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'UCC लागू करने पर विचार करे सरकार, फैसला संसद ले', मुस्लिम महिलाओं के अधिकार और शरियत कानून SC की बड़ी टिप्पणी!

मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के वक्त SC ने टिप्पणी की और कहा कि अगर पर्सनल लॉ महिलाओं को संविधान के तहत मिलने वाले उनके बुनियादी अधिकारों से दूर रखते हैं, तो ऐसे में UCC पर विचार जरूरी हो जाता है.

SC On UCC/ Representational Image
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए एक अहम टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि देश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का समय आ गया है. हालांकि कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया कि इस पर फैसला करना संसद का काम है. आपको बता दें कि महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मामले में कहा कि अगर पर्सनल लॉ महिलाओं को संविधान के तहत मिलने वाले उनके बुनियादी अधिकारों से दूर रखते हैं, तो ऐसे में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) पर विचार करना जरूरी हो जाता है. अदालत ने कहा कि सभी धर्मों की महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए एक समान कानून की जरूरत महसूस की जा सकती है.

शरियत कानून पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई!

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट महिलाओं के एक समूह द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था. इस याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एक्ट, 1937 में बदलाव की मांग की गई है, ताकि मुस्लिम महिलाओं को विरासत और उत्तराधिकार में बराबर अधिकार मिल सकें. याचिका में कहा गया है कि फिलहाल मुस्लिम महिलाओं को अपने माता-पिता की संपत्ति में बहुत कम हिस्सा मिलता है, जिसे बदलने की जरूरत है.

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सुप्रीम कोर्ट ने शरियत एक्ट को रद्द करने पर क्या कहा?

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मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने इस दौरान कई अहम बातें रखीं. कोर्ट ने कहा कि अगर 1937 का यह कानून पूरी तरह हटा दिया जाता है, तो इससे एक कानूनी खालीपन यानी वैक्यूम पैदा हो सकता है. ऐसी स्थिति में महिलाओं को वह अधिकार भी नहीं मिल पाएंगे, जो उन्हें अभी इस कानून के तहत मिल रहे हैं.

कानून बनाना संसद का काम!

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सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाला बागची ने भी अपनी राय रखी. उन्होंने कहा कि अगर अदालत इस क्षेत्र में सीधे दखल देती है, तो इसका असर अन्य व्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है. उदाहरण के तौर पर, हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली (एचयूएफ) में उत्तराधिकार से जुड़े नियमों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है. जस्टिस बागची ने कहा कि इसलिए बेहतर होगा कि इस तरह के व्यापक कानून से जुड़े फैसले सरकार पर ही छोड़ दिए जाएं, क्योंकि अदालत खुद कानून नहीं बना सकती.

हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने फिर चिंता जताई कि अदालत के हस्तक्षेप से कहीं मुस्लिम महिलाओं को किसी भी कानून का संरक्षण ही न मिल पाए. उन्होंने कहा, “सुधार की हमारी अधिक चिंता में ऐसा न हो कि हम उन्हें उस अधिकार से भी वंचित कर दें जो अभी उन्हें मिल रहा है. अगर शरियत एक्ट 1937 ही खत्म हो जाता है, तो फिर क्या होगा? क्या इससे अनावश्यक कानूनी खालीपन नहीं पैदा होगा?”

जवाब यूनिफॉर्म सिविल कोड है: CJI सूर्यकांत

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जस्टिस बागची ने मुख्य न्यायाधीश की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि क्या यह बेहतर नहीं होगा कि इस मुद्दे को विधायिका के विवेक पर छोड़ा जाए, जिसे राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के अनुसार यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाने का अधिकार है. इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “इसका जवाब यूनिफॉर्म सिविल कोड है.”

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रशांत भूषण से पूछा कि क्या अदालत किसी पर्सनल लॉ की प्रथा की संवैधानिकता पर फैसला दे सकती है. जस्टिस बागची ने बॉम्बे हाई कोर्ट के ‘नारासु अप्पा माली’ फैसले का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि पर्सनल लॉ को संविधान की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता.

पीठ ने यह भी पूछा कि अगर अदालत शरियत के उत्तराधिकार कानून को रद्द कर देती है, तो क्या इससे कानूनी खालीपन (लीगल वैक्यूम) नहीं पैदा होगा, क्योंकि मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई वैधानिक कानून नहीं है. इस पर भूषण ने कहा कि ऐसी स्थिति में इंडियन सक्सेशन एक्ट के प्रावधान लागू हो जाएंगे. उन्होंने यह भी कहा कि अदालत यह घोषणा कर सकती है कि मुस्लिम महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर उत्तराधिकार का अधिकार है. अदालत के इस सवाल पर कि क्या वह पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप कर सकती है, भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के 2017 के शायरा बानो फैसले का हवाला दिया, जिसमें ‘ट्रिपल तलाक’ को असंवैधानिक घोषित किया गया था. उन्होंने कहा, “शायरा बानो के फैसले के बाद देश में यह स्थिति नहीं हो सकती कि मुस्लिम महिलाओं को मुस्लिम पुरुषों के बराबर अधिकार न मिलें.”

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'कोर्ट पहले ही UCC का सिफारिश कर चुकी है'

सीजेआई की टिप्पणी के बाद जस्टिस बागची ने कहा कि ‘एक पुरुष के लिए एक पत्नी’ का नियम भी सभी समुदायों पर समान रूप से लागू नहीं है. “लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि अदालत सभी बहुविवाह को असंवैधानिक घोषित कर दे? इसलिए हमें नीति-निर्देशक सिद्धांतों को लागू करने के लिए विधायिका की शक्ति पर भरोसा करना होगा,” उन्होंने कहा. जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि “बेहतर होगा कि इसे विधायिका के विवेक पर छोड़ा जाए. यह अदालत पहले ही विधायिका से यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की सिफारिश कर चुकी है.”

पीठ ने यह भी कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप तब अधिक उपयुक्त होगा जब स्वयं मुस्लिम महिलाएं शरियत एक्ट 1937 से बाहर निकलने के लिए याचिका दायर करें. इस पर भूषण ने बताया कि याचिकाकर्ताओं में कुछ मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं. इसके बाद पीठ ने भूषण को सुझाव दिया कि वे याचिका में संशोधन कर यह भी बताएं कि यदि शरियत के उत्तराधिकार प्रावधान रद्द किए जाते हैं तो उसके बाद क्या वैकल्पिक उपाय होंगे. भूषण के याचिका संशोधित करने पर सहमत होने के बाद अदालत ने मामले की सुनवाई स्थगित कर दी.

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किस मुद्दे पर हो रही थी सुनवाई?

यह जनहित याचिका पोलोमी पाविनी शुक्ला और आयशा जावेद ने दाखिल की है. सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं को याचिका में जरूरी बदलाव करने और इसे दोबारा दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है.

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साथ ही अदालत ने यह सुझाव भी दिया कि याचिका में इस बात पर ध्यान दिया जाए कि पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने के लिए क्या व्यावहारिक तरीका अपनाया जा सकता है. कोर्ट ने यह भी कहा कि कोशिश यह होनी चाहिए कि 1937 के शरीयत एक्ट में सीधे हस्तक्षेप किए बिना मुस्लिम महिलाओं को बराबर अधिकार कैसे दिलाए जा सकते हैं.

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