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सूर्यनारायण स्वामी मंदिर: दोनों पत्नियों के साथ सूर्यदेव देते हैं दर्शन, वैवाहिक जीवन में खुशहाली का मिलता है आशीर्वाद!

सूर्यनारायण स्वामी मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि वैवाहिक जीवन में सुख और मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला जीवंत प्रतीक भी है. इस मंदिर में सूर्यदेव अपनी दोनों पत्नियों के साथ विराजमान हैं. मान्यता है कि जो भी भक्त यहां रविवार के दिन आता है, उसकी वैवाहिक जीवन से जुड़ी हर समस्या दूर होती है. पूरी जानकारी के लिए आगे पढ़ें…

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देश में भगवान सूर्य के कई मंदिर हैं, जहां भक्त अपनी मनोकामना लेकर जाते हैं. सूर्य भगवान की पूजा करने से जीवन में उन्नति होती है और शत्रुओं का नाश होता है. कहा जाता है कि भगवान शिव से लड़ाई में भगवान सूर्य के 12 टुकड़े हो गए थे और जहां-जहां उनके टुकड़े गिरे, वहां भगवान सूर्य के मंदिरों का निर्माण कराया गया. 

इस मंदिर में सूर्य देव देते हैं अपनी दोनों पत्नियों के साथ दर्शन!

आंध्र प्रदेश में भी ऐसा मंदिर है, जहां भगवान सूर्य अपनी दोनों पत्नियों के साथ विराजमान हैं. आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के पास पेद्दापुडी मंडल के गोलाला ममीदादा गांव में भगवान सूर्य का सूर्यनारायण स्वामी मंदिर स्थापित है. यह मंदिर थुल्या भागा (तुङ्गभद्रा) नदी के किनारे बना है. मंदिर 16 एकड़ में फैला है और इसका गोपुरम (प्रवेश द्वार का आकार) 170 फीट ऊंचा है, जिसे अलग-अलग नक्काशियों से सजाया गया है.

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गोपुरम सजाने के लिए हुआ है कई रंगों का इस्तेमाल!

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गोपुरम पर अलग-अलग देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को बारीकी से उकेरा गया है, जिसमें हिंदू धर्म के महाकाव्यों को दिखाने की कोशिश की गई है. इस कला को 'चिन्ना भद्राचलम' के नाम से जाना जाता है. गोपुरम को सजाने के लिए विभिन्न रंगों का इस्तेमाल किया गया है.

क्या है सूर्यनारायण स्वामी मंदिर का इतिहास?

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मंदिर की स्थापना साल 1920 में श्री कोव्वुरी बसिवि रेड्डी गारू नाम के समाजसेवी ने की थी. गारू के बारे में कहा जाता है कि गांव में उनके समान धार्मिक और दानी इंसान कोई नहीं था. उन्होंने न केवल मंदिर के लिए समर्पित सेवा प्रदान की है, बल्कि अपना जीवन भी बड़े पैमाने पर जनता के लाभ और कल्याण में बिता दिया. उन्होंने ही मंदिर का निर्माण कराया है और आज भी हिंदू शास्त्रों के अनुसार भगवान सूर्य की पूजा की जाती है.

मंदिर के गर्भगृह में मौजूद है सूर्य देव की अद्भुत प्रतिमा!

मंदिर का प्रवेश द्वार से लेकर गर्भगृह तक दोनों ही देखने लायक हैं. प्रवेश द्वार पर सूर्य भगवान सात घोड़ों के साथ रथ को चला रहे हैं, जबकि मंदिर के गर्भगृह में भगवान सूर्य अपनी दोनों पत्नी ऊषा और छाया के साथ विराजमान हैं.

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भक्तों की हर मुराद होती है पूरी!

मान्यता है कि मंदिर में आकर भक्त मनोकामना पूरी करने के लिए दोबारा मंदिर में आने का संकल्प लेते हैं. वहां भक्तों के बीच भगवान के नाम पर कसम लेने की प्रथा है और मनोकामना पूरी होने पर कसम या संकल्प को पूरा भी करते हैं.

रविवार के दिन मंदिर में उमड़ता है भक्तों का सैलाब!

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गर्भगृह में विराजमान भगवान सूर्य और उनकी दोनों पत्नियों के दर्शन से सुख-संपत्ति और दांपत्य जीवन में खुशहाली का आशीर्वाद मिलता है. भक्त दूर-दूर से भगवान सूर्य का आशीर्वाद लेने के लिए मंदिर में आते हैं. रविवार के दिन मंदिर में ज्यादा भीड़ होती है, क्योंकि रविवार को मंदिर में विशेष पूजा अनुष्ठान किए जाते हैं.

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