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कम दृष्टि वालों के लिए नई रोशनी, PM मोदी के मार्गदर्शन में CSIO ने बनाए गजब के लो-विजन चश्मे
PM Modi: देश में लगभग 1.4 करोड़ लोग कम दृष्टि समस्या से प्रभावित हैं. ऐसे में यह लो-विजन एड चश्मा उनके लिए एक नई उम्मीद बनकर सामने आया है. यह तकनीक न सिर्फ देखने की क्षमता बढ़ाती है, बल्कि लोगों को आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और बेहतर जीवन जीने का अवसर भी देती है.
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Amazing Low-Vision Glasses: कम दृष्टि दोष से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए अब एक बहुत बड़ी और अच्छी खबर सामने आई है. वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के चंडीगढ़ स्थित केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन (सीएसआईओ) ने ऐसे खास चश्मे तैयार किए हैं, जो कम दिखने वाले लोगों की ज़िंदगी को काफी आसान बना सकते हैं. इन चश्मों को लो-विजन एड (LVA) चश्मा कहा जाता है. ये चश्मे उन लोगों के लिए हैं जिनकी आंखों की रोशनी बहुत कम हो चुकी है और जिन पर सामान्य चश्मे, कॉन्टैक्ट लेंस या ऑपरेशन का कोई असर नहीं होता.
क्या होता है कम दृष्टि दोष?
कम दृष्टि दोष एक स्थायी समस्या होती है. इसमें व्यक्ति पूरी तरह अंधा नहीं होता, लेकिन उसे साफ दिखाई देना बहुत मुश्किल हो जाता है. आम तौर पर स्वस्थ व्यक्ति 6 मीटर की दूरी से जो चीज साफ देख सकता है, कम दृष्टि वाले व्यक्ति को वही चीज देखने के लिए बहुत पास जाना पड़ता है. ऐसे लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी जैसे पढ़ना, लिखना, चलना-फिरना और काम करना काफी कठिन हो जाता है.
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कैसे काम करता है यह नया चश्मा?
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सीएसआईओ द्वारा बनाए गए इन चश्मों में एस्फेरिक लेंस लगाए गए हैं. यह एक खास तरह का लेंस होता है, जो रोशनी को बहुत सही तरीके से फोकस करता है. इस वजह से कम दृष्टि वाले लोग चीजों को ज्यादा साफ और बड़ा देखकर समझ पाते हैं. यह चश्मा +26 डायोप्टर तक की दृष्टि शक्ति वाले लोगों के लिए उपयोगी है. आसान शब्दों में कहें तो यह चश्मा आंखों के लिए मैग्निफाइंग ग्लास की तरह काम करता है, लेकिन पहनने में सामान्य चश्मे जैसा ही होता है.
किसने तैयार की यह तकनीक?
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इस नई तकनीक को सीएसआईओ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मुकेश कुमार और उनकी टीम डॉ. नेहा खत्री, डॉ. नीलेश कुमार और डॉ. नीलम कुमारी ने मिलकर विकसित किया है. इस तकनीक को 3 दिसंबर 2024 को अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस के मौके पर पेश किया गया. यह एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि मानी जा रही है.
बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए कैसे फायदेमंद?
यह चश्मा खासतौर पर कम दृष्टि वाले बच्चों के लिए बहुत मददगार है. इससे बच्चे कक्षा में बोर्ड देख सकते हैं, किताबें पढ़ सकते हैं, कंप्यूटर चला सकते हैं और खेल-कूद व मनोरंजन की गतिविधियों में भी भाग ले सकते हैं. वहीं बुज़ुर्गों के लिए यह चश्मा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में मदद करता है, ताकि वे अपने रोज़मर्रा के काम खुद कर सकें और किसी पर निर्भर न रहें.
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हल्का, मजबूत और सस्ता चश्मा
इन चश्मों को एक खास प्लास्टिक सामग्री (एक्रिलिक) से बनाया जा रहा है, जिसे इंजेक्शन मोल्डिंग प्रक्रिया से तैयार किया जाता है. इससे चश्मा मजबूत भी बनता है और वजन में भी काफी हल्का होता है. कांच के लेंस की तुलना में इसका वजन लगभग 60 प्रतिशत कम है. हल्का होने के कारण इसे लंबे समय तक पहनना आसान होता है और आंखों पर दबाव भी नहीं पड़ता.
परीक्षण और वितरण
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इस तकनीक का परीक्षण कानपुर स्थित एल्मिको और देहरादून के राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तीकरण संस्थान में किया गया है. इसके अलावा चंडीगढ़ के इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड के बच्चों पर भी इसका सफल परीक्षण हुआ है. बच्चों को यह चश्मा पहनाने से उनकी देखने की क्षमता में साफ सुधार देखा गया.
इन चश्मों का वितरण जून और अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा अलग-अलग कार्यक्रमों में किया गया है. सरकार और वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि यह चश्मा कम कीमत में जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे.
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देश में लगभग 1.4 करोड़ लोग कम दृष्टि समस्या से प्रभावित हैं. ऐसे में यह लो-विजन एड चश्मा उनके लिए एक नई उम्मीद बनकर सामने आया है. यह तकनीक न सिर्फ देखने की क्षमता बढ़ाती है, बल्कि लोगों को आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और बेहतर जीवन जीने का अवसर भी देती है.