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झारखंड के हजारीबाग में बड़ा बवाल, उपद्रवियों ने शोभायात्रा पर किया पथराव,सड़क जाम, मची अफरातफरी

खबरों के मुताबिक, नौ दिवसीय श्री शतचंडी महायज्ञ की शोभायात्रा का नगर भ्रमण किया गया था. इस यात्रा में बड़ी संख्या में लोग निकले थे. फिर अचानक से यात्रा पर पथराव होने शुरू हो गया. थोड़ी देर बाद भीड़ अचानक से इकट्ठा हो गई. इसके बाद दोनों तरफ के लोग आमने-सामने आ गए. इस दौरान जमकर पथराव हुआ और गुस्साए लोगों ने गुमटी में आग लगा दी. इसके बाद माहौल और भी ज्यादा खराब हो गया. घटना के बाद इलाके में तनाव बढ़ गया.

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आज 14 अप्रैल को देशभर में संविधान नायक बाबा भीमराव आंबेडकर साहब की जयंती मनाई जा रही है. दूसरी तरफ यूपी के दलित समाज से आने वाले राज्यसभा के सपा सांसद रामजी लाल सुमन की राणा सांगा पर की गई टिप्पणी को लेकर बवाल और सियासत तेज हो गई है. एक तरफ राजपूत समुदाय नाराज़ दिखाई दे रहा है, तो दूसरी तरफ दलित समुदाय के वोट बैंक की अहमियत बढ़ती दिखाई दे रही है. इस खास मौके को भुनाने के लिए यूपी का सत्ता पक्ष और विपक्ष आपस में भिड़ गया है. दोनों के बीच दलित वोटर्स को साधने के लिए एक जंग सी छिड़ गई है. एक सर्वे के मुताबिक यूपी में 21 प्रतिशत दलित मतदाता हैं, जो किसी भी चुनाव में हार-जीत को लेकर बड़ी भूमिका निभाते हैं. ऐसे में आंबेडकर जयंती से पहले सियासत तेज हो गई है.

दलित वोटर्स को साधने के लिए बीजेपी ने चलाया अभियान

आपको बता दें कि साल 2014 के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में खासतौर से बीजेपी की सफलता में दलित और अन्य पिछड़े वर्गों का खास योगदान रहा है. हाल ही में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को दलितों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ने का आग्रह किया है. उन्होंने कहा कि "जब तक हम लोगों के सामने सही तथ्य पेश नहीं करते, तब तक जो लोग राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए उन्हें गुमराह कर रहे हैं, वे दलितों और वंचितों का शोषण करते रहेंगे."

दलित वोटर्स को लुभाने के लिए बीजेपी ने 15 दिवसीय "आंबेडकर सम्मान अभियान" शुरू किया है. इस अभियान के तहत बीजेपी ने कार्यकर्ताओं को दलित-हितैषी योजनाओं के प्रचार की ज़िम्मेदारी दी है. यह पूरा घटनाक्रम साफ इशारा कर रहा है कि 2027 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में दलित वोट बैंक फिर से निर्णायक भूमिका निभाने जा रहा है.

2024 लोकसभा चुनाव में दलित और ओबीसी वोटर्स का बिगड़ा था संतुलन

2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का दलित और ओबीसी वोटर्स के बीच संतुलन बिगड़ गया था, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा. खासतौर से पार्टी आरक्षण के मुद्दों को इन दोनों समुदायों को समझाने में पीछे रह गई. इसमें सबसे ज़्यादा आरक्षण खत्म होने की चर्चा और 69,000 शिक्षकों की भर्ती वाला मुद्दा बीजेपी के लिए नुकसानदायक साबित हुआ. यही वजह है कि बीजेपी संगठन अब आने वाले चुनाव में इस तरह की कोई अफवाह या चूक को बर्दाश्त नहीं करने वाला.

अखिलेश यादव ने कांशीराम के जरिए दलितों को खींचने की कोशिश की

इटावा में आंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण करते हुए सपा मुखिया अखिलेश यादव ने सभा को संबोधित करते हुए बसपा के संस्थापक कांशीराम के पार्टी से संबंधों को रेखांकित किया था. अखिलेश यादव की नज़र भी दलित वोट बैंक पर टिकी हुई है. हाल ही में हुए कार्यक्रम के दौरान संविधान पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि "हम बाबा भीमराव आंबेडकर के संविधान को बदलने की अनुमति नहीं देंगे."
इसके अलावा आंबेडकर को एक अद्वितीय वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री और समाज सुधारक के रूप में सराहा था. उन्होंने भेदभाव के अनुभव को भी संविधान के निर्माण के लिए काफी महत्वपूर्ण बताया था.
अखिलेश यादव का दलित वोट बैंक हाल ही में और भी ज्यादा मजबूत हुआ है, जहां बसपा के संस्थापक सदस्य रहे दादू प्रसाद ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ले ली है. इससे प्रतीत होता है कि सपा अपने साथ दलित चेहरों को जोड़ने के लिए हर तरह का प्रयास कर रही है.

सांसद रामजी लाल सुमन ने अपने घर हुए हमलों को गठबंधन पर हमला बताया
विवादित सपा सांसद रामजी लाल सुमन ने अपने आवास पर हुए हमले को पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक यानी पीडीए से जोड़ते हुए गठबंधन पर बड़ा हमला बताया था. बता दें कि समाजवादी पार्टी के लिए दलित और अल्पसंख्यकों का एक रणनीतिक वोट बैंक काफी महत्वपूर्ण है.

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