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दो रहस्यमयी शक्तिपीठ: जहां देवी सती की शक्ति आज भी करती है अद्भुत चमत्कार, जानकर हैरान रह जायेंगे आप

नवरात्र का त्योहार हिंदू धर्म में बहुत मायने रखता है. इस दौरान भक्त अलग-अलग मंदिरों में जाते हैं शक्तिपीठों के दर्शन करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां सती के 51 शक्तिपीठों में से दो ऐसे शक्तिपीठ हैं जहां आज भी मां की शक्ति दिव्य चमत्कार दिखाती है. आज भी यहां के रहस्य लोगों के लिए एक अनसुलझी पहेली बने हुए हैं.

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नवरात्र का पर्व देवी दुर्गा की उपासना और शक्ति की आराधना का प्रतीक है. इस अवसर पर देश भर के देवी मंदिरों में लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं. लेकिन दो ऐसे मंदिर हैं जहां आज भी चमत्कार होते हैं. ये दोनों मंदिर माता सती के 51 शक्तिपीठों में गिने जाते हैं और अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक महत्ता के कारण दूर-दूर से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं. इसलिए नवरात्र के दिनों में यहां सैकड़ों की संख्या में दर्शन करने आते हैं. चलिए आपको भी बताते हैं इन दो शक्तिपीठों के बारे में…

 

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ऐसा शक्तिपीठ जहां आज भी मां को आता है मासिक धर्म

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असम की राजधानी गुवाहाटी के नीलाचल पर्वत पर स्थित कामाख्या देवी मंदिर भी शक्तिपीठों में प्रमुख है. मान्यता है कि यहां माता सती की योनि गिरी थी. इसलिए अंबुबाची पर्व के दौरान जून के महीने में मां को मासिक धर्म आता है और मंदिर के कपाट तीन दिनों तक बंद कर दिए जाते हैं. ब्रह्मपुत्र नदी का जल भी लाल हो जाता है. मंदिर के गर्भगृह का कपड़ा भी लाल हो जाता है.

मंदिर का निर्माण किसने कराया?

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यह मंदिर कामदेव द्वारा विश्वकर्मा की सहायता से निर्मित बताया जाता है. प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि यह मंदिर कभी बहुत भव्य और विशाल था, जिसकी सुंदरता की तुलना नहीं की जा सकती थी. हालांकि, इसका इतिहास कई किंवदंतियों और रहस्यों से भरा हुआ है. माना जाता है कि इसका निर्माण आर्य सभ्यता से भी पूर्व हुआ था.

तांत्रिकों का प्रमुख गढ़ कामाख्या मंदिर

कामाख्या मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं है. गर्भगृह में एक प्राकृतिक योनिकुंड है, जिसे निरंतर जलधारा से सिंचित किया जाता है. श्रद्धालु इसी को शक्ति स्वरूपा कामाख्या देवी मानकर पूजते हैं. यह मंदिर तांत्रिक साधनाओं का भी प्रमुख केंद्र है और इसे तंत्र विद्याओं की जननी कहा जाता है.

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त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ में आज भी होती है हर मनोकामना की पूर्ति 

त्रिपुरा राज्य के उदयपुर नगर में स्थित त्रिपुर सुंदरी मंदिर, जिसे माताबाड़ी के नाम से भी जाना जाता है, पूर्वोत्तर भारत के सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है. इसे त्रिपुरा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर का प्रतीक भी कहा जाता है. मान्यता है कि भगवान शिव के तांडव नृत्य के समय जब सती माता का शरीर खंडित हो रहा था, तब उनका दाहिना पैर यहीं आकर गिरा था. तभी से यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजित है और यहां माता को त्रिपुर सुंदरी के रूप में श्रद्धा दी जाती है.

मंदिर का कछुए के कूबड़ के आकार किस बात का प्रतीक?

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इस मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि इसका आधार कछुए के कूबड़ के आकार का है, इस कारण इसे कूर्म पीठ भी कहा जाता है. हिंदू परंपरा में कछुआ स्थिरता और सहनशीलता का प्रतीक है. मंदिर के पास स्थित कल्याण सागर झील श्रद्धालुओं की आस्था को और गहरा करती है. यहां कछुओं को पवित्रता और शक्ति के जीवित प्रतीक के रूप में पूजने की परंपरा है.

मंदिर में होते हैं आज भी दिव्य चमत्कार

यह मंदिर सिर्फ एक शक्तिपीठ नहीं बल्कि भक्तों की आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र भी है. मान्यता है कि यहां भक्तों की हर मुराद पूरी होती है. जीवन की बड़ी से बड़ी समस्या यहां आकर हल हो जाती है. इसलिए नवरात्र और दीवाली के दौरान यहां भक्तों का सैलाब उमड़ता है.

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तांत्रिकों का प्रमुख गढ़ है ये शक्तिपीठ!

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यह शक्तिपीठ तांत्रिकों के लिए भी महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार तांत्रिकों का मानना है कि यह मंदिर एक शक्तिशाली ऊर्जा का केंद्र है जिसका ब्रह्मांडीय शक्तियों से गहरा संबंध है. इसलिए यह स्थान आध्यात्मिक जागृति, सिद्धियों और मुक्ति के लिए प्रमुख स्थल है.

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