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आखिर किस बात से बिफर गया इलाहाबाद हाईकोर्ट? सुप्रीम कोर्ट को दखल न देने की दी नसीहत! जानें पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के बीच टकराव सामने आया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिकारों को लेकर शीर्ष अदालत पर नाराजगी जाहिर की है.

आखिर किस बात से बिफर गया इलाहाबाद हाईकोर्ट? सुप्रीम कोर्ट को दखल न देने की दी नसीहत! जानें पूरा मामला
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इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की आपस में ठन गई है. बात यहां तक पहुंच गई कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शीर्ष अदालत को दखल न देने की नसीहत तक दे डाली. HC ने सुप्रीम कोर्ट से साफ कहा कि, उसे ‘हैंड्स ऑफ अप्रोच’ यानी ‘हस्तक्षेप न करने’ की पॉलिसी पर चलना चाहिए. 

दरअसल, ये मामला राज्य न्यायिक अधिकारियों की सेवा नियमों से जुड़ा है. इस पर करीब दो दशक से रार चल रही है. इस हाईकोर्ट ने अपने अपने अधिकारों से वंचित रहने की बात कही है. हाईकोर्ट की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि, जिला न्यायपालिका पर अनुच्छेद 227 (1) के तहत निगरानी का अधिकार हाईकोर्ट के पास है. इसलिए सेवा नियमों का ढांचा तैयार करने का काम भी हाईकोर्ट को ही करना चाहिए.

क्या जिला अदालतों को कमजोर किया जा रहा है? 

राकेश द्विवेदी ने पूछा, हाईकोर्ट को उसके संवैधानिक अधिकारों और कर्तव्यों से वंचित क्यों किया जा रहा है? उन्होंने कहा, अब समय आ गया है कि हाईकोर्ट को कमजोर करने की जगह मजबूत किया जाए. ‘बात बहुत आगे बढ़ चुकी है. सुप्रीम कोर्ट को जिला न्यायाधीशों की भर्ती, सेवानिवृत्ति उम्र या प्रमोशन कोटा जैसे मामलों में दखल नहीं देना चाहिए.’ हाईकोर्ट के इस रुख के बाद देश की अदालतें ही आपस में टकरा रही हैं और ये टकराहट भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बीच में है. 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? 

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इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की अवधारणा याद दिलाई. CJI बी आर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, के विनोद चंद्रन और जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि, ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस की अवधारणा अभी विचाराधीन है. अगर यह सफल होती है तो जिला कोर्ट के लिए एक समान सेवा नियम बनाने में सुप्रीम कोर्ट की कुछ भूमिका हो सकती है. 

इस दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि, मौजूदा प्रक्रिया का मकसद हाईकोर्ट की शक्तियों को कम करना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि जिला जजों के प्रमोशन के लिए कुछ सामान्य दिशा निर्देश बनाए जा सकते हैं या नहीं. जिससे सिस्टम में एकरूपता लाई जा सके. जस्टिस कांत ने कहा, इसका मतलब हाईकोर्ट की शक्तियों का अतिक्रमण बिल्कुल नहीं है. 

हाईकोर्ट में प्रमोशन और भर्ती का क्या है सिस्टम? 

मौजूदा समय में जिला कोर्ट में न्यायाधीश के पद पर प्रमोशन तीन तरीकों से होता है.

  • वरिष्ठता आधारित प्रमोशन 
  • डायरेक्ट भर्ती परीक्षा 
  • सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा 

इलाहाबाद हाईकोर्ट का प्रतिनिधित्व कर रहे राकेश द्विवेदी का कहना है कि, साल 2017 में, सुप्रीम कोर्ट ने सैद्धांतिक रूप से एक अवधारणा पत्र को अंतिम रूप दिया था. जिसमें कहा गया था कि, सुप्रीम कोर्ट को वकीलों में से सीधे नियुक्त जिला न्यायाधीशों के लिए भर्ती परीक्षा करनी चाहिए. 

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राकेश द्विवेदी ने बताया कि, इसका विरोध किया गया था जिसके बाद इसे रोक दिया गया. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट सेवानिवृत्ति की उम्र, कैरियर न्यायिक अधिकारियों के लिए कोटा और पात्रता तय नहीं कर सकता है. उन्होंने कहा, सुप्रीम कोर्ट को उन्हीं मामलों में दखल करना चाहिए. जहां किसी हाईकोर्ट के अधीन न्यायिक व्यवस्था चरमरा जाए. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि, हर राज्य के अनुसार जिला सेवा नियम अलग-अलग होते हैं. ऐसे में इन्हें तय करने का अधिकार राज्यों से संबंधित अदालतों को ही होना चाहिए. 

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