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Kullu Dussehra : रामलीला-रावण दहन से अलग, देव मिलन की अनोखी 375 साल पुरानी परंपरा

कुल्लू दशहरा, हिमाचल प्रदेश का 375 साल पुराना अनोखा उत्सव, रामलीला और रावण दहन से अलग है. 2 से 8 अक्टूबर 2025 तक धालपुर मैदान में होने वाला यह त्योहार देव मिलन, रघुनाथ जी की रथ यात्रा और नाटी नृत्य के लिए मशहूर है. 250+ देवता पालकी में एकत्रित होते हैं, और सातवें दिन ब्यास नदी तट पर प्रतीकात्मक लंका दहन होता है. यह यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर है, जो लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है.

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रामलीला या रावण दहन से अलग: कुल्लू दशहरा की अनोखी परंपरा, 375 साल पुराने देव मिलन उत्सव की पूरी कहानीकुल्लू, हिमाचल प्रदेश का यह खूबसूरत घाटी शहर 'देवताओं की घाटी' के नाम से जाना जाता है. यहां का दशहरा उत्सव पूरे भारत के अन्य हिस्सों से बिल्कुल अलग है. जहां देशभर में रामलीला नाटक और रावण दहन का आयोजन होता है, वहीं कुल्लू दशहरा शांति, देवताओं के मिलन और सांस्कृतिक सामंजस्य पर केंद्रित है.

यह 375 साल पुराना उत्सव विजयादशमी के दिन से शुरू होता है और सात दिनों तक चलता है. 2025 में यह 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक मनाया जाएगा. लाखों श्रद्धालु और पर्यटक इस अंतरराष्ट्रीय स्तर के त्योहार में शामिल होते हैं, जहां 200 से अधिक स्थानीय देवता पालकी में सवार होकर एकत्रित होते हैं. आइए, इस अनोखे उत्सव की परंपरा, इतिहास और विशेषताओं पर विस्तार से नजर डालें.

कुल्लू दशहरा 2025

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कुल्लू दशहरा का आरंभ विजयादशमी के दिन होता है, जब बाकी भारत में दशहरा समाप्त हो चुका होता है. 2025 में यह त्योहार गुरुवार, 2 अक्टूबर को शुरू होगा और 8 अक्टूबर तक चलेगा. यह सात दिवसीय उत्सव धालपुर मैदान में आयोजित होता है, जहां रथ यात्रा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. मुख्य आकर्षणों में शामिल हैं:

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  • देव मिलन: विभिन्न गांवों से 250 से अधिक देवता पालकी में आते हैं और रघुनाथ जी के साथ मिलते हैं.
  • रथ यात्रा: भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति को सज्जित रथ पर निकाला जाता है, जिसे हजारों श्रद्धालु खींचते हैं.
  • सांस्कृतिक कार्यक्रम: हिमाचली लोक नृत्य 'नाटी', संगीत और 21 देशों से आने वाले कलाकारों के प्रदर्शन.

यह उत्सव यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल है और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करता है.

राजा जगत सिंह की कथा

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कुल्लू दशहरा की परंपरा 17वीं शताब्दी से जुड़ी है, जब कुल्लू के राजा जगत सिंह ने 1637 में अयोध्या से भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति को कुल्लू लाकर स्थापित किया. कथा के अनुसार, राजा जगत सिंह ने ब्यास घाटी के एक ब्राह्मण की पत्नी पर अन्याय किया, जिसके कारण उन पर श्राप लग गया. पापों से मुक्ति के लिए उन्होंने अयोध्या से रघुनाथ जी की मूर्ति मंगवाई.

मूर्ति के कुल्लू पहुंचने पर राजा ने इसे राज्य का शासक देवता घोषित किया और स्वयं उसके रीजेंट (प्रतिनिधि) बन गए. इसके बाद कुल्लू दशहरा की शुरुआत हुई, जो रघुनाथ जी को समर्पित है. यह उत्सव 1606 से चला आ रहा है, लेकिन जगत सिंह की कथा के कारण इसे 375 साल पुराना माना जाता है. 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसमें भाग लेकर इसे राष्ट्रीय महत्व दिया.

