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संभल हिंसा पर अखिलेश यादव का तीखा बयान, कहा "भाईचारे को खत्म करने की सोची-समझी साजिश"

संभल हिंसा ने पूरे उत्तर प्रदेश को हिलाकर रख दिया है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे "भाईचारे को खत्म करने की साजिश" करार देते हुए सरकार और प्रशासन पर तीखे आरोप लगाए हैं। उन्होंने कोर्ट के आदेश और पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े करते हुए इसे चुनावी राजनीति का हिस्सा बताया।

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उत्तर प्रदेश के संभल जिले में हुई हिंसा ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है। इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी के प्रमुख और सांसद अखिलेश यादव ने लोकसभा में सरकार और प्रशासन पर तीखा हमला किया। उन्होंने इस घटना को "भाईचारे को खत्म करने की सोची-समझी साजिश" करार दिया। अखिलेश का कहना है कि यह घटना सिर्फ एक स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरी साजिश है, जिसका उद्देश्य सामुदायिक सौहार्द्र को तोड़ना और राजनीति को भटकाना है।
क्या हुआ था संभल में?
संभल में हाल ही में एक विवादित जमीन पर सर्वे के दौरान हालात इतने बिगड़ गए कि हिंसा भड़क उठी। इस घटना में पुलिस ने फायरिंग की, जिससे पांच लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बना हुआ है। घटना की शुरुआत तब हुई जब स्थानीय प्रशासन ने विवादित जमीन पर कार्रवाई के लिए टीम भेजी। जामा मस्जिद के पास सर्वे की प्रक्रिया शुरू होते ही स्थानीय लोग विरोध में उतर आए। इस दौरान पथराव की खबरें आईं, जिसके बाद पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए फायरिंग की। अखिलेश यादव का दावा है कि यह पूरा घटनाक्रम तानाशाही का नतीजा है और इसमें पुलिस एवं प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
अखिलेश यादव ने लगाए गंभीर आरोप
अखिलेश यादव ने इस पूरे घटनाक्रम पर सरकार और प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने लोकसभा में कहा कि "संभल में भाईचारे को खत्म करने की कोशिश की गई है।" उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह घटना चुनावी राजनीति का हिस्सा थी। उनका कहना है कि हिंदू-मुसलमानों के बीच जो भाईचारा हजारों साल से चला आ रहा था, उसे खत्म करने के लिए यह घटना सोची-समझी योजना के तहत की गई। अखिलेश ने आरोप लगाया कि "उत्तर प्रदेश में उपचुनाव के दौरान ध्यान भटकाने के लिए यह हिंसा कराई गई।"

अखिलेश यादव ने इस पूरे मामले में पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर कड़ा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि पुलिस ने "तानाशाही रवैया" अपनाया और लोगों के साथ बदसलूकी की। उन्होंने लोकसभा में आरोप लगाया कि "पुलिस के सीओ ने लोगों के साथ गाली-गलौज की और उनके शांतिपूर्ण विरोध को कुचलने के लिए गोलियां चलाईं।" उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन ने कोर्ट के आदेश का गलत फायदा उठाया और बिना किसी संवाद के जबरन कार्रवाई की। सपा प्रमुख ने मांग की है कि इस घटना में शामिल अधिकारियों को निलंबित किया जाए और उनके खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज हो।

संभल हिंसा की जड़ में कोर्ट का एक आदेश भी है, जिसे लेकर अखिलेश ने गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कोर्ट ने दूसरे पक्ष को सुने बिना ही आदेश जारी कर दिया, जिसके बाद प्रशासन ने महज दो घंटे के भीतर कार्रवाई शुरू कर दी। 22 तारीख को नमाजियों को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोक दिया गया, लेकिन इसके बावजूद कोई प्रदर्शन नहीं हुआ। इसके बाद, 29 तारीख को अगली सुनवाई तय थी, लेकिन 24 तारीख को अचानक सर्वे का आदेश दिया गया और प्रशासन ने सुबह-सुबह मस्जिद पहुंचकर कार्रवाई शुरू कर दी। अखिलेश का कहना है कि यह तानाशाही है और जनता को दबाने की साजिश है।

संभल हिंसा में मारे गए पांच लोगों के परिवार अभी भी सदमे में हैं। अखिलेश यादव ने इन मृतकों के परिवारों को न्याय दिलाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह घटना पुलिस और प्रशासन की लापरवाही और गलत फैसलों का नतीजा है। सपा प्रमुख ने मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने और इस मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग इस हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए। अखिलेश यादव ने इस पूरे घटनाक्रम को "दिल्ली और लखनऊ के बीच की सियासी लड़ाई" करार दिया। उन्होंने कहा कि "लखनऊ वाला रास्ता दिल्ली से होकर गुजरता है," और इसी वजह से ऐसे विवाद पैदा किए जा रहे हैं। सपा प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया कि यह लड़ाई सिर्फ जमीन का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीति छुपी हुई है।
क्या है सरकार का पक्ष?
सरकार की ओर से इस मामले पर अभी तक कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। हालांकि, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्थिति का जायजा लेने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक बुलाई है। सरकार का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जो भी जरूरी कदम उठाने होंगे, वे उठाए जाएंगे।

संभल हिंसा ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह घटना वास्तव में भाईचारे को खत्म करने की साजिश थी, जैसा कि अखिलेश यादव दावा कर रहे हैं? या फिर यह प्रशासन की लापरवाही और अदालत के आदेश का गलत पालन था? इन सवालों के जवाब समय के साथ सामने आएंगे, लेकिन इतना साफ है कि इस घटना ने सामुदायिक सौहार्द्र को गहरी चोट पहुंचाई है।
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