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चीन को छठे दलाई लामा का नाम लेकर भारत ने खूब चिढ़ाया, अरुणाचल में ये क्या हुआ

चीन ने एक बार फिर अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा किया है…दरअसल भारत ने अरुणाचल प्रदेश में एक अनाम चोटी का नाम छठे दलाई लामा के नाम पर रखकर चीन को सुलगा दिया और इसपर चीन ने आपत्ति जताई है।

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चीन कभी अपनी हरकतों से बाज नहीं आता। भारत की ज़मीन पर आंख उठाने की हिम्मत करता ही रहता है। LAC पर सैनिकों को पीछे हटाने की बजाय भारत की ज़मीन पर कब्जा करने की मंशा से चीन चालबाज़ी से बाज नहीं आ रहा। LAC पर भारत और चीन के बीच आपसी सहमति बन जाने के बाद भी चीन ने एक बार फिर अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा किया है। दरअसल, भारत ने अरुणाचल प्रदेश में एक अनाम चोटी का नाम छठे दलाई लामा के नाम पर रखकर चीन को सुलगा दिया। इससे मिर्ची लगने के बाद चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने इस पर नाराज़गी जताई और एक बार फिर इसे चीनी क्षेत्र बता दिया।

खैर, चीन तो कुछ भी बोलता है, उसे ये भी पता है कि भारत की सेना उसका क्या हाल करेगी अगर उसने ज़्यादा किया। लेकिन यहाँ जानना यह ज़रूरी हो जाता है कि ये छठे दलाई लामा कौन थे जिनका नाम सुनते ही ड्रैगन आग बबूला हो गया। आपको बताते हैं, लेकिन उससे पहले ये जानिए कि चीन को ये तगड़ी मिर्ची तब लगी जब नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग एंड एडवेंचर स्पोर्ट्स की एक टीम ने अरुणाचल प्रदेश में 20,942 फीट ऊंची एक चोटी की चढ़ाई की, जिसकी चढ़ाई आज तक नहीं की गई थी। इस चोटी पर जहां एक तरफ एक बार भी चढ़ाई नहीं की गई थी, वहीं दूसरी तरफ इस चोटी का आज तक कोई नाम भी नहीं रखा गया था। इसी के चलते चढ़ाई के बाद एनआईएमएएस ने चोटी का नाम छठे दलाई लामा त्सांगयांग ग्यात्सो के नाम पर रखने का फैसला किया।

छठे दलाई लामा त्सांगयांग ग्यात्सो का जन्म 1682 में अरुणाचल प्रदेश के मोन तवांग में हुआ था। उन्हें 1697 में 14 साल की उम्र में छठे दलाई लामा के रूप में सिंहासन पर बैठाया गया था। त्सांगयांग ग्यात्सो को कई सालों की देरी के बाद छठे दलाई लामा के रूप में मान्यता प्राप्त हुई, जिससे पोटाला पैलेस का निर्माण पूरा हो सका।

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वो एक अपरंपरागत दलाई लामा थे, जिन्होंने एक नियुक्त भिक्षु की तुलना में निंग्मा स्कूल के योगी का जीवन पसंद किया। त्सांगयांग ग्यात्सो ने हमेशा एक भिक्षु के रूप में जीवन को अस्वीकार कर दिया था। हालांकि, इसका मतलब दलाई लामा के अपने पद का त्याग नहीं था। सामान्य व्यक्ति के कपड़े पहनना और घोड़े की सवारी करने या राज्य की पालकी का उपयोग करने की बजाय पैदल चलना पसंद करना... त्सांगयांग ने केवल दलाई लामा के लौकिक विशेषाधिकारों को बनाए रखा। उन्होंने पार्कों का दौरा भी किया और ल्हासा की गलियों में रातें बिताईं, शराब पी, गाने गाए और लड़कियों के साथ संबंध बनाए। ऐसा कहा जाता है कि दलाई लामा के ऐसे व्यवहार का बहाना बनाकर मंगोल जनरल ने तिब्बत के रीजेंट को मार डाला और छठे दलाई लामा का 1706 में जब वह चीन गए हुए थे, अपहरण कर लिया था। यह भी कहा जाता है कि चीन ने उन्हें एक बड़ा खतरा मानकर मरवा डाला था।

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चीन अरुणाचल प्रदेश को जांगनान कहता है। इसके अलावा, चीन लगातार साल 2017 से अरुणाचल प्रदेश में स्थानों के नाम बदल रहा है। भारत ने अरुणाचल प्रदेश पर चीन के दावों को खारिज कर दिया है और कहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है और चीन के नाम देने से इस वास्तविकता में कोई बदलाव नहीं आएगा। लेकिन अरुणाचल प्रदेश में चोटी का नाम छठे दलाई लामा के नाम पर रखे जाने के बाद, पड़ोसी देश चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा,

“आप किस बारे में बात कर रहे हैं, मुझे इसकी जानकारी नहीं है। मुझे कहना चाहिए कि ज़ंगनान का क्षेत्र चीनी क्षेत्र है और भारत के लिए चीनी क्षेत्र में 'अरुणाचल प्रदेश' स्थापित करना अवैध और अमान्य है।”

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बता दें कि मार्च 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरुणाचल प्रदेश का दौरा किया था। उनके इस दौरे के बाद चीन चिढ़ गया था और कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। हालांकि, बाद में भारत सरकार ने चीन की टिप्पणियों को सिरे से खारिज कर दिया था। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने कहा था-

“हम प्रधानमंत्री की अरुणाचल प्रदेश यात्रा के संबंध में चीनी पक्ष द्वारा की गई टिप्पणियों को खारिज करते हैं। भारतीय नेता अन्य राज्यों का दौरा करने के साथ-साथ समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश का दौरा करते रहते हैं।”

पीएम मोदी ने अपनी यात्रा के दौरान कई विकास परियोजनाओं के साथ सेला सुरंग का उद्घाटन भी किया था।

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