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वैज्ञानिकों ने किया कमाल...नई कॉन्टैक्ट लेंस से अब इंसान भी देख सकेंगे इंफ्रारेड रोशनी!

इंफ्रारेड तकनीक का सबसे बड़ा उपयोग रात में देखने की क्षमता में सुधार करना है. चूंकि सभी गर्म वस्तुएं इंफ्रारेड विकिरण उत्सर्जित करती हैं, इसलिए इस लेंस की मदद से अंधेरे में भी वस्तुओं और जीवित प्राणियों को आसानी से देखा जा सकेगा. यह सैन्य कर्मियों, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है.

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विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लगातार हो रहे innovation हमारी दुनिया को देखने और समझने के तरीके को बदल रहे हैं. इसी कड़ी में, वैज्ञानिकों ने एक ऐसी अभूतपूर्व नई कॉन्टैक्ट लेंस विकसित की है, जो अब इंसानों को इंफ्रारेड रोशनी को भी देखने में सक्षम बनाएगी. यह खोज न केवल हमारे दृष्टि के दायरे को बढ़ाएगी, बल्कि कई क्षेत्रों में क्रांति ला सकती है, जिसमें सुरक्षा, चिकित्सा और दैनिक जीवन के अनुप्रयोग शामिल हैं.

यह शोध गुरुवार को सेल जर्नल में प्रकाशित हुआ। इसे चीन की यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, फुडान यूनिवर्सिटी और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों ने मिलकर अंजाम दिया।

मनुष्य की आंखें केवल 400 से 700 नैनोमीटर की तरंगदैर्ध्य वाली रोशनी को देख सकती हैं, जिससे वह प्रकृति की कई जानकारियों को नहीं देख पाती, लेकिन निकट-अवरक्त रोशनी, जिसकी तरंगदैर्ध्य 700 से 2,500 नैनोमीटर के बीच होती है, ऊतक में गहराई तक प्रवेश कर सकती है और बहुत कम विकिरण नुकसान पहुंचाती है।

वैज्ञानिकों ने दुर्लभ पृथ्वी तत्वों की मदद से ऐसी तकनीक विकसित की है, जो तीन अलग-अलग infrared wavelength को दृश्यमान लाल, हरे और नीले रंग में बदल देती है।

इससे पहले जानवरों को इंफ्रारेड रोशनी देखने में सक्षम बनाया


इससे पहले, इन्हीं वैज्ञानिकों ने एक नैनोमटेरियल तैयार किया था, जिसे जानवरों की आंखों में इंजेक्ट कर उन्हें इंफ्रारेड रोशनी देखने में सक्षम बनाया गया था, लेकिन मानव उपयोग के लिए यह व्यावहारिक नहीं था, इसलिए उन्होंने एक पहनने योग्य विकल्प 'सॉफ्ट कॉन्टैक्ट लेंस' डिजाइन करना शुरू किया।

शोध के अनुसार, टीम ने दुर्लभ पृथ्वी नैनोकणों की सतह को इस तरह संशोधित किया कि वे पारदर्शी पॉलिमर लेंस में घुलकर प्रयोग में लाए जा सकें।

Volunteers ने तीन अलग-अलग 'रंगों' में इंफ्रारेड रोशनी को पहचाना 


जिन मानव volunteers ने यह लेंस पहने, वे इंफ्रारेड पैटर्न, टाइम कोड्स और यहां तक कि तीन अलग-अलग 'रंगों' में इंफ्रारेड रोशनी को पहचानने में सक्षम रहे। इससे इंसानी दृष्टि की सीमा प्राकृतिक दायरे से बाहर तक बढ़ गई।

यह तकनीक न केवल मेडिकल इमेजिंग, सूचना सुरक्षा, बचाव अभियानों और रंग अंधता के इलाज में सहायक हो सकती है, बल्कि यह बिना किसी पावर स्रोत के काम करती है और कम रोशनी, धुंध या धूल में भी देखने की क्षमता बढ़ा सकती है।

इस तकनीक का अभी भी विकास जारी है और इसे बड़े पैमाने पर उपलब्ध होने में समय लग सकता है, लेकिन यह निश्चित रूप से मानव दृष्टि के भविष्य के लिए एक रोमांचक कदम है. यह हमें एक ऐसी दुनिया देखने का मौका देगी जिसे हम पहले कभी नहीं देख पाए थे.
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