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सऊदी अरब और क़तर में ही क्यों होती जंग रोकने पर बात, क्या है वजह ?

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अच्छे संबंध हैं जिसके चलते ये बातचीत में अहम रोल निभा सकते हैं कतर भी कूटनीतिक तौर पूरी दुनिया के लिए ख़ास महत्व रखता है

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हाल ही में रूस-यूक्रेन जंग को लेकर अमेरिका की कोशिश रही है कि वह इस जंग को जितनी जल्दी हो सके ख़त्म करा सके। इसके लिए अमेरिका की तरफ़ से पहले रूस के साथ बातचीत का दौर शुरू हुआ, और एक बार फिर रूस, यूक्रेन और अमेरिका के अधिकारियों ने मुलाक़ात की। लेकिन ये मुलाक़ात अरब देश सऊदी अरब में क्यों हुई, इसके पीछे क्या वजह है? यूरोपीय देशों को छोड़कर ये देश सऊदी में क्यों मिल रहे हैं? आखिर सऊदी अरब का इस जंग और समझौते में क्या रोल है और क्या रूस और यूक्रेन के समझौते के लिए इस बातचीत से पहले भी यहां कोई समझौते हो चुके हैं?

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अच्छे संबंध हैं, जिसके चलते ये बातचीत में अहम रोल निभा सकते हैं। सऊदी ने कहा भी है कि वह रूस और यूक्रेन जंग में मध्यस्था के तौर पर सक्रिय भूमिका निभाएगा। सऊदी अरब के पास छोटा देश कतर है, कतर भी कूटनीतिक तौर पर पूरी दुनिया के लिए ख़ास महत्व रखता है और तालिबान-अमेरिका से लेकर हमास-इजरायल के बीच समझौतों में अहम भूमिका निभाता रहा है। सऊदी अरब भी इस काम में पीछे नहीं है, सऊदी अरब ने लेबनान से लेकर यमन तक कई अहम समझौते कराए हैं।

सऊदी अरब ने साल 1989 में लेबनान का शांति समझौता कराया था, 2015 में यमन का शांति समझौता सऊदी ने कराया और 2017 में ही ईरान और अमेरिका में शांति समझौता में सऊदी ने अहम भूमिका निभाई है।

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कतर की बात करें, तो सऊदी अरब से भी वह आगे है। 2010 में कतर ने सूडान सरकार और दारफूर में हथियारबंद गुटों के बीच शांति समझौता कराया था। कतर ने ही साल 2020 में तालिबान और अमेरिका के बीच समझौता कराकर 20 साल की जंग को ख़त्म करवाया।

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2022 में चाड सरकार और विद्रोहियों के बीच कतर ने समझौता कराया। वहीं कतर 2023 से हमास और इजराइल के बीच समझौता करने में लगा है।

सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान वैसे भी अपने देश को तेल आधारित और कट्टर इस्लामिक वाली छवि से निकालकर ऐसे राष्ट्र में बदलने में लगे हैं जो दुनिया भर में एक सॉफ़्ट पावर बनकर उभरे और कहीं ना कहीं वह इस मिशन में कामयाब होते भी दिख रहे हैं। अमेरिका और रूस के नेताओं का यहां आना सऊदी में हो रहे बड़े बदलाव और मजबूत होते विश्वास को दिखाता है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का विजन 2030 एक बड़ा प्रोजेक्ट है और उन्होंने इसके लिए अरबों डॉलर का निवेश किया है। वहीं क़तर को ज़्यादा मध्यस्था के लिए चुना जाता है, इसके पीछे की वजह यह है कि वह उन संगठनों से भी संबंध रखता है, जिनके साथ सऊदी अरब और अरब दुनिया के दूसरे देश बात नहीं करना चाहते। जानकार बताते हैं कि सऊदी अरब, मुस्लिम ब्रदरहुड और हमास जैसे इस्लामी समूहों के ख़िलाफ़ है, लेकिन कतर उनके लिए वैसा दुश्मनी का भाव नहीं रखता। तालिबान के साथ अपने संबंधों की वजह से कतर तालिबान और अमेरिका के बीच पुल बना हुआ है। कतर ने हमास और इस्राइल, दोनों के साथ अपने संबंध रखे हैं और इसी वजह से उसे सऊदी से ज़्यादा चुना जाता है।

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