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कहां है ये मंदिर? मां काली को प्रसन्न करने के लिए भक्त खेलते हैं खून की होली, देते हैं गालियां

इस मंदिर में मां भगवती के काली रूप की आराधना अनोखे तरीके से की जाती है, जो शायद ही देश के किसी और मंदिर में होती होगी. मंदिर में वार्षिक उत्सव मनाया जाता है जिसे मलयालम महीने यानी मार्च और अप्रैल में भरणी नक्षत्र शुरू होने पर सेलिब्रेट किया जाता है.

कहां है ये मंदिर? मां काली को प्रसन्न करने के लिए भक्त खेलते हैं खून की होली, देते हैं गालियां
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देशभर में देवी मां के सभी रूपों को अलग-अलग तरीकों से पूजा जाता है. हर मंदिर की अपनी पूजा विधि और मान्यता होती है. केरल के कोडुंगल्लूर में मां भगवती का ऐसा मंदिर है, जहां मां के काली स्वरूप को खुश करने के लिए खून की होली खेली जाती है और इस परंपरा का हिस्सा बनने के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं. 

मां काली को समर्पित कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर

केरल में कोडुंगल्लूर बस स्टैंड से 1.5 किलोमीटर दूर एर्नाकुलम जिले में मां काली को समर्पित कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर है, जिसे कुरम्बा भगवती मंदिर भी कहा जाता है. इस मंदिर की स्थापना खुद आदि शंकराचार्य ने की थी और पांच चक्रों की शक्तियों को सिद्धि के साथ इस मंदिर में स्थापित किया था.

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मंदिर की किस प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया है

इस मंदिर में मां भगवती के काली रूप की आराधना अनोखे तरीके से की जाती है, जो शायद ही देश के किसी और मंदिर में होती होगी. मंदिर में वार्षिक उत्सव मनाया जाता है जिसे मलयालम महीने यानी मार्च और अप्रैल में भरणी नक्षत्र शुरू होने पर सेलिब्रेट किया जाता है. इस अनुष्ठान में पहले पशुओं की बलि दी जाती थी, लेकिन अब इस प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया है. 

मां काली को अपना ख़ून अर्पित करते हैं भक्त

7 दिन तक चलने वाले इस उत्सव में भक्त तलवार और भालों से खुद को नुकसान पहुंचाते हैं और अपना खून मां काली को अर्पित करते हैं. इतना ही नहीं, वे मां के चरणों में प्रसाद या कोई अन्य वस्तु भेंट नहीं करते, बल्कि प्रतिमा पर प्रसाद को फेंकते हैं और मां को अपशब्द और शाप देते हैं.

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मंदिर का पूरा परिसर रक्त से लाल हो जाता है

भक्तों का मानना ​​है कि ये अनुष्ठान देवी के निर्देशानुसार किए जाते हैं और ऐसा करने से मां प्रसन्न होकर हर मनोकामना को पूरा करती हैं. उत्सव के वक्त मंदिर का पूरा परिसर रक्त से लाल हो जाता है और भगवान के स्वयं आने की प्रतीक्षा की जाती है. भक्तों का मानना है कि भगवान खुद मंदिर और भक्त दोनों को आशीर्वाद देते हैं और इसलिए उत्सव के समय कोई भी पुजारी या बड़ा शख्स किसी को आशीर्वाद नहीं देता. 

यहां तांत्रिक अपनी तंत्र क्रियाओं को सिद्ध करने आते हैं

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मंदिर में ये अजीबोगरीब अनुष्ठान सालों से चला आ रहा है और आज भी कायम है. कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर को तंत्र-मंत्र की दृष्टि से भी देखा जाता है. वहां तांत्रिक अपनी तंत्र क्रियाओं को सिद्ध करने आते हैं.

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