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Brijesh Thapa: शहीद जवान की मां ने बोली ऐसी बात, सुनकर कलेजा फट जाएगा

Brijesh Thapa: शहीद जवान की मां ने बोली ऐसी बात, सुनकर कलेजा फट जाएगा

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Brijesh Thapa : आंखे अभी भी दरवाजे पर राह तक रही होगी , वो माँ बेटे की प्रतीक्षा में राते जग रही होगी

पता नहीं लिखने वाले ने क्या ही सोचकर लिखा होगा। लेकिन इसके एक-एक शब्द आज दार्जिलिंग के रहने वाले  26 साल के शहीद Brijesh Thapa के घर की चौखट पर जाकर सत्य साबित हो रहा है। 


मां जानती है, बेटा बृजेश अब लौटकर नहीं आएगा। उनके पिता जानते हैं कि आर्मी में रहकर देश के लिए खुद को न्यौछावर कर देना बड़ी बात होती है। और चाचा भी जानते हैं कि भतीजा देश के लिए अपनी जान दे चुका है। साथ ही पूरा दार्जिलिंग और देश जानता है कि बृजेश ने आतंक से लोहा लेते हुए अपनी जान गंवा चुका है। 

जम्मू कश्मीर के डोडा में आतंकियों और सेना के बीच मुठभेड़ हुई। इसी मुठभेड़ में बृजेश थापा आतंकियों के निशाने पर आ गए। परिवार के लोगों से रविवार को आखिरी बार बात हुई। और मंगलवार को एक साथ सेना के पांच जवान आतंकियों के साथ लड़ते लड़ते देश के लिए जान दे बैठे। 

बृजेश के माता और पिता की बातें आंखों में नमी और  सीने में दहक पैदा करती है। ये भी सच है कि किसी मां और पिता को ये यकीन करने में तो वक्त भी लगता है कि अब उनका बेटा इस दुनिया में नहीं है। 

वह बचपन से ही भारतीय सेना में जाना चाहते थे।  वह मेरी आर्मी ड्रेस पहनते थे और घूमते थे। इंजीनियरिंग करने के बाद भी वह वह अभी भी सेना में जाना चाहता था। उसने एक ही बार में परीक्षा पास कर ली और सेना में भर्ती हो गया। मुझे गर्व है कि मेरे बेटे ने देश के लिए और देश की सुरक्षा के लिए कुछ किया।

ट्रेनिंग पूरा होने के बाद साल 2019 में बृजेश आर्मी में कमीशंड हुए थे। पहले दो साल के लिए तैनाती हुई थी 10 राष्ट्रीय राइफल्स में। बृजेश आर्मी में ही जाना चाहते थे, ये उनके जिद्द और जुनून दोनों में ही बसा हुआ था। पिता चाहते थे कि बृजेश आर्मी में जाएं। लेकिन होता वही है जो विधि के विधान में पहले से लिखा हुआ है। 

कैप्टन बृजेश थापा ने वैसे तो इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। लेकिन मन में सिर्फ एक ही बात थी कि आर्मी में जाएं। कैप्टन बृजेश की ये जिद्द पूरी भी हुई, लेकिन 15 जुलाई 2024 के दिन एक फोन कॉल ने कुछ घंटों के लिए कैप्टन बृजेश थापा के घर में सब कुछ रोक दिया। मां और पिता को कुछ घंटों के लिए इस बात पर यकीन भी नहीं हुआ लेकिन सच को कौन बदल सकता है। दार्जिलिंग की हवा में ये बात हमेशा के लिए दर्ज हो गई कि शहर का एक लड़का देश के लिए खुद की जान को न्यौछावर कर दिया। 


शहीद कैप्टन बृजेश की निलिमा मां पुराने दिनों में खो गई हैं। उन्हें याद है कि जिस दिन को लोग आर्मी डे के नाम से जानते हैं, उसी दिन शहीद बृजेश का जन्मदिन होता है। 

15 जनवरी को बेटे का जन्मदिन था। 15 जनवरी को ही आर्मी डे होता है।मेरा बेटा आर्मी की ड्यूटी करते हुए देश के लिए समर्पित हो गया। सेना में होने का उसको गर्व था। उसके पापा ने कहा भी कि नेवी में चले जाओ लेकिन वो नहीं माना। आर्मी में ज्वाइन करने की उसने जिद्द ठान ली थी। अब वो कभी लौटकर नहीं आएगा। 

एक मां के दिल पर ये बात बार-बार चोट करती होगी कि उनका बेटा सिर्फ 26 साल का था। जी, सिर्फ 26 साल का। आखिरी मुकालात की तस्वीर मां की आंखों में छपी हुई है। जहन में सारी बातें बसी हुई है। एक-एक शब्द कान में फिर से घुल रहे हैं। लेकिन पुरानी यादों का क्या है, वो तो सिर्फ यादों में ही रह जाती है। 


मार्च के महीने में घर आया था। इसी महीने फिर से घर आने वाला था। वो हमेशा खुश रहता था। बिल्कुल सादा खाना खाता था। मीठा इसलिए नहीं खाता था कि मोटा हो जाएगा। किसी न किसी को तो जान देनी ही होती, कोई तो बॉर्डर पर जाएगा। अगर कोई लड़ेगा नहीं तो दुश्मन कैसे हारेंगे। 

शहीद कैप्टन बृजेश थापा अब कभी लौटकर नहीं आएंगे। आखिरी बार अपने मां और पिता से बात करते हुए उन्होंने जिक्र किया था कि उन्हें लगातार सात घंटे तक चढ़ाई करके ऊपर की ओर जाना है। ये उनका तकरीबन डेली रूटीन था। लेकिन किसी को क्या ही मालूम था कि ये उनकी आखिरी चढ़ाई होगी। देश के लिए शहीद होना बड़ी बात होती है। लेकिन उससे भी बड़ी बात होती है कि शहीद के परिवार इस बात को गले से लगा लें कि आतंक के खात्मे के लिए उन्हें सबकुछ मंजूर है।  

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