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कांग्रेस नेता सैयद अजीमपीर खादरी के दावे पर मचा विवाद, कहा- इस्लाम अपनाने को तैयार थे डॉ. बीआर अंबेडकर
कर्नाटक के शिगगांव में कांग्रेस नेता सैयद अजीमपीर खादरी ने एक कार्यक्रम में कहा कि संविधान निर्माता डॉ. बीआर अंबेडकर इस्लाम अपनाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन अंततः उन्होंने बौद्ध धर्म चुना। उनके इस बयान के बाद विवाद बढ़ गया। कांग्रेस ने खुद को उनके बयान से अलग कर लिया, और बीजेपी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी, इसे अंबेडकर की विरासत को गलत तरह से प्रस्तुत करने की कोशिश बताया।
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डॉ. भीमराव अंबेडकर, जिन्हें संविधान निर्माता और भारत के दलित समुदाय के महानायक के रूप में याद किया जाता है, का जीवन और उनके द्वारा उठाए गए कदम हमेशा से भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। हाल ही में कर्नाटक के शिगगांव में एक चुनावी रैली के दौरान पूर्व विधायक सैयद अजीमपीर खादरी ने दावा किया कि डॉ. अंबेडकर इस्लाम अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार थे। हालांकि उन्होंने अंततः बौद्ध धर्म का चयन किया, लेकिन इस बयान ने कर्नाटक में एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है।
11 नवंबर को कर्नाटक के शिगगांव विधानसभा उपचुनाव के दौरान कांग्रेस के उम्मीदवार यासिर अहमद खान पठान के समर्थन में एक सभा को संबोधित करते हुए खादरी ने दावा किया कि डॉ. अंबेडकर ने इस्लाम धर्म अपनाने पर विचार किया था। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि यदि अंबेडकर ने इस्लाम अपनाया होता, तो पूरा दलित समुदाय उनका अनुसरण कर सकता था। उन्होंने यहां तक सुझाव दिया कि प्रमुख दलित हस्तियों के नाम मुस्लिम नामों में बदल सकते थे।
डॉ. अंबेडकर का इस्लाम धर्म अपनाने पर विचार
डॉ. अंबेडकर की जीवन यात्रा एक समाज सुधारक के रूप में बेहद संघर्षपूर्ण रही है। उनका प्रमुख उद्देश्य भारतीय समाज में मौजूद जाति-व्यवस्था और भेदभाव को समाप्त करना था। इस संघर्ष में उन्होंने विभिन्न धर्मों का अध्ययन किया और देखा कि कौन-सा धर्म दलित समुदाय को उचित सम्मान और बराबरी का दर्जा दे सकता है। एक समय ऐसा भी आया जब अंबेडकर ने हिंदू धर्म को छोड़ने का निर्णय लिया और इसके लिए उन्होंने इस्लाम और ईसाई धर्म का भी गहन अध्ययन किया।
लेकिन, उन्होंने अंत में बौद्ध धर्म को चुना क्योंकि वह इसमें समानता और शांति का संदेश देखते थे। अंबेडकर ने 1956 में अपने हजारों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया, और यह कदम भारतीय समाज में धार्मिक परिवर्तन का प्रतीक बन गया।
खादरी ने अपने बयान में दलित और मुस्लिम समुदायों के बीच ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि कई दलित बस्तियों के पास मुस्लिम दरगाहों की उपस्थिति इन दोनों समुदायों के बीच भाईचारे का प्रतीक है। उनका मानना था कि अंबेडकर अगर इस्लाम अपनाते, तो दलित समुदाय का एक बड़ा हिस्सा भी इस्लाम का अनुसरण कर सकता था। यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिससे कांग्रेस पार्टी ने अपने नेता के बयान से किनारा कर लिया। पार्टी के नेताओं ने इसे व्यक्तिगत विचार बताया और इसे डॉ. अंबेडकर की विचारधारा के विपरीत माना। कांग्रेस नेता एमएलसी नागराज यादव ने कहा, "खादरी का बयान अनुचित है। डॉ. अंबेडकर को सभी धर्मों का सम्मान था और उन्होंने यह निर्णय स्वयं लिया कि वह किस धर्म का अनुसरण करना चाहते हैं।"
भाजपा ने इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी और इसे कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा बताया। भाजपा प्रवक्ता ने कहा, "यह कांग्रेस की सियासत का हिस्सा है, जहां धर्म और जाति के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश की जाती है। डॉ. अंबेडकर एक महान नेता थे, जिन्होंने अपने सिद्धांतों पर जीवन व्यतीत किया।" भाजपा का दावा है कि इस तरह के बयान भारतीय समाज में अस्थिरता पैदा करने का प्रयास हैं, जो कांग्रेस के हित में हैं।
वैसे आपको बता दें कि खादरी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव नहीं लड़ रहे हैं और इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़े हुए हैं। हालांकि खादरी के इस बयान से कांग्रेस के लिए नए राजनीतिक संकट पैदा हो सकते हैं। जहां एक ओर भाजपा इसे कांग्रेस की वोट बैंक राजनीति के रूप में देख रही है, वहीं कांग्रेस ने अपने नेता के बयान से खुद को अलग करके विवाद को कम करने का प्रयास किया है।
डॉ. अंबेडकर की विचारधारा को लेकर यह विवाद केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह इस बात की ओर भी इशारा करता है कि आज भी भारतीय समाज में धर्म और जाति का विषय किस तरह राजनीति का एक प्रमुख हथियार बना हुआ है।
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