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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाक के समर्थन में पोस्ट करने वाले की जमानत याचिका की खारिज, कहा- राष्ट्र विरोधी मानसिकता को बढ़ावा नहीं

सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देशविरोधी हरकतें करने वालों को हाईकोर्ट ने बड़ा सबक सिखाया है. कोर्ट ने एक आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए दो टूक कहा, 'राष्ट्र विरोधी मामलों के प्रति न्यायापालिका की सहनशीलता से इस तरह के मामलों में वृद्धि हो रही है. भारत विरोधी पोस्ट साझा करना देश की संप्रभुता को चुनौती देने जैसा और देश की अखंडता को बुरी तरह प्रभावित करने वाला है.

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फेसबुक पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ की पोस्ट शेयर करने वाले 62 वर्षीय आरोपी अंसार अहमद सिद्दकी की जमानत खारिज हो गई है. हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि "याचिकाकर्ता का यह काम स्पष्ट रूप से संविधान का अपमान है. देश विरोधी पोस्ट करना करना देश की संप्रभुता को चुनौती देने जैसा और देश की अखंडता को बुरी तरह प्रभावित करने वाला है.

पाकिस्तान जिंदाबाद पोस्ट करने वाले शख्स की जमानत याचिका खारिज 

फेसबुक पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ की पोस्ट शेयर करने वाले 62 वर्षीय आरोपी अंसार अहमद सिद्दकी की जमानत खारिज हो गई है. हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने सुनवाई के दौरान कहा कि "राष्ट्र विरोधी मामलों के प्रति न्यायापालिका की सहनशीलता से इस तरह के मामलों में वृद्धि हो रही है. देश में इस तरह की अपराध करना आम बात हो गई है. अदालतें, राष्ट्र विरोधी मानसिकता वाले व्यक्तियों के ऐसे कृत्यों के प्रति उदार और सहनशील हैं."

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हाईकोर्ट ने आगे कहा कि "याचिकाकर्ता का यह काम स्पष्ट रूप से संविधान का अपमान है. देश विरोधी पोस्ट करना करना देश की संप्रभुता को चुनौती देने जैसा और देश की अखंडता को बुरी तरह प्रभावित करने वाला है. याचिकाकर्ता सीनियर सिटीजन हैं, उनकी उम्र बताती है कि वह स्वतंत्र भारत में जन्मे हैं. इसके बावजूद उनका यह गैर जिम्मेदारी भरा और राष्ट्र विरोधी आचरण उन्हें संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता के अधिकार के संरक्षण का पात्र नहीं बनाता."

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याचिकाकर्ता का आचरण देश के हित के खिलाफ - कोर्ट 

आरोपी की जमानत अर्जी खारिज करने के साथ ही कोर्ट ने यह निर्देश भी दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ निचली अदालत में केस की सुनवाई जितनी जल्द हो सके, उतनी जल्दी पूरी की जाए. यूपी के बुलंदशहर के छतरी थाने में अंसार अहमद सिद्दकी के खिलाफ बीएनएस की धारा 197 (राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने वाला कृत्य), 152 (भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाला कृत्य) के तहत केस दर्ज किया गया था. मामले की सुनवाई के दौरान, अंसार अहमद के वकील ने दलील दी थी कि 3 मई, 2025 को याचिकाकर्ता ने फेसबुक पर केवल वीडियो शेयर किया. वह सीनियर सिटीजन हैं और उनका इलाज चल रहा है.

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वहीं सरकारी वकील ने अंसार अहमद सिद्दकी की जमानत अर्जी का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का आचरण देश के हित के खिलाफ है. वह जमानत पर रिहा होने का पात्र नहीं है. सरकारी वकील ने यह भी कहा कि यह वीडियो पहलगाम में आतंकियों द्वारा 26 लोगों की निर्मम हत्या किए जाने के बाद पोस्ट किया गया था. इसलिए यह साफ तौर पर साबित होता है कि याचिकाकर्ता ने धार्मिक आधार पर आतंकियों के कृत्य का समर्थन किया है. दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 26 जून के अपने आदेश में कहा कि भारत के हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह संविधान का पालन करे. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता का सम्मान करे.

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