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POCSO में दोषी, फिर भी कोर्ट ने किया बरी… कपल के लिए SC ने इस्तेमाल की ‘स्पेशल पावर’, पलट गई कहानी!
कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के तहत सजा काट रहे शख्स को बरी कर दिया. इस केस का अंत फिल्मी अंदाज में हुआ है. क्योंकि इस केस को कोर्ट ने वासना नहीं प्यार का माना.
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सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने एक प्रेमी जोड़े को अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए बड़ी राहत दी है. कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के तहत सजा काट रहे शख्स को बरी कर दिया. इस केस का अंत फिल्मी अंदाज में हुआ है.
ये मामला दो ऐसे लोगों से जुड़ा है जो प्यार में थे लेकिन लड़की नाबालिग थी. इसलिए मामला पॉक्सो के तहत आ गया. लड़के पर पॉक्सो के तहत केस दर्ज हो गया. इसके बाद उसे 10 साल की सजा सुनाई गई थी. शख्स ने इसके खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन कोर्ट ने अपील खारिज कर दी. इसके बाद शख्स ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया. अब कपल ने शादी कर ली और उनका एक बच्चा भी है. मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि, कपल खुशहाल जीवन जी रहा है और दोनों का एक बच्चा भी है. अदालत का कहना है कि, आरोपी और पीड़िता के बीच वासना का नहीं बल्कि प्रेम का रिश्ता था. जिसके मद्देनजर आरोपी को रिहा किया जा सकता है.
सबसे पहले जानें सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
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सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मामले की सुनवाई की. बेंच ने कहा, बेशक आरोपी पॉक्सो अधिनियम के तहत दोषी है, लेकिन कानून की कठोरता को अन्याय का कारण नहीं बनने दिया जा सकता है. जिसमें अभियुक्त और पीड़िता ने शादी कर ली और दोनों के एक बच्चा भी है. कभी कभी कानून को न्याय के आगे झुकना पड़ता है. यह देखते हुए कि वह अपराध वासना का नहीं बल्कि प्रेम का परिणाम था.
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इस केस में कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत खास शक्तियों का इस्तेमाल किया. कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही, जिसमें दोषसिद्धि और सजा भी शामिल है, को रद्द कर दिया और युवा कपल को बड़ी राहत दी. शीर्ष अदालत ने कहा कि, अब यह कपल खुशी-खुशी शादीशुदा है और उनका एक बच्चा भी है.
‘न्याय के लिए कानून को झुकना चाहिए’
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जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि कानून के मुताबिक लड़का दोषी था, लेकिन कानून की सख्ती नाइंसाफी में बदल सकती है. ऐसे में लड़के के साथ नाइंसाफी नहीं होनी चाहिए. कोर्ट ने कहा, हम यह मानने को मजबूर हैं कि यह ऐसा मामला है जहां न्याय के लिए कानून को झुकना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में लड़की ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान युवक की पत्नी ने अपने खुशहाल जीवन के बारे में बताया. पत्नी ने कहा, वह अपने पति और बच्चे के साथ एक खुशहाल, सामान्य और शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहती है. जिस पर कोर्ट ने कहा कि, एक गंभीर अपराध के दोषी व्यक्ति के मामले में समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती. लेकिन कोर्ट ने यह भी माना कि, पत्नी की करुणा और सहानुभूति की पुकार को नजरअंदाज करना न्याय के हित में नहीं होगा.
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कोर्ट ने अपने फैसले में व्यावहारिकता और सहानुभूति के पहलू को अपनाया. कोर्ट ने कहा कि ऐसे खास मामलों में, जहां सब कुछ सही लगे सबसे गंभीर अपराधियों को भी दयालुता से न्याय मिलता है. इस मामले के अनोखे तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, व्यावहारिकता और सहानुभूति को मिलाकर एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है. कोर्ट ने कहा कि, लड़के को जेल में रखने से परिवार, पीड़ित और बच्चे को नुकसान होगा. पॉस्को एक्ट के तहत आने वाले अपराध पर विचार करते हुए, हमने यह पाया कि यह अपराध वासना का नहीं, बल्कि प्यार का नतीजा था. खुद पीड़ित ने भी शांतिपूर्ण और पारिवारिक जीवन जीने की इच्छा जताई है. वह अपने पति पर निर्भर है और नहीं चाहती कि उसके पति के माथे पर अपराधी होने का दाग लगे.
शख्स को बरी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने क्या शर्तें रखीं?
कोर्ट ने युवक को राहत देते हुए उसे बरी तो कर दिया, लेकिन कुछ शर्तें भी रख दी. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि, शख्स भविष्य में पत्नी और बच्चे का सम्मानपूर्वक भरण-पोषण करेगा और उन्हें नहीं छोड़ेगा. अगर उसने ऐसा नहीं किया, तो इसके नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि, पति अपनी पत्नी और बच्चे को कभी अकेला नहीं छोड़ सकता. आखिर में ये केस All ends that ends well की अवधारणा के साथ खत्म हो गया. परिवार ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर बेहद खुशी जताई. कोर्ट ने इसे वासना का न मानकर प्यार का नतीजा माना.
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क्या है POCSO?
साल 2012 में POCSO यानी Protection of Children from Sexual Offences एक्ट बनाया गया. इसका मकसद बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों में कड़ी सजा देना और उनकी सुरक्षा को मजबूत करना है. यह 18 साल से कम उम्र के बच्चों को यौन शोषण, यौन उत्पीड़न और पोर्नोग्राफी से बचाने और अपराधियों को सजा देने के लिए बनाया गया है. 14 नवंबर 2012 से पूरे भारत में यह कानून लागू हुआ था.
पहले भी SC ने किया विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया
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सुप्रीम कोर्ट कुछ केस में अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल कर सकता है. यह पहली बार नहीं है कोई फैसला स्पेशल पावर के तहत दिया गया है. इससे पहले सहमति से हुए प्रेम संबंध जिसमें नाबालिग शामिल थे, उन्हें अपराध की श्रेणी में आने से कोर्ट ने रोका है. मई 2025 में ही सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 का इस्तेमाल किया था और दोषी ठहराए गए शख्स को बरी कर दिया था. उस केस में कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई थी कि, अपने प्रेमी को जेल से छुड़ाने के लिए पीड़िता को कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी.