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वसंत पंचमी से शुरू होती हैं महादेव के विवाह की रस्में, काशी में होता है शिव तिलक

वसंत पंचमी से महादेव के विवाह की रस्में भी शुरू हो जाती हैं.यह परंपरा खासकर धर्म नगरी काशी यानी वाराणसी में सदियों से चली आ रही है. इस दिन भगवान शिव को दूल्हे की तरह सजाया जाता है. उनके माथे पर हल्दी और चंदन से तिलक लगाया जाता है और उन्हें गुलाल से सजाया जाता है.

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वसंत पंचमी पर आमतौर पर लोग विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा-पाठ करते हैं.स्कूलों और घरों में बच्चे नई किताबों, पेंसिल और कलम के साथ पूजा करते हैं. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि इस दिन से एक और खास परंपरा भी जुड़ी हुई है? इस दिन भगवान शिव का तिलक होता है और उन्हें विशेष प्रसाद चढ़ाया जाता है.

वसंत पंचमी से शुरू होती हैं महादेव के विवाह की रस्में

धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में बताया गया है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था.जैसे हर शादी में तिलक का महत्व होता है, ठीक उसी तरह वसंत पंचमी के दिन शिव का 'तिलक' उत्सव मनाया जाता है.

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काशी में सदियों से चली आ रही है यह परंपरा

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वसंत पंचमी से महादेव के विवाह की रस्में भी शुरू हो जाती हैं.यह परंपरा खासकर धर्म नगरी काशी यानी वाराणसी में सदियों से चली आ रही है. इस दिन भगवान शिव को दूल्हे की तरह सजाया जाता है. उनके माथे पर हल्दी और चंदन से तिलक लगाया जाता है और उन्हें गुलाल से सजाया जाता है.

मंदिरों में विशेष पूजा और भक्तों की भीड़

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काशी के मंदिरों में भक्त मानते हैं कि अब वैरागी शिव दूल्हा बनने की तैयारी में हैं. यह महादेव और माता पार्वती के विवाह की रस्में शुरू होने का प्रतीक है. मंदिरों में इस दिन भक्त भगवान शिव के पास जाकर उन्हें नमन करते हैं, फूल और हल्दी अर्पित करते हैं.

सबसे रोचक बात यह है कि इस दिन भगवान शिव को केसरिया मालपुए का भोग लगाया जाता है.यह रस्म वसंत ऋतु के आगमन और महादेव के तिलक की खुशी में की जाती है.

काशी और अन्य जगहों में यह परंपरा बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है. मंदिरों में खास समारोह होते हैं, भक्तों का तांता लगता है और हर कोई इस दिन को बेहद खुशी और श्रद्धा के साथ मनाता है.

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होली के आगमन का भी संकेत

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इसके अलावा, कई जगहों पर वसंत पंचमी के दिन ही होली का डंडा भी गाड़ा जाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि फागुन की मस्ती और रंगों का त्योहार अब जल्दी ही आने वाला है.

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