देव मिलन

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कुल्लू दशहरा की सबसे अनोखी विशेषता 'देव मिलन' है, जो हिंसा या नाटकीय दहन से कोसों दूर है. पहले दिन, विजयादशमी पर, कुल्लू घाटी के विभिन्न गांवों से देवता (जैसे हिडिम्बा देवी, बालू नाग) पालकी में सवार होकर धालपुर मैदान पहुंचते हैं. ये देवता स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जीवंत माने जाते हैं और इन्हें कंधों पर उठाकर लाया जाता है.

  • प्रक्रिया: देवताओं का आपस में 'मिलन' होता है, जो शांति और एकता का प्रतीक है. कोई रावण दहन नहीं होता; इसके बजाय लंका का प्रतीकात्मक दहन ब्यास नदी के किनारे किया जाता है.
  • महत्व: यह देवताओं की सभा दर्शाती है, जहां रघुनाथ जी मुख्य देवता के रूप में विराजमान होते हैं. यह रामलीला के नाटकीय प्रदर्शन से अलग, आध्यात्मिक और सामुदायिक एकता पर जोर देता है. यह परंपरा कुल्लू को 'देव भूमि' बनाती है, जहां देवता मानवीय रूप में भाग लेते हैं.

उत्सव की प्रमुख परंपराएं और रस्में

कुल्लू दशहरा में कई प्राचीन रस्में निभाई जाती हैं, जो स्थानीय संस्कृति को जीवंत करती हैं:

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रथ यात्रा और शोभायात्रा

पहले दिन रघुनाथ जी की मूर्ति को रंग-बिरंगे रथ पर स्थापित किया जाता है. रथ को श्रद्धालु रस्सी से खींचते हैं, जबकि संख, नगाड़े और शंख की ध्वनियां गूंजती हैं. यात्रा में देवताओं की पालकियां शामिल होती हैं.

सांस्कृतिक आयोजन

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  • नाटी नृत्य : हिमाचली लोक नृत्य, जो घेरे में किया जाता है.
  • फेयर और प्रदर्शनी: स्थानीय हस्तशिल्प, शॉल, जैम और अचार की दुकानें.
  • अंतरराष्ट्रीय भागीदारी: 21 देशों से कलाकार सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं.
  • समापन: लंका दहन

सातवें दिन ब्यास नदी तट पर लंका के प्रतीक (घास का ढेर) को आग लगाई जाती है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. इसके बाद देवता अपने गांवों को लौटते हैं.

कुल्लू दशहरा का महत्व

यह उत्सव अच्छाई पर बुराई की जीत का प्रतीक है, लेकिन कुल्लू में यह भगवान राम की विजय से अधिक स्थानीय देवताओं की एकता पर केंद्रित है. यह हिमाचल की विविधता को दर्शाता है, जहां रामायण की कथा को देव मिलन के माध्यम से जीया जाता है. पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह अनोखा है, क्योंकि कोई बड़े स्तर पर दहन नहीं होता.

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कुल्लू दशहरा ने हिमाचल को वैश्विक पटल पर स्थापित किया है. 4-5 लाख पर्यटक प्रतिवर्ष आते हैं, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं. यह त्योहार सिखाता है कि उत्सव केवल बाहरी दिखावे का नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और सामुदायिक बंधन का माध्यम है.

पर्यटकों के लिए टिप्स

  • कुल्लू पहुंचना आसान है – भुंतर एयरपोर्ट (50 किमी) या चंडीगढ़ (250 किमी) से. त्योहार के दौरान होटल बुकिंग पहले करें.
  • देखने लायक: रघुनाथ जी मंदिर, हिडिम्बा देवी मंदिर.
  • खान-पान: स्थानीय व्यंजन जैसे सिद्धू, बकरी और कुल्लू शॉल खरीदें.
  • सावधानियां: पहाड़ी इलाका होने से मौसम का ध्यान रखें; अक्टूबर में ठंड बढ़ जाती है.

कुल्लू दशहरा न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक यात्रा है.

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कुल्लू दशहरा की 375 साल पुरानी परंपरा रामलीला या रावण दहन से अलग होकर देव मिलन की शांतिपूर्ण छवि पेश करती है. यह उत्सव कुल्लू घाटी को देवताओं का साम्राज्य बनाता है, जहां इतिहास, आस्था और संस्कृति का अनोखा संगम होता है. 2025 में इस त्योहार में शामिल होकर आप हिमाचल की सच्ची धरोहर का अनुभव करेंगे. अधिक जानकारी के लिए हिमाचल पर्यटन विभाग की वेबसाइट himachaltourism.gov.in देखें.

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