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बीजेपी के 48 विधायक चुनेंगे दिल्ली का नया मुख्यमंत्री, ऐसे होगी वोटिंग

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में बीजेपी ने 48 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि दिल्ली का अगला मुख्यमंत्री कौन बनेगा? 19 फरवरी को बीजेपी विधायक दल की बैठक होगी, जहां नए मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर लग सकती है। इस बैठक में कैसे वोटिंग होती है, मुख्यमंत्री का चयन कैसे किया जाता है और कौन-कौन से नेता रेस में हैं।

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दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 70 में से 48 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है, जबकि आम आदमी पार्टी (आप) को 22 सीटें मिली हैं। इस शानदार सफलता के बावजूद, नए मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा में देरी हो रही है, जिससे जनता और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच उत्सुकता बढ़ गई है।
मुख्यमंत्री चयन की प्रक्रिया

मुख्यमंत्री के चयन के लिए भाजपा विधायक दल की बैठक महत्वपूर्ण होती है। इस बैठक में नवनिर्वाचित विधायकों के साथ-साथ पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय पर्यवेक्षक भी शामिल होते हैं। बैठक की अध्यक्षता आमतौर पर प्रदेश अध्यक्ष द्वारा की जाती है, जो मुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवारों के नाम प्रस्तावित करते हैं। इसके बाद, विधायकों से उन नामों पर सहमति या असहमति मांगी जाती है। यदि अधिकांश विधायक किसी एक नाम पर सहमत होते हैं, तो उसे मुख्यमंत्री पद के लिए चुना जाता है। अन्यथा, नए नामों पर विचार किया जाता है।
मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार
भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री पद के लिए कई नामों पर चर्चा हो रही है। इनमें प्रमुख हैं जिनमें से  एक है प्रवेश वर्मा। नई दिल्ली सीट से विधायक चुने गए प्रवेश वर्मा ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को हराया है। वे पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के पुत्र हैं और जाट समुदाय से आते हैं। इसके साथ ही रोहिणी से तीन बार के विधायक विजेंद्र गुप्ता पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और प्रशासनिक अनुभव रखते हैं। सतीश उपाध्याय की बात करें तो मालवीय नगर से विधायक सतीश उपाध्याय पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और संगठन में मजबूत पकड़ रखते हैं। इसके साथ ही जनकपुरी से विधायक आशीष सूद पार्टी के प्रदेश महासचिव रह चुके हैं और पंजाबी समुदाय का प्रमुख चेहरा माने जाते हैं। साथ ही साथ रोहतास नगर से तीन बार के विधायक जितेंद्र महाजन वैश्य समुदाय से आते हैं और उनकी छवि एक साफ-सुथरे नेता की है।
विधायक दल की बैठक में देरी का कारण
पहले यह बैठक 18 फरवरी को निर्धारित थी, लेकिन अंतिम समय में इसे 19 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दिया गया। इस देरी के पीछे पार्टी के भीतर गहन विचार-विमर्श और सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का चयन सुनिश्चित करना है। भाजपा नेतृत्व चाहता है कि सभी विधायकों और वरिष्ठ नेताओं की राय लेकर एक मजबूत और सर्वमान्य नेता का चयन किया जाए।

शपथ ग्रहण समारोह की तैयारी

नए मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह 20 फरवरी को दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में आयोजित होने की संभावना है। इस भव्य आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री, भाजपा और एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, उद्योगपति, फिल्मी हस्तियां, क्रिकेट खिलाड़ी, साधु-संत और राजनयिकों के शामिल होने की उम्मीद है। भाजपा सूत्रों के अनुसार, इस समारोह में 12 से 16 हजार लोगों को आमंत्रित किया जाएगा। दिल्ली के राजनीतिक इतिहास में मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण में देरी के उदाहरण पहले भी देखे गए हैं। वर्ष 2013 में, चुनाव परिणाम 8 दिसंबर को आए थे, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने 28 दिसंबर को शपथ ली थी, यानी 20 दिनों बाद। इस बार, चुनाव परिणाम 8 फरवरी को घोषित हुए, और शपथ ग्रहण 20 फरवरी को होने की संभावना है, यानी 12 दिनों बाद। इससे स्पष्ट होता है कि मुख्यमंत्री चयन और शपथ ग्रहण में समय लगना नई बात नहीं है।
भाजपा नेतृत्व मुख्यमंत्री पद के लिए एक ऐसे चेहरे की तलाश में है, जो न केवल पार्टी के भीतर बल्कि जनता के बीच भी लोकप्रिय हो। साथ ही, आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए, पार्टी एक ऐसे नेता को चुनना चाहती है, जो दिल्ली में पार्टी की स्थिति को और मजबूत कर सके। इस प्रक्रिया में देरी पार्टी की सावधानीपूर्वक रणनीति और सर्वसम्मति से निर्णय लेने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
दिल्ली के नए मुख्यमंत्री का चयन भाजपा की आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया, विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व, और आगामी राजनीतिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा। इस महत्वपूर्ण निर्णय का प्रभाव न केवल दिल्ली की राजनीति पर, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा।
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