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मां काली को इस मंदिर में क्यों लगता है नूडल्स और मोमोज का भोग !

वैसे तो आपने कई बार सुना होगा कि नवरात्र के दौरान माँ दुर्गा के 9 रुपों को भोग के रुप में फल, खीर और अपने हाथ से बनाया हुआ शुद्ध भोजन चढ़ाया जाता है लेकिन क्या आपको ये पता है कि कोलकाता के प्राचीन मंदिर में माता काली को कई तरह का चाइनीज़ फ़ूड चढ़ाया जाता है, मान्यता है कि इस मंदिर में धूप और पूजा करने से नाकारात्मक शक्तियाँ दूर रहती है इसलिए यहाँ माँ काली के दर्श करने लोग दूर दूर से आते है पूरी जानकारी जानने के लिए देखें इस पर हमारी ख़ास रिपोर्ट !

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शास्त्रों के अनुसार हिन्दू धर्म में नवरात्रों का बहुत महत्व होता है। हमारे अंदर तीन प्रकार की चेतना होती है – तमोगुण, रजोगुण और सतोगुण। इन्हीं तीनों गुणों की चेतना के इस उत्सव को नवरात्रि कहा जाता है। इन दिनों माँ दुर्गा के तीनों रूपों की पूजा की जाती है। भारत में जगह-जगह झांकियाँ निकाली जाती हैं, भण्डारे किए जाते हैं, हर घर में माँ दुर्गा का निवास होता है, हम सभी माँ दुर्गा को अपने हाथ का बना शुद्ध भोजन खिलाते हैं, फल चढ़ाते हैं और पूजा पाठ करते हैं। लेकिन क्या आपको पता है भारत में एक ऐसा मंदिर है, जहां माँ काली को चैत्र नवरात्रि के दौरान नूडल्स और मोमो का भोग लगाया जाता है, वहीं भक्तों को भी प्रसाद के तौर पर चाइनीज़ फ़ूड दिया जाता है? आखिर ऐसा क्यों होता है? 

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हर साल नवरात्रि साल में दो बार मनाई जाती है – एक चैत्र नवरात्रि और दूसरी शारदीय नवरात्रि, जिसमें 9 दिनों तक माँ दुर्गा के 9 अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। इससे जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ भी प्रचलित हैं। चलिए आपको बताते हैं, एक बार एक महिषासुर नाम का एक भयानक और शक्तिशाली राक्षस था। इस असुर को भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु किसी देवता, असुर और न ही किसी मनुष्य के हाथों हो सकती है। धीरे-धीरे महिषासुर का आतंक बढ़ता गया, अब उसके आतंक को देख देवता भी परेशान हो उठे और देवताओं ने परेशान होकर आदि शक्ति माँ दुर्गा की आराधना की, जिसके बाद माँ दुर्गा का अवतार हुआ। फिर माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच का युद्ध पूरे 9 दिनों तक चला और इसी दौरान माँ दुर्गा ने महिषासुर राक्षस का वध किया। इसलिए इसे बुराई पर अच्छाई का प्रतीक भी माना जाता है, और तभी से नवरात्रि मनाए जाते हैं। नवरात्रि में आदि शक्ति माँ दुर्गा के 9 रूपों की पूजा की जाती है: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यानी, कालरात्रि, महागौरी, और सिद्धियात्री। माता का 9 दिनों तक घर में वास रहता है।

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लेकिन पश्चिम बंगाल के कोलकाता के टेंगरा इलाक़े में एक ऐसा मंदिर है, जहां माँ काली को भोग के रूप में चाइनीज़ फ़ूड खिलाया जाता है, और भक्तों को भी प्रसाद के रूप में चाइनीज़ फ़ूड बांटा जाता है। इस वजह से इस इलाक़े को चाइनीज़ टाउन भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चीन गृहयुद्ध के दौरान यहाँ कई चीनी लोग शरणार्थी बनकर रहने लगे, जिसके बाद उन्होंने माँ काली को चाइनीज़ फ़ूड चढ़ाना शुरू कर दिया और तभी से यह परंपरा चली आ रही है। आपको बताते चलें कि यह अलग परंपरा अब माँ काली के इस मंदिर का अटूट हिस्सा बन चुकी है। यहाँ आने वाले ज़्यादातर भक्त या तो ईसाई धर्म के होते हैं या फिर चाइनीज़ समुदाय के होते हैं।

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इस मंदिर में शनिवार के दिन पूजा करने का भी विशेष महत्व है। यहाँ माँ काली के सम्मान में कई बार धार्मिक कार्यक्रम भी करवाए जाते हैं। मान्यता है कि इस मंदिर में धूप और काग़ज़ जलाने से बुरी आत्माओं से निजात मिलती है, माता काली की कृपा बनी रहती है और जीवन में सुख-शांति आती है।

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