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लहसुन प्याज का राहु-केतु से क्या है कनेक्शन? शास्त्रों में इन्हें क्यों माना गया है वर्जित
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान राहु और केतु ने छल से अमृत पी लिया था. तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से दोनों का सिर धड़ से अलग कर दिया था तब.
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अक्सर जब भी हम खाना बनाते हैं तो लहसुन प्याज का उपयोग जरूर करते हैं, ये न सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाते हैं बल्कि हमारे शरीर के लिए अच्छे होते हैं, लेकिन अब ऐसे में ये सवाल उठता है कि जब भी व्रत का खाना बनता है तो इनका उपयोग करने पर मनाही क्यों लग जाती है? अक्सर क्यों कहा जाता है कि ये दोनों तामसिक भोजन में आते हैं? आखिर क्यों इन्हें राहु और केतु से जोड़कर देखा जाता है? आइए जानते हैं.
प्याज और लहसुन की उत्पत्ति कैसे हुई?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान राहु और केतु ने छल से अमृत पी लिया था. तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से दोनों का सिर धड़ से अलग कर दिया था. मान्यता है कि तब राहु के रक्त से प्याज और केतु के रक्त से लहसुन की उत्पत्ति हुई थी. इसलिए इन्हें राहु और केतु से जोड़कर देखा जाता है.
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ज्योतिषीय दृष्टि से राहु का विश्लेषण
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार राहु और केतु को छाया ग्रह माना जाता है जो कि चंद्रमा की छाया से बनने वाले दो बिंदु होते हैं. इसलिए अक्सर जिस भी मनुष्य की कुंडली में राहु और केतु भारी होते हैं तो मनुष्य के मन में भ्रम जैसी स्थिति पैदा होने लगती है. व्यक्ति को सही-गलत की पहचान नहीं हो पाती. नशे जैसी चीजें भी उसे आम लगने लगती हैं. इसलिए अक्सर लोग प्याज और लहसुन को खाने के लिए मना करते हैं.
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पुराणों में उल्लेख
भगवद्गीता में भोजन को तीन हिस्सों में बांटा गया है – राजसिक, तामसिक और सात्त्विक. इसके जरिए मनुष्य को पता चलता है कि आखिर कौन-सा भोजन शरीर के लिए अच्छा है. अब इसे इस श्लोक के जरिए समझें कि…
कात्वम्ललवणात्युष्ण तीक्ष्णरूक्षविदाहिनः.
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥
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ज्यादा तीखा, ज्यादा खट्टा और पेट में जलन पैदा करने वाला तथा शरीर में बीमारियां पैदा करने वाला भोजन भी राजसिक और तामसिक में ही आता है, इसलिए प्याज और लहसुन दोनों इसी श्रेणी में आते हैं. इसलिए शास्त्रों में भी ऐसा भोजन करने से मनाही है.