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ईरान के तेल मार्ग 'होर्मुज' के बंद होने की अटकलों के बीच भारत ने प्लान-B पर शुरू किया काम, इन देशों से बढ़ाया तेल आयात

इजरायल के साथ जारी तनाव के बीच ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने की धमकी दी है, जो दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग माना जाता है. इससे वैश्विक क्रूड सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका है. लेकिन हालात को भांपते हुए भारत ने पहले ही रूस और अमेरिका जैसे विकल्पों से तेल आयात बढ़ा दिया है. ऐसे में अगर होर्मुज बंद भी होता है, तो भारत पर इसका खास असर नहीं पड़ेगा.

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ईरान और इज़रायल के बीच जारी तनाव और अमेरिका की सक्रियता के चलते खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात बनते जा रहे हैं. इस बीच ईरान की ओर से लगातार 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को बंद करने की धमकियां दी जा रही हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा मंडराने लगा है. इस दबाव के बीच भारत ने रणनीतिक रूप से बड़ा कदम उठाते हुए मिडिल ईस्ट देशों की तुलना में रूस और अमेरिका से कहीं अधिक कच्चे तेल का आयात कर रहा है. 

रूस से आयात दो साल के उच्चतम स्तर पर
ग्लोबल ट्रेड एनालिस्ट फर्म केप्लर के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, जून महीने में भारत का रूस से तेल आयात रोजाना 2 से 2.2 मिलियन बैरल तक पहुंच गया है, जो पिछले दो वर्षों में सबसे अधिक है. रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा हालात को देखते हुए भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है. पश्चिम एशिया से आपूर्ति बाधित होने की आशंका के बीच भारतीय रिफाइनर्स ने रूस और अमेरिका जैसे विकल्पों की ओर झुकाव बढ़ाया है. इसका सीधा असर यह हुआ कि मिडिल ईस्ट देशों से होने वाला आयात घट गया है. इससे भारत का रूस पर तेल निर्भरता अब इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे पारंपरिक सप्लायर्स से भी ज़्यादा हो चुकी है. यही नहीं भारत का रूस पर तेल निर्भरता अब इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे पारंपरिक सप्लायर्स से भी ज़्यादा हो चुकी है. जून में इन मिडिल ईस्ट देशों से भारत का औसतन क्रूड ऑयल इंपोर्ट लगभग 2 मिलियन बैरल प्रति दिन रहने का अनुमान है, जबकि मई 2025 में रूस से आयात 1.96 मिलियन BPD था. यानी एक महीने के भीतर ही इसमें उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. 

अमेरिकी तेल आयात में भी बड़ा उछाल
रूस के साथ-साथ अमेरिका से भी भारत का कच्चे तेल का आयात तेजी से बढ़ा है. जून में यह आंकड़ा बढ़कर 439,000 बैरल प्रतिदिन पहुंच गया, जो मई में 280,000 बैरल प्रतिदिन था. यानी एक महीने में इसमें लगभग 57% की वृद्धि देखी गई है. केप्लर के चीफ रिसर्च एनालिस्ट सुमित रिटोलिया का कहना है कि, “फिलहाल इजरायल और ईरान संघर्ष के बावजूद आपूर्ति अप्रभावित है, लेकिन समुद्री गतिविधियों से साफ संकेत मिल रहे हैं कि मिडिल ईस्ट से आने वाले दिनों में तेल की ढुलाई में कमी आ सकती है.” खाड़ी क्षेत्र में खाली टैंकर भेजने में जहाज मालिक हिचकिचा रहे हैं. इसलिए इनकी संख्या घटकर 69 से सिर्फ 40 रह गई है. MEG-बाउंड सिग्नल की संख्या में भी गिरावट आई है, ओमान की खाड़ी से ऐसे सिग्नल आधे हो चुके हैं.

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तनाव बढ़ा तो भारत क्या करेगा?
अगर ईरान और अमेरिका के बीच तनाव और बढ़ता है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में कोई बाधा आती है, तो भारत की रणनीति तैयार है. रिपोर्ट के मुताबिक, 1 से 19 जून के बीच रूस से आए तेल की हिस्सेदारी भारत के कुल कच्चे तेल आयात में 35% से ज्यादा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात बिगड़ते हैं, तो भारत रूस से और ज्यादा तेल खरीदेगा. इसके अलावा, भले ही अमेरिका, नाइजीरिया, अंगोला और ब्राजील जैसे देशों से तेल मंगवाने में खर्च ज्यादा हो, भारत ऐसे विकल्पों की ओर भी रुख कर सकता है. अगर स्थिति और गंभीर हुई, तो भारत अपने रणनीतिक तेल भंडार का भी इस्तेमाल कर सकता है, जो करीब 9 से 10 दिन के तेल आयात को कवर कर सकता है.

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बताते चलें कि भारत जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, अपनी करीब 40% कच्चे तेल और 50% गैस की जरूरत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए पूरी करता है. यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल रूट्स में से एक है. लेकिन फिलहाल यह रास्ता ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण खतरे में नजर आ रहा है. इस बीच ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर हालात बिगड़े, तो वह होर्मुज को बंद कर सकता है. ऐसा हुआ तो असर सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया पर पड़ेगा. जानकारों के मुताबिक, दुनिया का करीब 26% कच्चा तेल इसी रूट से गुजरता है, और इसमें से 44% तेल एशियाई देशों में जाता है, जिसमें सबसे ज्यादा चीन और उसके बाद भारत शामिल हैं. 

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