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Yogi नहीं अखिलेश खत्म करेंगे केशव का राजनीतिक सफर, लेकिन क्यों
अखिलेश यादव लगातार केशव प्रसाद मौर्य के खिलाफ हमलावर रहे हैं। अखिलेश के निशाने पर सीएम योगी आदित्यनाथ से अधिक केशव रहते हैं। इसको लेकर कारणों की चर्चा शुरू हो गई है। पूरे मामले को पीडीए राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। इस पर खूब चर्चा हो रही है।
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जब से योगी अादित्यनाथ सीएम बने है तब से भीतर ही भीतर योगी और केशव के बीच जो तनातनी है वो जगजाहिर है, और अब तो केशव खुलकर बयान भी देने लगे है, कि संगठन सरकार से बड़ा है, लेकिन वो बात अलग है कि सात साल से वो सरकार का ही हिस्सा है, और सत्ता का सुख भोगते भोगते भी संगठन की याद आना बताता है कि सीएम बनने का अरमान अभी भी दिल में जिंदा है, और तो और वो कहने लगे है कि बीजेपी में नेताओं को पता भी होता कि वो सीएम बन जाएंगे ।खैर केशव जो राजनीति कर रहे है उससे वो केंद्र के भी निशाने पर है ।
अब राज्य में भी तनातनी और केंद्र से भी लड़ाई मोल ले रहे है तो इस दोहरी राजनीति से केशव क्या करना चाहते है वो बात समझ से परे है ।ये तो रही केशव की बात अब बात अखिलेश की भी समझ लिजिए ।अखिलेश यादव को अक्सर देखा गया है कि अखिलेश सीधे तौर पर योगी पर हमला करने से बचते है, लेकिन केसव प्रसादज मौर्य के बारे में वो लिखते और बोलते रहते है ।लेकिन समझने वाली बात ये है कि ऐसा क्यो ।तो उसके पीछे है उनका पिछड़ा दलित अल्पसंखयक समाकरण, हालांकि उनका PDA अब PDAA हो चुका है क्योंकि चाचा को गच्चा देकर उन्होने माता प्रसाद पांडेय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाकर ब्रहा्मण वोटों को साधने की कोशिश की है ।हालांकि वो वोट अखिलेश के पास आएगा इस बात में ज्यादा दम नहीं है ।लेकिन पिछड़ा वोटबैंक अखिलेश साध लेना चाहते है, क्योंकि 2024 के चुनाव में वो राहुल-अखिलेश के पास ट्रांस्फर हुआ है ।इस वोटबैंक पर अखिलेश की नजर है, क्योंकि अखिलेश को लगता है कि ये उनही की वजह से आया है, लेकिन असल में वो कांग्रेस की वजह से आया है, क्योंकि चुवान राष्ट्रीय था और अखिलेश ठहरे क्षेत्रीय नेता ।
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अब यहां केशव प्रसाद मौर्य की भूमिका सामने आती है क्योंकि यूपी में पिछड़े वोटबैंक का बड़ा चेहरा केशव प्रसाद को माना जाता है, और वो इस वोटबैंक को बीजेपी के पाले में लाने में नाकामयाब रहे, केशव भले ही इस बात को नहीं मानेंगे लेकिन कड़वी है मगर सच्चाई है ।तो अब अखिलेश अपनी राजनीति का गियर बदलकर उस पिछड़े वोटबैंक को अपना बना लेना चाहते है और पिछड़ा वोट अगर सपा के खाते में गया तो राजनीतिक तौर पर केशव प्रसाद की हैसियत बीजेपी के भीतर कमजोर पड़ जाएगी ।इसिलिए ऐसा कहा जा रहा है कि क्या अखिलेश की कीसी के साथ कोई डील हो गई है ।अखिलेश यादव अगर अपने इस मंसूबे में कामयाब हो जाते है तो ये योगी आदित्यनाथ के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन पार्टी के लिए खासकर 2027 के लिए खतरनाक हो सकता है ।
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साथ ही यूपी में होने वाले उपचुनाव में भी नुकसान उठाना पड़ सकता है ,वैसे अखिलेश और केशव की अदावत काफी पुरानी है ।मतलब 2017 में जब बीजेपी ने तीन सौ से ज्यादा सीटें जीतकर अखिलेश की सत्ता को उखाड़ा था तब से अखिलेश मानते है कि केशव ही वो चेहरा थे जिसकी वजह से ओबीसी वोट बीजेपी के पाले में गए थे और अखिलेश को बहुत बूरी हार का सामना करना पड़ा था, क्योंकि उस वक्त यूपी बीजेपी के अध्यक्ष केशव प्रसाद ही थे, लेकिन शायद ऐसा नहीं है क्योंकि जब 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 71 सीटें जीती थी, तभी 2017 की पटकथा लिख दी गई थी, और उसका कारण था मोदी लहर ।लेकिन अगर अखिलेश को लगता है वो केशव थे तो क्या ही किया जा सकता है ।तो एक तरफ तो केशव योगी से अदावत ले बैठे है, और दुसरा अखिलेश उनसे राजनीतिक लिहाज से सब कुछ छीन लेना चाहते है ।बाकि अखिलेश ऐसा कर पाते है या नहीं वो उपचुनाव 2027 का चुनाव बता ही देगा ।