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आखिर क्यों दर्शन के बाद मंदिर की सीढ़ी पर बैठना चाहिए? प्राचीन परंपरा का महत्व जानकर हैरान रह जाएंगे आप
मंदिर की सीढ़ियों पर बैठना सिर्फ थकान मिटाने का तरीका नहीं, बल्कि इसके पीछे एक प्राचीन परंपरा छिपी है. कहा जाता है, जो भक्त दर्शन के बाद एक खास श्लोक का पाठ करता है, उसके जीवन की दिशा ही बदल जाती है. ऐसे में आप भी जानिए, आखिर कौन सा है ये श्लोक? जो मन को शांति और आत्मा को मोक्ष देता है?
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मंदिर की पैड़ी या सीढ़ी पर बैठना सिर्फ आराम करने का जरिया नहीं, बल्कि इसके पीछे एक खास परंपरा और उद्देश्य छिपा है. आजकल लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर, व्यापार या राजनीति की बातें करने लगते हैं, लेकिन प्राचीन समय में यह पैड़ी शांति और ध्यान का स्थान थी. मान्यता है कि जब भी हम किसी मंदिर में दर्शन करते हैं, तो बाहर आकर थोड़ी देर पैड़ी पर बैठकर भगवान का ध्यान करना चाहिए. लेकिन ध्यान करते समय एक खास श्लोक का जाप भी करना चाहिए.
आखिर कौनसा है ये श्लोक?
मंदिर की सीढ़ी पर बैठते ही एक विशेष श्लोक 'अनायासेन मरणम्, बिना दैन्येन जीवनम्. देहान्त तव सान्निध्यम्, देहि मे परमेश्वरम्.' का पाठ करना चाहिए. इसका अर्थ है कि हमारी मृत्यु बिना किसी तकलीफ के हो, हम बीमार होकर या परेशान होकर न मरें. साथ ही जीवन ऐसा हो कि हमें किसी पर आश्रित न रहना पड़े, अपने बलपूर्वक जीवन व्यतीत करें. जब भी मृत्यु हो, भगवान के सामने हमारे प्राण जाएं और भगवान का आशीर्वाद प्राप्त हो.
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इस श्लोक का पाठ करने से क्या लाभ हो सकते हैं?
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इस श्लोक में यह संदेश है कि हमें सांसारिक वस्तुओं के लिए याचना नहीं करनी चाहिए. घर, धन, नौकरी, पुत्र-पुत्री जैसी चीजें भगवान अपनी कृपा से देते हैं. प्रार्थना का मतलब निवेदन और विशेष अनुरोध है, जबकि याचना सांसारिक इच्छाओं के लिए होती है.
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भगवान के दर्शन करते समय किन बातों का रखें ध्यान?
दर्शन करते समय आंखें खुली रखनी चाहिए और भगवान के स्वरूप, चरण, मुखारविंद और श्रृंगार का पूरा आनंद लेना चाहिए. आंखें बंद करना गलत है, क्योंकि हम दर्शन करने आए हैं. लेकिन बाहर आने के बाद, पैड़ी पर बैठकर आंखें बंद करके भगवान का ध्यान करना चाहिए और ऊपर बताए गए श्लोक का पाठ करना चाहिए.
मंदिर की सीढ़ियों पर ध्यान करना क्यों है जरूरी?
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यदि ध्यान करते समय भगवान का स्वरूप ध्यान में नहीं आता, तो फिर से मंदिर जाकर दर्शन करें और फिर पैड़ी पर बैठकर ध्यान और श्लोक का पाठ करें. यह प्रथा हमारे शास्त्रों और बुजुर्गों की परंपरा में बताई गई है. इसका उद्देश्य हमारे जीवन में स्वास्थ्य, लंबी उम्र और मानसिक शांति सुनिश्चित करना है. मंदिर में नेत्र खुले और बाहर बैठकर नेत्र बंद करके ध्यान करना हमारी श्रद्धा, ध्यान और भक्ति का प्रतीक है.