद निशिकांत दुबे ने जैसे ही देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठाया, देश की राजनीति में हलचल मच गई. यहां तक कि दशकों तक सत्ता में रही कांग्रेस भी निशिकांत दुबे के इस बयान के बहाने मोदी सरकार पर हमलावर हो गई. लेकिन जल्दी ही बीजेपी ने भी कांग्रेस पर पलटवार किया.

निशिकांत दुबे ने बहरुल इस्लाम का जिक्र छेड़कर कांग्रेस के इतिहास की परतें खोल दीं.दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में कई न्यायाधीश हुए, लेकिन बहरुल इस्लाम जैसा कोई नहीं.पहले नेहरू राज में सांसद बने.फिर हाईकोर्ट के जज.और बाद में इंदिरा गांधी के दौर में सुप्रीम कोर्ट के जज.कार्यकाल खत्म होने से पहले इस्तीफा दिया, तो कांग्रेस ने उन्हें फिर से राज्यसभा सांसद बना दिया.

इसी इतिहास को याद दिलाते हुए निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया पर लिखा:“कांग्रेस के ‘संविधान बचाओ’ की एक मजेदार कहानी. बहरुल इस्लाम साहब ने 1951 में कांग्रेस की सदस्यता ली. कांग्रेस ने उन्हें 1962 में राज्यसभा भेजा, 1968 में दोबारा भेजा. फिर बिना राज्यसभा से इस्तीफा दिलाए हाईकोर्ट का जज बना दिया. 1979 में गुवाहाटी हाईकोर्ट का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश, 1980 में सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया. 1977 में इंदिरा गांधी पर लगे भ्रष्टाचार के केस उन्होंने खत्म कर दिए. फिर कांग्रेस ने 1983 में उन्हें तीसरी बार राज्यसभा सांसद बना दिया. क्या मैं कुछ नहीं बोलूं?”

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वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान निशिकांत दुबे ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोला. इससे पहले 2024 में बीजेपी सांसद बृजलाल ने भी संसद में इसी मुद्दे पर कांग्रेस को घेरा था.

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अब बात करते हैं बहरुल इस्लाम की

  • जन्म: 1 मार्च 1918, कामरूप, असम
  • पढ़ाई: गुवाहाटी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
  • वकालत की शुरुआत: 1951, असम हाईकोर्ट
  • कांग्रेस में शामिल: 1956

इसके बाद कांग्रेस ने उन्हें 1962 और फिर 1968 में राज्यसभा भेजा. कार्यकाल पूरा होने से पहले उन्हें हाईकोर्ट का जज बनाया गया.

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  • 1972: असम और नागालैंड हाईकोर्ट के जज बने
  • 1979: कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश
  • 1980: सुप्रीम कोर्ट के जज बने

हाईकोर्ट से रिटायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में जज बनाए जाना अपने आप में असाधारण था, क्योंकि रिटायर जजों को फिर से नियुक्त नहीं किया जाता.सबसे विवादास्पद रहा उनका 1983 का फैसला, जब उन्होंने कांग्रेस नेता और बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को जालसाजी के केस में बरी कर दिया और एक महीने बाद सुप्रीम कोर्ट से इस्तीफा दे दिया.

19 जनवरी 1983 को उन्होंने असम की बारपेटा लोकसभा सीट से नामांकन दाखिल किया लेकिन हिंसा के कारण चुनाव रद्द हो गया. कांग्रेस ने फिर उन्हें तीसरी बार राज्यसभा भेज दिया.यह कांग्रेस के दौर की न्यायपालिका का वो चेहरा है, जिसे लेकर आज बीजेपी सवाल उठा रही है.

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जब पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को मोदी सरकार ने राज्यसभा भेजा, तो कांग्रेस ने सवाल खड़े कर दिए, जबकि खुद के दौर में न्यायपालिका को राजनैतिक रूप से इस्तेमाल किया गया.इसीलिए सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच तनाव के इस दौर में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस को उसी के इतिहास की याद दिलाई है.

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